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रविवारी विचार बोध: छोटी-छोटी बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं

हमारे आसपास ऐसे लोग ज्यादा खुशहाल नजर आते हैं, जो बहुत-सी बातों को नजरअंदाज करना जानते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 11, 2024 13:22 IST
रविवारी विचार बोध  छोटी छोटी बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(फ्रीपिक)।
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रोहित कुमार

कई बार कुछ बेपरवाहियां जिंदगी को आसान बना देती हैं। हर चीज को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं होती। बहुत बार कई चीजों को नजरअंदाज कर देना भी होता है। ऐसा न हो तो जिंदगी तनावपूर्ण बन जाए। रोजमर्रा के काम भी बोझ बन जाएं। मन हरदम खिन्नता से भरा रहे। तरह-तरह के रोग जकड़ लें।

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हमारे आसपास ऐसे लोग ज्यादा खुशहाल नजर आते हैं, जो बहुत-सी बातों को नजरअंदाज करना जानते हैं। गंभीरता से नहीं लेते, हंसी ठट्ठे में उड़ा देते हैं। ऐसी आदत को मनोविज्ञान की भाषा में 'लेटिंग गो' कहते हैं। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे, जो बड़े आराम से किसी चीज के बारे में कह देते हैं- भाड़ में जाने दो यार। मिट्टी डालो, छड्डो जी, मिट्टी डालो, मटिया दो। यह आदत लापरवाही, असावधानी, असंवेदनशीलता या नासमझी से पैदा हुई नहीं होती। जिन चीजों से जीवन में बहुत कुछ बिगड़ने वाला नहीं, उन्हें नजरअंदाज करने की यह स्वस्थ आदत होती है।

जीने का आनंद

गांव के बहुत से कम पढ़े-लिखे लोग भी गीता का यह दर्शन दोहराते मिल जाएंगे कि ‘क्या तुम्हारा है जो लेकर आए थे, क्या तुम्हारा था जो तुमने गंवा दिया, जो लिया यहीं से लिया, जो कुछ दिया यहीं दिया।’ यह भाव जीवन जीने का आनंद बढ़ा देता है। मगर बहुत सारे लोग छोटी-छोटी बातों को बहुत गंभीरता से पकड़ कर बैठ जाते हैं। दिन भर उसी बात पर सोचते रहते हैं। किसी ने कुछ कह दिया, तो न सिर्फ बुरा मान गए, बल्कि उसी बात को भीतर ही भीतर घोंटते रहे। रूठ गए उस व्यक्ति से।

घर में भी ऐसे लोगों की सदा किसी न किसी से अनबन रहती है। कभी पत्नी से, कभी बच्चों से, कभी किसी रिश्तेदार से, कभी किसी दोस्त से। ऐसे लोग प्राय: ऐसी बात को भी गंभीरता से ले बैठते हैं, जो किसी ने कभी मजाक में कह दी हो। दरअसल, ऐसे लोगों को हंसी-मजाक पसंद ही नहीं होता। जिन्हें हंसी-मजाक तक पसंद नहीं, उनकी जिंदगी भला किस तरह सहज हो सकती है? जबकि यह एक आम तथ्य है कि हंसी-खेल मन को हल्का करने का सबसे बड़ा जरिया होता है। मन हल्का रहे तो मस्तिष्क में विचारों के लिए जगह बनती है। विचार समस्याओं से पार पाने का रास्ता और जरिया बनते हैं।

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फिक्र किस बात की

चिंता, फिक्र सब मन के बनाए खेल हैं। जो इस खेल में फंस गया, उसके जीवन का रस उसने सोख लिया। इसीलिए तो इस बड़े फलसफे को भी गीतकार ने कहा कि ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।’ किसी गीतकार ने कहा, ‘फिक्र नू गोली मार यार, दिन जिंदणी दे चार।’ ऐसे कई गीत तो फिल्मों में ही मिल जाएंगे। कहावत भी है कि चार दिन की जिंदगी है, उसे फिक्र में क्यों डुबोना। पहुंचे हुए फकीरों ने तो यहां तक कहा कि मुझे फिक्र किस बात की, जब मेरी फिक्र करने वाला कोई और है।

फिर दुनिया की चिंताओं से मुक्त हो गए। नून-तेल-लकड़ी की चिंता में खुद को गलाना-तपाना छोड़ दिया। मगर जो दुखवादी हैं, उन्हें तो फिक्र में पड़ने की आदत ही पड़ जाती है। वे सहज रह ही नहीं सकते। तलाश ही लेते हैं कोई न कोई दुख अपनी जिंदगी में। ऐसे दुख, ऐसी चिंताएं प्राय: परिवार में ही पकड़ ली जाती हैं। जो नजदीक हैं, उनसे दुख अर्जित कर लेना सहज भी होता है।

अलग तरह का सुख

कई बार आपने महसूस किया होगा कि जब किसी बात को लेकर लंबे समय से आप चिंता में पड़े हों और आखिरकार इस निर्णय पर पहुंच जाएं कि छोड़ो यार, जो होगा देखा जाएगा। तब आप एक अलग सुख से भर जाते हैं। सुकून महसूस करने लगते हैं। दरअसल, देखें तो बहुत सारी चीजें हमारे वश में नहीं होतीं। हम उन्हें साधना चाहते हैं, उन्हें अपने वश में करने की कोशिश करते हैं, उन्हें पा लेना चाहते हैं, अपने कब्जे में कर लेना चाहते हैं।

सारी फिक्र, सारी चिंता वहीं से उपजती है। जो अपने वश में नहीं, उसे लेकर चिंता करने का क्या लाभ? उसे नजरअंदाज करना ही बेहतर। अगर किसी का स्वभाव आपके अनुकूल नहीं, उसे बदल पाना आपके वश की बात भी नहीं, फिर उसे लेकर चिंता में घुलते रहें, तो नासमझी ही कही जाएगी। उस फिक्र को धुएं में उड़ा देने में ही समझदारी है। फिर फिक्र को अगर ढोया भी जाए तो उसका हासिल क्या होगा? फिक्र तभी तक सही, जब तक कि वह किसी समस्या से निकलने के लिए नई राह निकालने का माध्यम बने। अन्यथा केवल फिक्र में घुलना नई समस्या को आमंत्रित करना है।

जीवन का आनंद

फिल्मी गाने की एक पंक्ति है- जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल। पास हो गए तो खुश सब होते हैं, पर असली जीवन का आनंद तो वही ले पाता है, जो फेल होकर भी हार न माने, मगर उसे दिल पर बोझ भी न बनने दे। कारोबार में घाटा हो गया, तो बहुतों का दिल बैठ जाता है। फसल चौपट हो गई तो कई खुदकुशी का पैसला कर बैठते हैं।

कोई लड़की या लड़का दोस्त दगा दे गया तो कुछ कमजोर दिल हाथ की नसें काट लेते हैं। मगर जो मुसीबतों को नजरअंदाज करना सीख जाता है, उनसे पार पाने का संकल्प लिए आगे बढ़ता रहता है, वही आनंद से जीवन जी पाता है। आज व्यापार में घाटा हुआ, आज फसल चौपट हो गई, आज कोई दोस्त दगा दे गया, कल कोई और मिलेगा। व्यापार और बढ़ेगा, फसल और अच्छी होगी।

संघर्ष का जज्बा

दरअसल, नजरअंदाज करने, बेफिक्री में, अलमस्तपने में मुसीबतों, समस्याओं से पार पाने का जज्बा बढ़ जाता है। जिंदगी को खेल की तरह जीना सीख लें, तो न सिर्फ अपनी बहुत सारी चिंताओं से पार पा लेंगे, बल्कि दूसरों के लिए भी बहुत सारी समस्याएं पैदा करने से बच जाएंगे। सबसे ज्यादा तनाव के तत्त्व रिश्तों में मिल जाते हैं, वे कई बार इतने बढ़ जाते हैं कि लोग अलग ही रहने लगते हैं। मगर रिश्तों में, दोस्ती में छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीख लें, तो जिंदगी आनंद से भर उठती है। फिर भी दूसरा अगर रूठ ही गया है, तो उसे मना लेने में संकोच नहीं होना चाहिए। कवि ने कहा भी तो है- रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।

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