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दुनिया मेरे आगे: जीवंत रिश्ते और जिंदादिली, खुशियों के लिए जरूरी है मन में सुखद अनुभूति होना

पान के प्राचीन दर्शन शास्त्र में एक संदर्भ है- ‘वाबी-साबी’। इसके तहत हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के ऐसे अधूरेपन में ही मस्ती करने की सलाह दी जाती है। अधूरेपन को सराहा और पसंद किया जाता है। इस दुनिया में न तो कोई व्यक्ति अपने आप में संपूर्ण है और न ही कोई वस्तु। पढ़ें शिखर चंद जैन के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 30, 2024 09:52 IST
दुनिया मेरे आगे  जीवंत रिश्ते और जिंदादिली  खुशियों के लिए जरूरी है मन में सुखद अनुभूति होना
मन ही है गुण-अवगुण रहस्य का दर्पण। वक्त ही वह झरोखा है, जो अंतर्मन को अभिव्यक्त कर उसे अर्थपूर्ण परिभाषित प्रदान करता है।
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तनाव के कारण जब मन परेशान रहता है तो लोगों के प्रति हमारा व्यवहार भी खराब होने लगता है। ऐसे में हम जरा-सी सूझबूझ से काम लें, जिंदादिल रहें, जीवन को जरा हल्का और अपने व्यवहार को संयत रखें तो जिंदगी में बड़ा बदलाव आ सकता है। सवाल है कि आखिर यह जिंदादिली आती कहां से है! यह आती है दिल में प्यार, मन में उमंग और शरीर में ऊर्जा रहने से। यह प्यार आता है समानुभूति, सहानुभूति, दयालुता और स्नेह की भावनाएं संजोने और उन्हें जागृत रखने से। मन में उमंग आती है जीवन का कोई सार्थक उद्देश्य ढूंढ़ने से। शरीर में ऊर्जा आती है मन को प्रफुल्लित रखने और तन को स्वस्थ रखने से।

रोटी, कपड़ा और मकान की तरह प्रेम भी मूलभूत जरूरत

जिंदगी में जब प्यार कम होता है, तब सुख भी छिनने लगते हैं। सुखी रहने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की तरह प्रेम भी हमारी जिंदगी की मूलभूत जरूरत है। मित्र हों या जीवन साथी या हमारे परिजन, उनके साथ संबंधों को सुखद रखना और लंबे समय तक निभाना एक कला है, जिसके लिए कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है। अंग्रेजी में स्वार्ड यानी तलवार और वर्ड्स यानी शब्द, इन दोनों शब्दों में एक को छोड़ कर सब एक जैसे अक्षर हैं। खास बात यह है कि तलवार हो या शब्द, दोनों को सही ढंग से इस्तेमाल न किया जाए तो असर भी एक जैसा ही होता है। अक्सर लोगों से हमारे रिश्ते गलत बात करने से नहीं, बल्कि बात गलत तरीके से कहने से टूट जाते हैं। ऐसा संवाद के कौशल की कमी से होता है। किसी से बात करते समय हमें सही शब्दों के साथ-साथ बात कहने के सही तरीके का भी चयन करना चाहिए। साथ ही संवाद के दौरान हमारे हाव-भाव, लहजा और देह-भाषा भी सही रहनी चाहिए।

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उलाहना देने के लिए भी पहले प्रशंसा वाली बातें बोलें

मित्र, जीवनसाथी या अन्य नजदीकी रिश्तों में अगर हम किसी को उलाहना देना चाहते हैं, उसकी शिकायत करना चाहते है या किसी कमी के बारे में बताना चाहते हैं तो इससे पहले सही माहौल का इंतजार करना चाहिए। ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से नहीं, अकेले में कहनी चाहिए। उन्हें बात बुरी न लगे या बहुत कम बुरी लगे, इसके लिए पहले उनकी कुछ अच्छी आदतों, उपलब्धियों की चर्चा या प्रशंसा करना अच्छा होगा। फिर बातों-बातों में स्पष्ट, लेकिन सधे हुए अंदाज में अपनी बात कही जा सकती है। यह जरूर कहना चाहिए कि यह उन्हें निखारने के मकसद से ही कही जा रही है।

रिश्तों को निभाने के लिए क्षमा करना, नजरअंदाज करना और कभी-कभी अपनी उपेक्षा या कड़वी बातों को भूलना भी जरूरी होता है। अगर किसी की बात सुनकर बुरा लगे या व्यवहार से उपेक्षा महसूस हो, तो समग्रता से स्थिति का सही और ईमानदार आकलन किया जा सकता है। शायद उनका ऐसा कुछ मकसद न रहा हो और वे हड़बड़ी, व्यस्तता, मजबूरी, दुख या तनाव में ऐसा कुछ कह या कर गए हों जो हमें बुरा लगा हो। हो सकता है कि उनका कोई नजदीकी बीमार हो या दफ्तर का तनाव हो।

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कभी-कभी हम किसी की एक आध भूल या कड़वे वचन को यह सोचकर भी नजरअंदाज कर सकते हैं या भूल सकते हैं कि आमतौर पर उनका कभी खराब व्यवहार नहीं रहा है या फिर उन्हें अपना शुभचिंतक, स्नेही या हितैषी व्यक्ति मान कर भी ऐसा किया जा सकता है।

हम लोगों से नजदीकियां, सम्मान और स्नेह चाहते हैं तो दिल को जरा उदार और अपनी सोच को बड़ा बनाना चाहिए। अपने सहकर्मियों, मित्रों और परिजनों के लिए छोटे-छोटे त्याग करना सीखा जा जा सकता है। हमेशा, हर काम में उनसे आगे बढ़ने की कोशिश करने की बजाय कभी-कभी दूसरों के लिए जरा-सा रास्ता छोड़ देने और उन्हें आगे बढ़ने देने से हमारा मान बढ़ेगा।
समझदार लोग अपने प्रतिद्वंद्वियों से भी अच्छा संपर्क रखते हैं, क्योंकि उन्हें संबंधों की बारीकियों और व्यवहारकुशलता का ज्ञान होता है। पेशेवर प्रतिद्वंद्विता को वे कभी निजी रिश्तों पर हावी नहीं होने देते। ऐसे लोग घर या दफ्तर में अपने प्रतिद्वंद्वी का भी शानदार स्वागत, उनके साथ मधुर व्यवहार और उनका सम्मान करते हैं। उनके सुख-दुख में काम आने के लिए तत्पर रहते हैं और जरूरत पड़ने पर मदद में भी नहीं हिचकते। यही गुण मित्रों और जीवन-साथी से संबंधों के निर्वाह के लिए भी जरूरी है।

हमारी पहचान उन लोगों से होती है, जिनके साथ हम अपना ज्यादातर समय बिताते हैं। हमें हमेशा आत्मीयजनों के साथ की जरूरत होती है। हर काम या इंसान बिल्कुल वैसा नहीं हो सकता, जैसा हम चाहते हैं। हर बात को दिल पर लेना, तुनकमिजाजी और धैर्यहीनता हमें कोई संबंध नहीं निभाने देगी। इससे हमारा ही नुकसान होगा। अच्छे संपर्कों, अच्छी संगत और सामाजिक संपर्कों से वंचित होने का सीधा मतलब है- तनाव, घबराहट या अकेलापन, असफलता और नीरस जिंदगी।

संपूर्णता की ललक छोड़ देना चाहिए। यह आदत हमें अक्सर चिड़चिड़ा बना देती है। जापान के प्राचीन दर्शन शास्त्र में एक संदर्भ है- ‘वाबी-साबी’। इसके तहत हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के ऐसे अधूरेपन में ही मस्ती करने की सलाह दी जाती है। अधूरेपन को सराहा और पसंद किया जाता है। इस दुनिया में न तो कोई व्यक्ति अपने आप में संपूर्ण है और न ही कोई वस्तु। असल में संपूर्णता जैसा कुछ होता ही नहीं है। हम इस शब्द को जितना पीछे छोड़ देंगे, उतना ही हमारा दिल और दिमाग हल्का रहेगा। संपूर्णता की चाहत और इसकी खोज हमें एक असंतुष्ट व्यक्ति बना देती है, जो हमेशा उखड़ा-उखड़ा रहता है। इससे हमारे सामाजिक संबंधों और लोगों के साथ रिश्तों में भी खटास आ सकती है।

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