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हत्या हुई तब 12 साल का था, सुप्रीम कोर्ट को 28 साल बाद पता चली दोषी की सही उम्र, जुवेनाइल मान तत्काल दिया रिहा करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पुणे की अदालत को आदेश दिया कि वो सच का पता लगाए। हालांकि चौधरी के पास भी अपनी उम्र को सही साबित करने का कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं था। लेकिन उसके हाथ राजस्थान के स्कूल का सर्टिफिकेट लंबे अरसे बाद लग गया।
Written by: shailendragautam
Updated: March 28, 2023 14:54 IST
हत्या हुई तब 12 साल का था  सुप्रीम कोर्ट को 28 साल बाद पता चली दोषी की सही उम्र  जुवेनाइल मान तत्काल दिया रिहा करने का आदेश
प्रतीकात्मक तस्वीर
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हत्या के एक मामले में एक दोषी के साथ ऐसा अजीबोगरीब वाकया पेश आया जो शायद ही पहले कभी भी हुआ हो। 1994 में हुए एक कत्ल के मामले में उसे दोषी ठहराकर फांसी की सजा सुना दी गई। वो बार बार गुहार करता रहा कि जब कत्ल हुआ तब उसकी उम्र 12 साल की थी। लेकिन किसी भी कोर्ट ने उसकी बात को तवज्जो नहीं दी। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उसकी उम्र की जांच करने का आदेश पुणे की कोर्ट को दिया।

पुणे की कोर्ट ने जो रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट भेजी वो भी तीन माह बाद खुल सकी। सच का पता चला तो सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। लेकिन इससे पहले वो हत्या के मामले में दोषी के तौर पर 25 और कुल मिलाकर 28 साल जेल के भीतर काट चुका था।

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पुणे में हुई तीन हत्याओं के मामले में पुलिस ने तीन को गिरफ्तार किया था

ये अजीबोगरीब वाकया नारायण चेतनराम चौधरी के साथ पेश आया। वो रहने वाला तो राजस्थान का था लेकिन उसे पुणे में हुई तीन हत्याओं के मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इस वारदात में दो बच्चों और एक गर्भवती महिला की हत्या की गई थी। इस मामले में चेतनराम चौधरी के साथ जितेंद्र नैन सिंह गहलोत और एक अन्य शख्स को आरोपी बनाया गया था। कोर्ट में सुनवाई के दौरान चौधरी गुहार लगाता रहा कि वो कत्ल के समय जुवेनाइल था। लेकिन अदालत ने माना कि वारदात के समय उसकी उम्र 20-22 साल की रही होगी।

फांसी की सजा के खिलाफ दी थी दया याचिका, फिर वापस लेकर दायर की रिव्यू पटीशन

अदालत ने तीनों को दोषी मानकर फांसी की सजा सुनाई। नारायण चेतनराम चौधरी और जितेंद्र नैन सिंह गहलोत ने सजा के खिलाफ राष्ट्रपति से दया की गुहार लगाई। राष्ट्रपति के पास याचिका लंबित थी कि चौधरी ने दया याचिका वापस ले ली और सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पटीशन दाखिल की। उसका फिर से वो ही तर्क था कि वारदात के समय उसकी उम्र 12 साल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने पुणे की अदालत को आदेश दिया कि वो सच का पता लगाए। हालांकि चौधरी के पास भी अपनी उम्र को सही साबित करने का कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं था। लेकिन उसके हाथ राजस्थान के स्कूल का सर्टिफिकेट लंबे अरसे बाद लग गया। चौधरी वैसे पुणे के स्कूल में भी 1.5 साल तक पढ़ने गया था। राजस्थान के स्कूल का दस्तावेज टर्निंग प्वाईंट साबित हुआ।

पुणे की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी सीलबंद रिपोर्ट भेजी। ये रिपोर्ट जनवरी 2019 में भेजी गई थी। लेकिन जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस संजीव खन्ना ने रिपोर्ट मई 2019 में खोलकर देखी। बेंच ने माना कि चेतनराम चौधरी का दावा ठीक था। सोमवार को उसे जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने माना कि कत्ल के वक्त वो वाकई 12 साल का था। हालांकि इससे पहले वो जेल में 28 साल गुजार चुका था।

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