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दुनिया मेरे आगे: कहने और सुनने का फर्क, हमारी अनसुना करने की आदत से बहुत चीजें हो जाती हैं हमसे दूर

अमूमन हम जो कहते हैं सामने वाले को वही सुनना चाहिए, लेकिन कहने और सुनने में फर्क के कारण लोगों में वैचारिक मतभेद हो जाते हैं। दो साथियों के बीच विवाद हो जाता है। बोलचाल बंद हो जाती है। पारिवारिक विवाद की स्थिति खड़ी हो जाती है। ऐसा क्यों होता है? पढ़ें राकेश सोहम् के विचार।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: July 06, 2024 11:05 IST
दुनिया मेरे आगे  कहने और सुनने का फर्क  हमारी अनसुना करने की आदत से बहुत चीजें हो जाती हैं हमसे दूर
हमें अनसुना करने की आदत हो गई है। जो हम सुनना चाहते हैं, वही सुनते हैं।
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पिछली सदी में सत्तर के दशक की एक फिल्म में बहुत खूबसूरत गाना था, जो आज भी चाव से सुना जाता है- ‘आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है, जिंदगी भर वो सदाएं पीछा करती हैं।’ इस गाने का मर्म बहुत गहरा है। यहां सवाल दूसरा है। क्या आदमी वही सुनता है जो सामने वाला कहता है? इसका जवाब हां भी हो सकता है और नहीं भी। आज सुनने की साध घट रही है। टीवी, मोबाइल या दीगर गीत-संगीत विस्तारक यंत्रों को छोड़ दें तो पाएंगे कि लोग किसी की नहीं सुनते। सुनने से चेतना आती है। लोग सुनते होते तब तो क्रांति आ जाती। लोग प्रकृति, पर्यावरण, जल संरक्षण और बिजली बचत के बारे जागरूक होते। मगर ऐसा हो नहीं रहा है।

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दरअसल, हमें अनसुना करने की आदत हो गई है। जो हम सुनना चाहते हैं, वही सुनते हैं। आमतौर पर माना जा सकता है कि अगर सुनने वाले की श्रवण इंद्रियां ठीक हैं और कहने वाले की जुबान स्पष्ट है, तो वही सुना जाएगा जो कहने वाले ने कहा है। हालांकि कई बार ऐसा होता नहीं है। विचारक मानते हैं कि कहने और सुनने में फर्क तो होता ही है। आपसी कहा-सुनी हो जाने का कारण भी यही है। जो कहा गया है, वही सुना जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। एक वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार ‘वाइस डिस्टार्शन’ या किसी बात का अलग स्वरूप में पहुंचना भी एक कारण है।

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अमूमन हम जो कहते हैं सामने वाले को वही सुनना चाहिए, लेकिन कहने और सुनने में फर्क के कारण लोगों में वैचारिक मतभेद हो जाते हैं। दो साथियों के बीच विवाद हो जाता है। बोलचाल बंद हो जाती है। पारिवारिक विवाद की स्थिति खड़ी हो जाती है। ऐसा क्यों होता है? किसी व्यक्ति के मुख से निकले शब्द जिस अर्थ को लेकर चलते हैं, वे सुनने वाले पर अलग प्रभाव छोड़ते हैं। सुनने वाला उसे अपने अर्थ में सुनता है। कोई व्यक्ति किसी प्रवचन सभा में बैठा हो। प्रवचन कर्ता कोई सूत्र वाक्य कहता है तो वह उसे बड़े ध्यान से सुन लेता है।

ठीक वही वाक्य कोई दूसरा व्यक्ति उससे कहे, तब शायद वह बिफर जाए और कहे, ‘देखो, मेरे सामने प्रवचन मत झाड़ो। अपना प्रवचन अपने पास ही रखो।’ बात शब्दश: वही कही गई थी। सुनने वाला व्यक्ति जानता है कि प्रवचन में कही गई बात ही यथावत दोहराई जा रही है। यानी उसने वही सुना, जो बात कही गई थी। फिर दोनों में क्या फर्क हो गया? फर्क स्थिति का है, परिस्थितियों का है। फर्क व्यक्ति की मनोदशा का है। फर्क कहने वाले के लहजे में हो सकता है। फर्क सुनने वाले की स्वीकारोक्ति का भी है।

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आजकल के अधिकतर युवा इयरफोन लगाकर गीत-संगीत सुनते हैं। जरूरी नहीं है कि एक ही गाना सभी युवा एक-सा सुन रहे हों। हालांकि वे वही सुन रहे होते हैं जो इयरफोन के माध्यम से सुनाया जा रहा है। दरअसल, एक गाने को कई अर्थों में सुना जा सकता है। कोई गाने के बोल सुन रहा होता है, कोई संगीत की लहरी सुनता है। कोई गायकी के तरीके को सुन रहा होता है तो कोई साजिंदों के प्रयोग को। यहां तक कि कोई श्रोता गाने से जुड़े फिल्मी दृश्य को सुन रहा होता है और कोई अपनी पुरानी यादों को। कोई गम को ढूंढ़ रहा होता है तो कोई खुशी तलाश लेता है।

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एक सज्जन जीवन के अंतिम दिनों में अत्यंत बीमार थे। वे दैनिक जीवन में नित्य भजन-पूजन और मंत्रों का जाप किया करते थे। परिजनों ने सोचा कि इस घड़ी में उन्हें इयरफोन के माध्यम से मंत्रोच्चार सुनाया जाना चाहिए। शायद वे शांति का अनुभव करेंगे। उन्हें कष्ट को भूलने में मदद मिलेगी। उनको इयरफोन लगा दिए गए, लेकिन अगले ही पल उन्होंने उसे हटा दिया। उनका कहना था, उन्हें शोर अच्छा नहीं लग रहा है। वही भजन, वही मंत्र जो जीवन भर नित्य करते रहे, इस दावे के साथ कि ऐसा करने से अपूर्व शांति मिलती है, वही अब उन्हें शोर लग रहा था। शायद यहां सुनना परिस्थितिजन्य है। यहां एक ही कहन या बात को शांति और शोर के रूप में सुना गया!

इन दिनों विज्ञान ने बहुत तरक्की की है। संचार क्रांति का दौर चल पड़ा है। अधिकतर लोगों के पास मोबाइल है। कही गई बातों को रिकार्ड करने और सुविधानुसार सुनने के अवसर हैं। प्रेरक बातें कहने वाले भी बहुत हैं। उनकी दुकानें चल पड़ीं हैं। लोग उनकी कही गई बातों को कहीं भी, कभी भी सुन सकते हैं। बावजूद इसके लोगों की सोच में वैचारिक बदलाव परिलक्षित नहीं होता। क्रियाकलापों में परिपक्वता दिखाई नहीं देती? उच्छृंखलता, बेचैनी और उतावलापन बढ़ता ही जा रहा है।

अभी कुछ समय हुए एक बड़ा रोचक और अद्भुत वैज्ञानिक तथ्य सुनने में आया था। हम जो भी कहते हैं या बोलते हैं, वह ज्यों का त्यों इस वातावरण में विद्यमान रहता है। कभी नष्ट नहीं होता। यह लगातार गूंजता रहता है। वैज्ञानिक ऐसे यंत्र का अविष्कार करने में जुटे हैं जो सदियों पहले किसी के द्वारा कही गई बातों को रिकार्ड कर पाएगा और फिर उसे उस व्यक्ति की आवाज में हूबहू सुना जा सकेगा। इस तथ्य के साथ एक दावा और जोड़ा गया है। द्वापर युग में महाभारत के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश दिया गया था, उसे भी हूबहू रिकार्ड कर लिया जाएगा। अगर यह संभव हुआ तो लोग भगवान श्रीकृष्ण की आवाज में भगवद्गीता सुन सकेंगे। सवाल फिर वही उठ खड़ा होता है कि क्या हममें से हर व्यक्ति वही सुनेगा जो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था!

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