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तीन सेशन ट्रायल्स के बाद Blind Murder में दो को उम्र कैद, HC ने भी लगाई मुहर, 22 साल पुराने मामले में SC ने ऐसे किया इंसाफ

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा कि इतनी कमजोर गवाही पर आखिर उम्र कैद की सजा कैसे सुनाई जा सकती है।
Written by: shailendragautam
May 29, 2023 15:13 IST
तीन सेशन ट्रायल्स के बाद blind murder में दो को उम्र कैद  hc ने भी लगाई मुहर  22 साल पुराने मामले में sc ने ऐसे किया इंसाफ
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। ( फोटो-इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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उत्तराखंड में हुए एक Blind Murder के केस में अदालत ने बेहद सावधानी से सुनवाई करते हुए दो युवकों को उम्र कैद की सजा सुनाई। ट्रायल कितने संजीदा तरीके से किया गया इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मामले के तीन सेशन ट्रायल्स किए गए। तीनों आपस में एक दूसरे से लिंक थे। उसके बाद तीनों की रिपोर्ट के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने दोनों युवकों को दोषी मानकर उम्र कैद की सजा सुनाई। मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा तो वहां से भी सजा पर मुहर लगाई गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सेशन और हाईकोर्ट के फैसले की एक झटके में धज्जियां उड़ा दीं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हरिकेश रॉय और जस्टिस मनोज मिश्रा की डबल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि न तो पुलिस ने संजीदगी से विवेचना की और न ही सेशन और हाईकोर्ट ने तथ्यों पर ठीक से गौर किया। डबल बेंच ने 22 साल पुराने मामले के दोनों दोषियों को रिहा करने का आदेश सुनाया।

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22 साल पहले उत्तराखंड के जंगल में हुआ था ब्लाइंड मर्डर

1 नवंबर 2001 को उत्तराखंड के जंगलों में एक लाश मिली थी। युवक की पहचान पुलिस ने की तो उसके पिता ने हत्या का केस दर्ज कराया। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक मरने वाला युवक अपने दो दोस्तों के साथ जंगल में देखा गया था। 10 नवंबर को युवक के पिता ने पुलिस को लिखित बयान दिया कि दोनों युवक आखिरी समय में उसके बेटे के साथ थे। विवेचना के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपी युवकों को गिरफ्तार किया और उनकी निशानदेही पर 12 बोर की एक देसी पिस्तौल भी बरामद की। एक आरोपी के पास से पिस्तौल और 1 जिंदा कारतूस पुलिस ने बरामद किया जबकि दूसरे के पास से एक चाकू मिलना दिखाया गया। पुलिस ने तीन चार्जशीट तैयार कीं, जिनके बाद मामले के तीन सेशन ट्रायल किए गए।

तीन सेशन ट्रायल्स के बाद सुनाई गई उम्र कैद की सजा, HC ने भी रखा बहाल

28 जनवरी 2004 को ट्रायल कोर्ट ने जो फैसला दिया उसके मुताबिक दोनों दोषियों को आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्र कैद, आर्म्स एक्ट के तहत एक-एक साल की कैद और जुर्माना दोनों दोषियों को सुनाई गई। 2010 में मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा तो सजा बहाल रखा गया।

दोषियों ने अपनी अपील में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मरने वाले युवक के माता-पिता ने उन दोनों को वारदात की जगह पर नहीं देखा था। दो गवाह सामने आए, जिनका दावा था कि उन्होंने दोषियों को वारदात की जगह पर देखा। लेकिन एक गवाह ढाई महीने बाद सामने आया तो दूसरा ऐसी कोई वजह नहीं बता सका कि वो जंगल में क्या करने गया था। हथियारों की बरामदगी करते समय पुलिस ने कोई भी पब्लिक विटनेस नहीं लिया।

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जो गवाह मौके पर मौजूद दिखाए गए वो बहुत देर से सामने आए

सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तमाम साक्ष्यों पर गौर किया। पहली आपत्ति ये जताई कि पुलिस ने जो केस दर्ज किया उसमें कहीं भी साफ नहीं किया गया कि उन्हें हत्या के बारे में पता कैसे चला। डबल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस को केस दर्ज करने के तुरंत बाद कोई सुराग नहीं मिला था। जो भी सुराग मिले वो समय बीतने के साथ। पुलिस की सारी थ्योरी अनुमानों पर आधारित है। गवाह नंबर 2 18 फरवरी को सामने आया। लेकिन कोर्ट को उसने ये नहीं बताया कि आखिर इतनी देर बाद उसे सुध क्यों आई। वो वारदात की जगह पर क्यों मौजूद था, इसकी ठोस वजह भी नहीं मिली।

निचली अदालतों को लगी सुप्रीम फटकार, खारिज किया फैसला

गवाह नंबर 5 ने भी खुद को वारदात स्थल पर बताया। लेकिन वो ये नहीं बता पाया कि आखिर इतनी अंधेरी रात में वो वहां क्या कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा कि इतनी कमजोर गवाही पर आखिर उम्र कैद की सजा कैसे सुनाई जा सकती है। पुलिस ने रिकवर किए गए हथियार की बैलिस्टिक रिपोर्ट फारेंसिक लैब से तैयार कराई गई। लेकिन इसे दोषियों के साथ शेयर तक नहीं किया।

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