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Jansatta Editorial: हरियाणा में सियासी खींचतान के बीच लोकतंत्र बना मजाक

हरियाणा में मुख्यमंत्री बदलने, जजपा के अलग होने और अब निर्दलीय विधायकों के छिटक जाने के पीछे का गणित किसी से छिपा नहीं है। यह सब आम चुनाव का बिगुल बजने से ठीक पहले हुआ।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 11, 2024 08:42 IST
jansatta editorial  हरियाणा में सियासी खींचतान के बीच लोकतंत्र बना मजाक
नायब सिंह सैनी। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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चलते चुनाव में हरियाणा की राज्य सरकार अल्पमत में आ गई। उसकी सबसे बड़ी सहयोगी जननायक जनता पार्टी यानी जजपा तो करीब ढाई महीने पहले ही साथ छोड़ गई थी, इस हफ्ते तीन निर्दलीय विधायक भी हाथ छुड़ा कर अलग खड़े हो गए। इस तरह सरकार अल्पमत में आ गई।

स्वाभाविक ही विपक्षी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री से नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। मगर मुख्यमंत्री का कहना है कि उनकी सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। संवैधानिक प्रावधान है कि अगर किसी सरकार ने सदन में बहुमत हासिल किया है, तो वह छह महीने तक काम कर सकती है।

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मार्च में जब मनोहरलाल खट्टर की जगह नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया गया, तो जजपा ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था। तब बहुमत साबित करना पड़ा था। अब जब कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पर नैतिक दबाव बनाना शुरू किया है, तो जजपा भी उसके साथ खड़ी हो गई है। दोनों दलों ने राज्यपाल को चिट्ठी लिख कर मिलने का वक्त मांगा है।

हालांकि इससे उन्हें कोई उल्लेखनीय कामयाबी मिलने की संभावना कम है। इन दोनों दलों की हड़बड़ी और भाजपा की निश्चिंतता की वजहें भी स्पष्ट हैं। दरअसल, सैनी सरकार को बहुमत के लिए केवल एक विधायक की जरूरत है, जो इस महीने होने वाले करनाल विधानसभा उपचुनाव के बाद, संभव है उसे मिल जाए।हरियाणा में मुख्यमंत्री बदलने, जजपा के अलग होने और अब निर्दलीय विधायकों के छिटक जाने के पीछे का गणित किसी से छिपा नहीं है।

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यह सब आम चुनाव का बिगुल बजने से ठीक पहले हुआ। किसान आंदोलन के बाद से हरियाणा में लोग सरकार के विरोध में हैं। दूसरी बार जब किसान एक बार फिर से दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे थे, तब जिस तरह उन्हें रोकने का प्रयास किया गया, लगातार उन पर आंसू गैस के गोले बरसाए गए और पुलिसिया दमन का सहारा लिया गया, उससे खट्टर सरकार के प्रति नाराजगी और बढ़ गई। जजपा चूंकि सरकार का हिस्सा थी, इसलिए उसके प्रति भी बराबर की नाराजगी देखी गई।

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भाजपा ने मुख्यमंत्री बदल कर उस नाराजगी को हल्का करने का प्रयास किया, तो जजपा ने भाजपा से अलग होकर। सरकार का साथ दे रहे निर्दलीय विधायक भी उस नाराजगी से बचे नहीं थे। फिर, इसी साल अक्तूबर-नवंबर में वहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में दोनों पार्टियों और निर्दलीय विधायकों ने आम चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव का समीकरण भी साधने का प्रयास किया। मगर वास्तव में उन्हें इसका कितना लाभ मिल पाएगा, कहना मुश्किल है।

अब जब निर्दलीय विधायकों के छिटकने से सरकार कमजोर पड़ गई है, कांग्रेस को वहां अपना जनाधार बढ़ाने का अवसर हाथ लग गया है। चलते आम चुनाव की सरगर्मी में वह इसे भुना लेना चाहती है। अगर तत्काल किसी तरह राज्य में तख्ता पलट संभव हो पाता है, तो न केवल लोकसभा चुनाव, बल्कि विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस का हाथ मजबूत हो सकता है।

लगे हाथ जजपा भी अपने ऊपर लगे कुछ दाग धो लेने के फेर में है। हालांकि वास्तव में बहुमत साबित करने की बात आएगी, तो खुद उसके कितने विधायक साथ खड़े होंगे, वह दावा नहीं कर सकती। मगर यह सारा सियासी खेल जिस ढंग से चल रहा है, उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ में लोकतंत्र को एक तरह से मजाक बना दिया है।

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