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लेप्रेसी कॉलोनियों से ओल्ड एज होम तक, जानिए प्रोजेक्ट मोमेंटम से कैसे हर घर तक पहुंची कोविड वैक्सीन

चितरल खंभाटी की रिपोर्ट पढें और जानें कैसे समाज से अलग-थलग रहने वाले लेप्रेसी मरीजों तक कोरोना से बचाव के ल‍िए टीके पहुंचाए गए।
Written by: जनसत्ता ऑनलाइन | Edited By: shailendra gautam
Updated: October 14, 2022 18:13 IST
लेप्रेसी कॉलोनियों से ओल्ड एज होम तक  जानिए प्रोजेक्ट मोमेंटम से कैसे हर घर तक पहुंची कोविड वैक्सीन
प्रोजेक्ट मोमेंटम के तहत सांप सीढ़ी के खेल के जरिये बच्चों को किया गया जागरूक। (एक्सप्रेस फोटो)
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के समोदा में बच्चों को सांप सीढ़ी के खेल के जरिये बताया जाता है कि कोविड से बचने के लिए वैक्सिनेशन कितना जरूरी है। 12 साल से ऊपर के बच्चों को कोरोना और उसके टीके के प्रति जागरूक करने का ये एक तरीका है। हालांकि यह उन तरीकों की एक बानगी भर है जो वैक्सीन के प्रति जागरूक करने के लिए अमल में लाए जा रहे हैं।

मोमेंटम रूटीन इम्युनाईजेशन ट्रांसफार्मेशन एंड इक्विटी प्रोजेक्ट लोगों को वैक्सीन के प्रति जागरूक करने के लिए बहुत सी कोशिशें कर रहा है। USAID और भारत सरकार के सहयोग से जॉन स्नो इंडिया प्रा. लि. वैक्सीन के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम कर रही है। ये प्रोजेक्ट भारत के 18 सूबों में चलाया जा रहा है। लोकल एनजीओ भी इसमें खासी मदद कर रहे हैं।

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समोदा के शास्त्रीपुरम माध्यमिक शाला के शिक्षक अरूणा मकारिया कहती हैं कि ये तरीका काफी कारगर हो रहा है। बच्चे खेल के जरिये तेजी से सीखते हैं और अपने परिवार के लोगों को भी जागरूक करते हैं। वो बताती हैं कि किस कदर लोग वैक्सीन लेने से बचते थे। उन्हें डर था कि टीका लगवाने से वो बीमार पड़ेंगे या फिर मर भी सकते हैं। आंगनवाड़ी वर्कर जब उनके घर जाती थीं तो वो झगड़े पर भी उतारू हो जाते थे।

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सेंट जोसेफ चर्च रायपुर के फादर सेबेस्टियन। (फोटोः चित्रा खंभाटी)

रीजनल हेल्थ ऑफिसर भूपेंद्र देवांगन कहते हैं कि गांव वाले समझने को भी तैयार नहीं थे। वो महिला वर्करों को भी गाली निकालते थे। एक हेल्थ वर्कर द्रोपदी देशहेलरे कहती हैं कि लोगों को समझाने में बहुत सारी दुश्वारी पेश आईं। लेकिन वो परवाह न करके आगे बढ़ते रहे। उनका कहना है कि काम में कोई अड़चन आती है तो उन्हें अपना बेहतरीन करने में मदद मिलती है। समोदा के स्कूल के प्राचार्य टीकाराम साहू कहते हैं कि सांप सीढ़ी के खेल के जरिये काफी मदद मिली। वैक्सीन को लेकर जो भ्रांतियां थीं, उन्हें बच्चों के जरिये खत्म करने में बहुत ज्यादा मदद मिली।

वैक्सीन दीदी ने किया ट्रांसजेंडरों को जागरूक

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छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक ट्रांसजेंडर कंचन सेंदरे ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में काफी मदद की। उन्होंने अपने साथियों का भरोसा जीतने में महीनों तक काम किया। इस तबके के लोगों के बीच कोरोना से ज्यादा डर वैक्सीन को लेकर था। समुदाय के बहुत से लोग सेक्स चेंज की दवाएं लेते हैं। वो Antiretroviral therapy (ART) (HIV का उपचार) भी लेते रहते हैं। ये हाईरिस्क ग्रुप में शुमार किए जाते हैं। वो वैक्सीन लेने से बचते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके साईड इफैक्ट हैं।

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वैक्सीन दीदी के नाम से मशहूर ट्रांसजेंडर। (फोटोः चित्रा कंभाटी)

इन लोगों के पास दस्तावेज भी नहीं होते। बहुतों के पास पहचान पत्र तो पुरुष का होता है। लेकिन रहते वो औरतों की तरह से हैं। वैक्सीन सेंटरों पर उनका मजाक न बन जाए, इसलिए वो वहां जाने से बचते थे। सेंदरे ने इन लोगों की काउंसलिंग की और टीके के प्रति जागरूक किया। तभी उन्हें वैक्सीन दीदी का नाम मिला।

लेप्रेसी मरीज भी थे एक चुनौती

भारत में लेप्रेसी पेंशेंट की 750 कालोनियां हैं। इनमें से 34 छत्तीसगढ़ में हैं। इन लोगों की शारीरिक स्थिति दयनीय होती है। ये समाज से अलग थलग होते हैं। इन लोगों तक पहुंच बनाने के लिए लोकल की सहायता ली गई। रायपुर की इंदिरा कुष्ठ बस्ती में रहने वाले घासीराम भोई ने प्रोजेक्ट को इन लोगों को बीच लोकप्रिय बनाने में काफी मदद की। इलाके में 150 लोग हैं, जिनमें से 80-85 लेप्रेसी का शिकार हैं। भोई ने लॉकडाउन के दौरान इन लोगों के लिए खाने पीने का सामान जुटाने में मदद की थी। वो इन लोगों को जागरूक करने में टीम के लिए मददगार साबित हुए।

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रायपुर की इंदिरा कुष्ठ बस्ती में एड़े बुजुर्ग। (फोटो) चित्रा खंभाटी)

ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भारत में रोजगार सृजित करने का एक बड़ा सेक्टर है। ट्राक ड्राईवर्स बहुत ज्यादा घूमते हैं। ये देश के हर हिस्से में भ्रमण करते हैं। इन लोगों को समय पर वैक्सीन देना बड़ी चुनौती थी। बिहार का एक ट्रक ड्राईवर पंकज लॉकडाउन के दौरान 15 दिनों तक मुंबई में फंसा रहा। उसे भी बहुत से लोगों ने बताया कि टीका लगाने में खतरा है लेकिन उसने वैक्सीन ली।

वृद्धाश्रम में रहने वाले लोगों को वैक्सीन देना काफी बड़ी चुनौती थी। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग 60 साल से ऊपर हैं और कई बीमारियों से पीड़ित भी। इन लोगों को co-morbidities का भी खतरा रहता हैं, क्योंकि 40 लोगों की टीम में से बहुत सारे लोग डायबिटीज, ह्रदय संबंधी रोगों से जूझ रहे हैं। वृद्धाश्रम के संस्थापक डॉ. अरविंद नेरवाल बताते हैं कि कोरोना की लहर के दौरान उन्हें किस तरह से परेशानी झेलनी पड़ी। यहां रहने वाले लोगों से पैसे नहीं लिए जाते हैं। लॉकडाउन के दौरान यहां खाने पीने की चीज मंगाना भी जोखिम भरा था।

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रायपुर में वैक्सीन लगवाता ट्रक ड्राईवर। (फोटोः चित्रा खंभाटी)

रायपुर के ओल्ड एज होम में रहने वाली और पेशे से शिक्षिका कृष्णा चटर्जी बताती हैं कि कैंपेन से उन्हें काफी मदद मिली। मन से डर निकल गया और यहां रहने वाले लोग बूस्टर डोज के साथ वैक्सीन की सारी डोज ले चुके हैं। प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में धार्मिक नेताओं ने भी काफी मदद की। जब टीकाकरण शुरू हुआ तो लोग पूछते थे कि ये वाकई वैक्सीन है या फिर केवल एक इंजेक्शन। सेंट जोसेफ चर्च के फादर सेबेस्टिन कहते हैं कि एंटी वैक्सीन प्रोपेगंडा काफी ज्यादा था। उन्होंने रायपुर सर्कल की 68 चर्चों में वैक्सीन के प्रति जागरूकता के लिए मुहिम चलाई।

Disclaimer: मोमेंटम रूटीन इम्युनाइजेशन ट्रांसफारमेशन एंड इक्विटी प्रोजेक्ट को भारत में जॉन स्नो इंडिया प्रा. लि. ने लागू किया है। USAID का इसे सपोर्ट है। भारत सरकार ने भी प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी दी है। प्रोजेक्ट का ध्येय सरकार की उन लोगों तक पहुंचने में सहायता करना है जो वैक्सीन लेने से हिचकते हैं। हाशिए पर मौजूद इन लोगों को देश के 18 सूबों में वैक्सीन दी जानी है। इसके लिए स्वयं सेवी संगठनों से तालमेल कर प्रोग्राम को आगे बढ़ाया जा रहा है। (विज‍िट करें: https://usaidmomentum.org/)

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