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संपादकीय: ब्रिटेन की सत्ता, नए प्रधानमंत्री स्टार्मर के लिए आसान नहीं होगा चुनौतियों से निपटना, करों का बोझ और महंगाई बड़ा संकट

कंजर्वेटिव पार्टी के प्रति वहां के लोगों में रोष इस बात को लेकर भी था कि ‘ब्रेक्जिट’ करके ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। इसके अलावा गैरकानूनी तरीके से हो रहे प्रवासन पर सुनक सरकार काबू नहीं पा सकी।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: July 06, 2024 11:01 IST
संपादकीय  ब्रिटेन की सत्ता  नए प्रधानमंत्री स्टार्मर के लिए आसान नहीं होगा चुनौतियों से निपटना  करों का बोझ और महंगाई बड़ा संकट
UK General Elections 2024: ब्रिटेन के नए पीएम कीर स्टार्मर (सोर्स - रॉयटर्स)
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ब्रिटेन में चौदह वर्षों बाद कंजर्वेटिव पार्टी को पराजित कर लेबर पार्टी सत्ता की कमान संभालने जा रही है। लेबर पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली है। उसने चार सौ से ऊपर सीटें जीती हैं। किएर स्टार्मर ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने हैं। हालांकि इस सत्ता परिवर्तन के कयास बहुत पहले से लगाए जा रहे थे। चुनाव पश्चात सर्वेक्षणों में भी लेबर पार्टी को चार सौ से ऊपर सीटें मिलने के कयास लगाए गए थे।

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ब्रिटेन में काफी समय से महंगाई उच्च स्तर पर है

दरअसल, कंजर्वेटिव पार्टी से लोगों का मोहभंग हो चुका था। खासकर प्रधानमंत्री ऋषि सुनक खासे अलोकप्रिय हो चुके थे। इस तरह वहां सत्ता-विरोधी लहर थी, जिसमें कंजर्वेटिव पार्टी ध्वस्त गई। ब्रिटेन में काफी समय से महंगाई उच्च स्तर पर है, लोगों पर करों का बोझ काफी बढ़ गया है, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं चरमरा गई हैं और देश की अर्थव्यवस्था एक तरह से ठप पड़ गई है। ऋषि सुनक ने अर्थव्यवस्था संभालने का आश्वासन दिया था, इसके लिए उन्होंने परिश्रम भी खूब किया, मगर कामयाब नहीं हो सके। नतीजतन, लोगों का रहन-सहन पर खर्च बढ़ता गया है।

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दरअसल, कंजर्वेटिव पार्टी के प्रति वहां के लोगों में रोष इस बात को लेकर भी था कि ‘ब्रेक्जिट’ करके ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। इसके अलावा गैरकानूनी तरीके से हो रहे प्रवासन पर सुनक सरकार काबू नहीं पा सकी। इसके चलते वहां की सार्वजनिक सुविधाओं पर बोझ बढ़ा है। लेबर पार्टी ने आवास नीति बनाने, आव्रजन नीति को कड़ा करने और यूरोपीय संघ से रिश्ते मजबूत बनाने का वादा किया था। इससे वहां के लोगों में भरोसा पैदा हुआ।

हालांकि चुनावी वादों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होता। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को संभालना स्टार्मर के लिए भी बड़ी चुनौती होगी। खाली हो चुके खजाने के साथ करों का बोझ कम करना और सार्वजनिक सुविधाओं को बेहतर बनाना भी आसान नहीं होगा। ऐसे में, अगर आव्रजन नीतियों को कड़ा किया जाता है, तो अलग मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। देखने की बात है कि यूरोपीय संघ के साथ मिल कर वे ब्रिटेन की जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में कहां तक कामयाब हो पाते हैं।

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