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तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज: वही पुरानी चाल

जब तक मजबूत विपक्ष नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र कमजोर होता जाएगा अपने देश में। सच यह भी है कि विपक्ष में एक ही राजनीतिक दल है, जो राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कर सकता है और वह है कांग्रेस। लेकिन कांग्रेस कर नहीं पा रही है, इसलिए कि उसके राजपरिवार की सोच अभी तक बदली नहीं है और अपनी जगह किसी और को देने के लिए वह तैयार नहीं है।
Written by: तवलीन सिंह
नई दिल्ली | Updated: March 31, 2024 10:26 IST
तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज  वही पुरानी चाल
सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे
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इस लेख को लिखने बैठी थी कि नजर पड़ी मेरे अपने एक पुराने लेख पर, जो 1999 में छपा था। उस समय सोनिया गांधी ने राजनीति में पहला कदम रखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी। राजनीति में उनका लड़कपन था, सो पूरा विश्वास किया मुलायम सिंह यादव के आश्वासन पर कि वे कांग्रेस की सरकार बनाने में पूरी मदद करेंगे लोकसभा के अंदर।

इस भरोसे सोनियाजी राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में पत्रकारों से मिली थीं और जब किसी ने पूछा कि उनको लोकसभा में कितने लोगों का समर्थन मिलने वाला है, उन्होंने कहा ‘दो सौ बहत्तर लोग हमारे साथ हैं और कई सारे और जुड़ने वाले हैं’।

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ऐसा जब नहीं हुआ और नए लोकसभा चुनाव कराने पड़े, जिसके बाद अटलजी फिर से प्रधानमंत्री बने, तो सोनियाजी इतनी हैरान थीं कि कुछ देर के लिए मौन साध लिया था उन्होंने और कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने भी। उस लेख में मैंने कहा था कि कांग्रेस को अपनी सोच बदलनी चाहिए और गांधी परिवार के ‘करिश्मा’ पर भरोसा कम करना चाहिए, नई नीतियों, नए सोच पर ज्यादा। यह भी लिखा था कि गांधी परिवार को अपने भले के लिए चमचों और खुशामदी लोगों को अपने करीबी सलाहकारों से बाहर रखना चाहिए। उस पुराने लेख को पढ़कर ऐसा लगा कि उस समय जो कांग्रेस की समस्याएं थीं, वही आज भी हैं।

सोनियाजी की जगह उनके बेटे ने ले ली है। फर्क यही है। राहुलजी ने अपनी न्याय यात्रा के हर भाषण में साबित किया है कि उनकी राजनीतिक सोच एक बहुत पुराने अतीत में अटक कर रह गई है। कहते हैं कि उनकी सरकार दिल्ली में बन जाने के फौरन बाद उनका वादा है कि जातीय जनगणना कराई जाएगी और जातियों के आधार पर सत्ता में हिस्सेदारी बांटी जाएगी। यानी मोदी ने पिछले दशक में जो प्रयास किया है ‘सबका साथ, सबका विकास’ का, उसकी जगह हम जातियों और धर्म-मजहब के आधार पर देश को फिर से बांटेंगे। उन दिनों जब देश इस तरह बंटा हुआ था, तो कांग्रेस का पूरा राजनीतिक ढांचा खड़ा था दलितों और मुसलमानों के समर्थन पर। वह कांग्रेस के लिए तो अच्छा था, पर देश के लिए बहुत नुकसानदेह।

उस दौर में हमसे दशकों आगे निकल गया चीन। आज दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। चीन में लोकतंत्र नहीं है, लेकिन बहुत ध्यान दिया है वहां के शासकों ने अपने लोगों को आधुनिक शिक्षा देने पर। ऐसा हमने किया होता तो शायद हम आज चीन का असली मुकाबला कर सकते। ऐसा हमने नहीं किया है, सो हाल यह है कि हमारे अर्ध-शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सिकुड़ गए हैं। बेरोजगार युवा, जो अपने आप को शिक्षित समझते हैं लेकिन अर्ध-शिक्षित ही हैं, इस उम्मीद में जीते हैं कि उनके लिए जातीय आधार पर सरकारी रोजगार के अवसर मिल जाएंगे कभी न कभी। निजी क्षेत्र में नौकरियां हैं, लेकिन अर्ध-शिक्षित, ग्रामीण युवाओं में क्षमता नहीं है उनको हासिल करने की।

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मोदी के दौर में गरीबी जरूर कम हुई है और ग्रामीण भारत में कई तरह के सुधार दिखते हैं, लेकिन शिक्षा में जरूरी सुधार नहीं आया है। कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन किसी भी गांव के स्कूल में जाकर आप कुछ समय बिताएंगे तो जान जाएंगे कि सरकारी स्कूलों में वह शिक्षा उपलब्ध नहीं है आज भी, जिसके बिना 2024 की दुनिया में तरक्की करना असंभव है। राहुल गांधी इसका चुनावी लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं जातिवाद का मुद्दा उठा कर, शायद यह जाने बिना कि ऐसा करने से देश और भी पिछड़ जाएगा विश्व की आर्थिक दौड़ में।

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उनके आसपास अगर असली सलाहकार होते, तो उनको सलाह अवश्य देते कि उनको अपनी राजनीतिक और आर्थिक सोच बदलने की सख्त जरूरत है। मगर उनके सलाहकार तकरीबन सारे ऐसे हैं, जिनकी मानसिकता खुशामदियों की है। कहने का मतलब यह है कि जिन गलतियों के कारण उनकी माताजी ने भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल को कमजोर किया, इतना कि दो लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हारने की नौबत आई थी, वही गलतियां आज गांधी परिवार के वारिस कर रहे हैं।

समस्या यह है कि जब भी इस तरह की बात मैं अपने किसी लेख में करती हूं, तो गालियां सुननी पड़ती हैं खूब सारी कांग्रेस के समर्थकों से। कहते फिरते हैं वे सोशल मीडिया पर कि मैं किसी पुरानी रंजिश की वजह से आलोचना कर रही हूं उनके राज परिवार की। सच तो यह है कि मैं देश में एक मजबूत विपक्ष देखना चाहती हूं लोकसभा के अंदर। जब तक मजबूत विपक्ष नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र कमजोर होता जाएगा अपने देश में।

सच यह भी है कि विपक्ष में एक ही राजनीतिक दल है, जो राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कर सकता है और वह है कांग्रेस। लेकिन कांग्रेस कर नहीं पा रही है, इसलिए कि उसके राजपरिवार की सोच अभी तक बदली नहीं है और अपनी जगह किसी और को देने के लिए वह तैयार नहीं है।

जब भी थोड़ा पीछे रहकर किसी और को मौका देते हैं, तो उभर कर आते हैं क्षेत्रीय नेता, जो चुनाव जीत कर दिखाते हैं। ऐसा तेलंगाना में हुआ है। जहां गांधी परिवार हस्तक्षेप करता है वहां हार का सामना करना पड़ता है, इसलिए कि इस परिवार में न नई आर्थिक सोच आई है, न कोई नया राजनीतिक सपना। ‘नफरत की दुकान में मोहब्बत की दुकान खोलना’ अच्छा ‘डायलाग’ बन सकता है किसी हिंदी फिल्म में, लेकिन नया सपना नहीं बनेगा आनेवाले लोकसभा चुनावों में।

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