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Muslim Lawyers: मुस्लिम वकीलों के खिलाफ धार्मिक भेदभाव का मामला, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जज को किया तलब, जानिए क्या कहा?

Allahabad High Court: कोर्ट ने कहा, 'यह धर्म के आधार पर ट्रायल कोर्ट की ओर से स्पष्ट भेदभाव को दर्शाता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 में निहित मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है।'
Written by: न्यूज डेस्क
Updated: April 17, 2024 09:08 IST
muslim lawyers  मुस्लिम वकीलों के खिलाफ धार्मिक भेदभाव का मामला  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जज को किया तलब  जानिए क्या कहा
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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Muslim Lawyers: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुस्लिम वकीलों के खिलाफ कथित धार्मिक भेदभाव को लेकर एक सीनियर न्यायिक अधिकारी को तलब किया है। साथ कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की विशेष समुदाय के बारे में टिप्पणियों को न्यायिक कदाचार का मामला करार दिया है। यह घटनाक्रम दो मुस्लिम मौलवियों, मोहम्मद उमर गौतम और मुफ्ती काजी जहांगीर आलम कासमी और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान हुआ, जिन पर उत्तर प्रदेश के आतंकवाद विरोधी दस्ते द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया गया है।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश एनआईए/एटीएस, लखनऊ) विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने जनवरी में कुछ मुस्लिम वकीलों के शुक्रवार को उपस्थित होने के लिए एक संक्षिप्त स्थगन के अनुरोध को ठुकराने के बाद कोर्ट की सहायता के लिए अतिरिक्त वकील के रूप में एमीसी क्यूरी को नियुक्त किया था। ट्रायल जज ने आदेश दिया था कि जब भी मुस्लिम वकील नमाज में शामिल होने जाएंगे तो एमीसी क्यूरी अभियुक्तों का प्रतिनिधित्व करेंगे।

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जस्टिस शमीम अहमद ने पिछले महीने एक आरोपी के हाई कोर्ट चले जाने के बाद निचली अदालत द्वारा पारित आदेशों पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट के आदेश के बाद ट्रायल कोर्ट ने मुस्लिम वकीलों को आरोपियों का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी थी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के आवेदन पर फैसला नहीं किया था।

3 अप्रैल के आदेश में सिंगल जज ने ट्रायल कोर्ट के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि न्यायाधीश स्थगन आदेश की गंभीरता को समझने में विफल रहे और बहुत ही मनमाने ढंग से आगे बढ़े।

जस्टिस अहमद ने कहा कि जब तक आवेदक द्वारा सीआरपीसी की धारा 207 के तहत उसके आवेदन दिनांक 19.01.2024 के माध्यम से मांगे गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रति आवेदक को प्रदान नहीं की जाती है, तब तक ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई के लिए आगे नहीं बढ़ना चाहिए था, या देना ही चाहिए था। इस संबंध में कुछ टिप्पणियां हैं लेकिन ट्रायल कोर्ट चुप है।

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कोर्ट ने मुकदमे के दौरान आवेदक के लिए वकील की गैर-मौजूदगी. क्योंकि वे एक निश्चित धर्म से संबंधित हैं…" और इसके परिणामस्वरूप एमीसी की नियुक्ति के संबंध में ट्रायल जज की टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई।

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कोर्ट ने कहा, "यह धर्म के आधार पर ट्रायल कोर्ट की ओर से स्पष्ट भेदभाव को दर्शाता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 में निहित मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है।" कोर्ट ने आगे कहा कि यह देखते हुए कि यदि अन्य आधार थे तो उन्हें ट्रायल कोर्ट के आदेश में बताया जाना चाहिए था।

कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित किया था जो एक विशिष्ट संवैधानिक निषेध का उल्लंघन करते हुए सीधे अनुच्छेद 15 (1) की शर्तों के विपरीत है। ट्रायल कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश ने स्पष्ट रूप से केवल धर्म के आधार पर एक समुदाय के साथ भेदभाव किया है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक न्यायाधीश द्वारा व्यक्तिगत आचरण में लिप्त होकर कदाचार करना उनकी न्यायिक अखंडता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
कोर्ट ने कहा कि सीज़र की पत्नी की तरह एक न्यायाधीश को संदेह से ऊपर होना चाहिए। न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता उन न्यायाधीशों पर निर्भर है जो इसे संचालित करते हैं। लोकतंत्र के फलने-फूलने और कानून के शासन को जीवित रखने के लिए, न्याय प्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत होना होगा और प्रत्येक न्यायाधीश को अपने न्यायिक कार्यों का ईमानदारी, निष्पक्षता और बौद्धिक ईमानदारी के साथ निर्वहन करना होगा। मामले का निर्णय केवल रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और मामले पर लागू कानून के आधार पर ही करना चाहिए। यदि कोई न्यायाधीश किसी मामले का फैसला किसी बाहरी कारण से करता है तो वह कानून के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा है।

अपने पहले के स्थगन आदेश को जारी रखते हुए, न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमे को आगे बढ़ाने से रोक दिया। इसके बाद अदालत ने संबंधित आदेशों के संबंध में स्पष्टीकरण के लिए न्यायिक अधिकारी को तलब किया।

कोर्ट ने ट्रायल जज की टिप्पणियों के बारे में कहा कि यह न्यायिक कदाचार को दर्शाता है, जो एक कार्यात्मक न्यायपालिका के लिए आवश्यक चीज़ों के मूल तंत्र को तोड़ देता है। नागरिक मानते हैं कि उनके न्यायाधीश निष्पक्ष हैं। न्यायपालिका लोगों के विश्वास और भरोसे के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती। इसलिए, न्यायाधीशों को कानूनी और नैतिक मानकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। उन्हें उनके व्यवहार के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए, न्यायिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर हमला किए बिना न्यायिक आचरण की समीक्षा की जानी चाहिए।

सोमवार को जज त्रिपाठी सिंगल जज के सामने पेश हुए और बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने गलतफहमी के तहत आदेश पारित किया है और भविष्य में सतर्क रहेंगे। उनके वकील ने व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ समय मांगा, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें दो दिन का समय दिया और मामले को 18 अप्रैल को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

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