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बिहार लोकसभा चुनाव: हर पांचवा उम्मीदवार यादव, फिर भी दबदबा किसी और का ही

बिहार में कुल उम्मीदवारों में विभिन्न जातियों की रिलेटिव हिस्सेदारी की तुलना से पता चलता है कि यादवों का उतना अधिक प्रतिनिधित्व नहीं है जितना डेटा के मुताबिक लग रहा है।
Written by: shrutisrivastva
नई दिल्ली | Updated: April 29, 2024 11:00 IST
बिहार लोकसभा चुनाव  हर पांचवा उम्मीदवार यादव  फिर भी दबदबा किसी और का ही
बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव (Source- Express Photo by Prem Nath)
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बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से पहले और दूसरे चरण को मिलाकर 9 सीटों पर मतदान हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन के बीच यहां द्विध्रुवीय मुकाबला है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग कर रहे बिहार में इन दोनों गठबंधनों के उम्मीदवारों में जाति का कितना असर है? किस दल ने किस जाति के कितने कैंडीडेट उतारे हैं?

अक्टूबर 2023 में बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित जाति जनगणना के परिणामों से इन सवालों का जवाब आसानी से दिया जा सकता है। एनडीए और इंडिया गठबंधन के सभी 80 उम्मीदवारों की जातियों का मिलान करने पर कई बातें सामने आयीं। एनडीए और इंडिया गठबंधन के 80 उम्मीदवारों में 16 यादव हैं। हालांकि, इस विश्लेषण में मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच जाति-वार विभाजन नहीं किया गया है।

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दोनों दलों के उम्मीदवारों में यादवों की संख्या ज्यादा

एनडीए और इंडिया गठबंधन के 80 उम्मीदवारों में 16 यादव हैं। दोनों दलों के उम्मीदवारों में यादवों की संख्या सबसे ज्यादा है। कोइरी 11 उम्मीदवारों के साथ दूसरी सबसे बड़ी जाति है और उनके बाद राजपूत (7), भूमिहार (6) और चमार और दुसाध (पासवान) हैं, जिनमें से प्रत्येक जाति के पांच उम्मीदवार हैं। क्या इसका मतलब है कि बिहार की राजनीति में यादवों का प्रभुत्व है? आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन करने पर पता चलेगा कि ऐसा नहीं है।

कुल उम्मीदवारों में विभिन्न जातियों की रिलेटिव हिस्सेदारी की तुलना से पता चलता है कि यादवों का उतना अधिक प्रतिनिधित्व नहीं है जितना डेटा के मुताबिक लग रहा है। उम्मीदवारों की सापेक्ष हिस्सेदारी के मामले में वे उन 22 जातियों में 13वें स्थान पर हैं जिनके दो मुख्य गठबंधन से कम से कम एक उम्मीदवार है। वास्तव में, यादव उम्मीदवारों की रिलेटिव हिस्सेदारी तीन उच्च जातियों (भूमिहार, राजपूत और कायस्थ) की तुलना में कम है और ब्राह्मणों के बराबर है। रिलेटिव शेयर कुल जनसंख्या को कुल उम्मीदवारों की संख्या से भाग देने पर मिलता है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि बिहार की आबादी में 25% की हिस्सेदारी रखने वाले जाति समूहों से इस चुनाव में दोनों गठबंधनों में से किसी ने भी एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा है।

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किस जाति के कितने कैंडीडेट?

जातिकैंडीडेट (रिलेटिव शेयर)
गंगई10.8
गंगोता5
गोसियान3.4
कोइरी3.3
भूमिहार2.6
राजपूत2.5
पान-चौपाल2.2
बनिया2.2
कायस्थ2.1
हलवाई2.1
सोनार1.8
मल्लाह1.4
यादव1.4
ब्राह्मण1.4
पासी1.3
चमार1.2
पासवान1.2
कुर्मी0.9
कहार0.8
धानुक0.6
मुसहर0.4
मुस्लिम0.4

INDIA और NDA, किस गठबंधन में किस जाति समूह का है कितना प्रतिनिधित्व?

यह सवाल इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि बिहार की राजनीति अक्सर इसी नैरेटिव पर केंद्रित रही है। बिहार भारत का पहला राज्य था जिसने अत्यंत पिछड़ी जातियों (EBC) के लिए एक सब-कैटेगरी के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कोटा लागू किया था। इसी तरह, बिहार की राजनीति में राजद के प्रभुत्व ने भी ओबीसी राजनीति में यादव बनाम गैर-यादव विभाजन पैदा कर दिया है। दूसरी ओर, आरजेडी को अपना मुख्य समर्थन मुस्लिम-यादव वोट बैंक की एकजुटता से मिलता है।

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आंकड़ों से पता चलता है कि एनडीए के पास इंडिया गठबंधन की तुलना में ऊंची जातियों (राजपूत, भूमिहार, कायस्थ और ब्राह्मण) और ईबीसी के उम्मीदवारों की बड़ी हिस्सेदारी है। इंडिया गठबंधन में एनडीए गठबंधन की तुलना में यादव, गैर-यादव ओबीसी, मुस्लिम और अनुसूचित जाति (SC) उम्मीदवारों की हिस्सेदारी अधिक है। उच्च जाति के उम्मीदवारों की रिलेटिव हिस्सेदारी इंडिया गठबंधन के लिए भी एक से अधिक है।

INDIA और एनडीए उम्मीदवारों में जाति-समूहों की हिस्सेदारी

जातिINDIA गठबंधन में हिस्सेदारी (%)NDA गठबंधन में हिस्सेदारी (%)
अत्यंत पिछड़ा वर्ग7.517.5
सामान्य12.532.5
मुस्लिम102.5
ओबीसी (गैर यादव)2520
ओबीसी (यादव)27.512.5
एससी17.515

निर्वाचन क्षेत्रवार जाति-समीकरण

क्या एनडीए और इंडिया गठबंधन ने किसी दिए गए निर्वाचन क्षेत्र में एक ही या अलग-अलग जाति/जाति-समूहों से उम्मीदवार खड़े किए हैं? आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के 40 लोकसभा क्षेत्रों में से केवल सात में एक ही जाति के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होगा। वहीं, अगर जाति समूहों मतलब उच्च जाति, एससी, ईबीसी, यादव, गैर-यादव ओबीसी और मुसलमानों के नजरिए से देखा जाए तो समान जाति समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा वाले निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 15 हो जाती है। बिहार में केवल एक संसदीय क्षेत्र में एनडीए और इंडिया गठबंधन के दो मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होगा, वहीं दो सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ ऊंची जाति के उम्मीदवार होंगे। यादव बनाम यादव के लिए यह संख्या तीन है, जहां दोनों दलों से एक सीट पर यादव कैंडीडेट खड़े हैं।

RJD ने इन यादव कैंडीडेट को दिया टिकट

तेजस्वी यादव ने टिकट बांटते समय यादव वोटबैंक का खास ख्याल रखा। आरजेडी ने कुल आठ यादव उम्मीदवार को टिकट दिया। यादव कैंडीडेट में बांका से जय प्रकाश यादव को टिकट दिया गया है। वाल्मीकिनगर से दीपक यादव, सारण से रोहिणी आचार्य को प्रत्याशी बनाया गया है। पाटलिपुत्र से मीसा भारती को टिकट दिया गया है। दरभंगा से ललित यादव, जहानाबाद से सुरेंद्र यादव को टिकट दिया गया है। वहीं तीन कोइरी, तीन दलित, दो मुस्लिम, दो सवर्ण, एक कुर्मी और एक बनिया उम्मीदवार को टिकट दिया है।

पप्पू यादव के नाम की क्यों है चर्चा?

बिहार की राजनीति में इन दिनों जिस यादव की काफी चर्चा है वह हैं, पूर्णिया से निर्दलीय उम्मीदवार पप्पू यादव। पांच बार के सांसद रहे पप्पू तीन बार पूर्णिया से जीते हैं। पप्पू यादव तब सुर्खियों में आए जब वह पिछले महीने कांग्रेस में शामिल हो गए, इन अटकलों के बीच कि पार्टी उन्हें पूर्णिया निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारेगी। पर कांग्रेस के महागठबंधन सहयोगी राजद ने निर्वाचन क्षेत्र छोड़ने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पप्पू ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की।

पूर्णिया में लोकप्रिय पप्पू यादव को निर्वाचन क्षेत्र में आरजेडी के पारंपरिक वोट मुसलमानों और यादवों (एम-वाई) में सेंध लगाने की संभावना के रूप में देखा जा रहा है न कि जेडीयू के उच्च जातियों, गैर-यादव ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग में। पूर्व सांसद को मुसलमानों और यादवों से भी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

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