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रविवारी: पढ़िए दीपक गिरकर की कहानी- गांव की वह खुशबू

अमृतलाल जी के दोनों बेटे और बहुएं बड़े सौम्य, मिलनसार और स्नेहिल हैं। बड़ा बेटा हैदराबाद में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उपाध्यक्ष है और छोटा बेटा दिल्ली में एम्स में डाक्टर है। बड़े बेटे को एक बेटी और एक बेटा है, जबकि छोटे बेटे को एक ही बेटी है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: December 17, 2023 12:48 IST
रविवारी  पढ़िए दीपक गिरकर की कहानी  गांव की वह खुशबू
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो-( इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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दीपक गिरकर

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अमृतलाल जी मन ही मन मंसूबे बांधने लगे कि जैसे ही वे सेवानिवृत्त होंगे, अपने गांव चले जाएंगे और हमेशा वहीं रहेंगे। अमृतलाल जी अपने गांव जाने की कल्पना मात्र से पुलकित हो उठे थे। यह उनके चेहरे की रौनक बता रही थी। अमृतलाल जी को अपना बचपन याद आने लगा कितने सुहाने थे वे दिन! कृष्णा भैया, कमला और वह तीनों मिलकर कितना हुड़दंग मचाया करते थे। कुछ ही पलों में हिरन की तरह छलांग लगाता बचपन उनकी स्मृति में तैरने लगा था।

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अमृतलाल जी अपनी जिद पर अड़े हुए थे कि वे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद अपने गांव में जाकर रहेंगे। जबकि उनकी धर्मपत्नी कामिनी हैदराबाद में अपने बड़े बेटे के यहां रहकर नाती-पोतों के साथ जीवन व्यतीत करना चाहती थी। अमृतलाल जी नौकरी की वजह से शहर जरूर आ गए थे, लेकिन गांव से उनका मोह जस का तस बना हुआ था।

अमृतलाल जी के दोनों बेटे और बहुएं बड़े सौम्य, मिलनसार और स्नेहिल हैं। बड़ा बेटा हैदराबाद में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उपाध्यक्ष है और छोटा बेटा दिल्ली में एम्स में एक बड़ा डाक्टर है। बड़े बेटे को एक बेटी और एक बेटा है, जबकि छोटे बेटे को एक ही बेटी है। दोनों बहुएं नौकरी नहीं करती हैं, वे अपना घर संभालती हैं। दोनों बेटों, बहुओं और नाती-पोतों ने बाबूजी की सेवानिवृत्ति के पश्चात मां-बाबूजी को साथ में रहने का बहुत बार निवेदन किया था।

अजी सुनते हो, मैं तो अपने बेटे-बहू, नाती-पोते को छोड़कर आपके साथ गांव नहीं जा पाउंगी। गांव में अब अपना रिश्तेदार तो कोई नहीं बचा है तो गांव जाकर क्या करेंगे? गांव में रहेंगे तो चार आदमी बोलने बतियाने वाले मिल जाएंगे। समय आराम से कट जाएगा और गांव का शुद्ध हवा-पानी तो मिलेगा ही।

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अचानक ही गांव अमृतलाल जी की आंखों के समक्ष किसी चलचित्र की भांति घूमने लगा। ह्यगांव का जीवन शहर की जीवनशैली से बहुत अलग होता है। गांव शहर की भागमभाग वाली जिंदगी से बहुत दूर होते हैं। गांव में भोर होने पर सुबह की अलार्म की जगह कोयल की कूक सुनाई देती है या फिर मुर्गी की कुकडूकूं। गांव में न तो शहर वाला भारी ट्रैफिक होता है और न ही भागदौड़ भरी जिंदगी।

गांव में जीवन की गति धीमी और सहज रहती है। गांव में कोई दिखावा नहीं होता। गांव के लोगों में आपस में अपनत्व और प्रेम होता है। वे आपस में सुख और दुख को बांटते हैं। सादा जीवन उच्च विचार यही गांव की पहचान है। पेड़ों की ताजा हवा, ताजा और शुद्ध दूध, रसायनों से मुक्त ताजा-ताजा सब्जियां, गांवों के चौपालों की रौनक हर किसी को गांव की ओर खींच लेती है।

मैं जब गांव में रहता था, तब गांव में उन दिनों चारों ओर असीम शांति थी। सभी ग्रामवासियों का एक दूसरे के लिए लगाव, उनका एक दूसरे की मदद के लिए सदैव तत्पर रहना, यही तो हमारे गांवों की विशेषता है। गांव के लोग बड़े ही सौम्य, मिलनसार और स्नेहिल होते हैं। शहर के लोगों में यह खूबी कोसों दूर होती है। गांव में जब भी बारिश होती है तो मिट्टी की खुशबू से दिन बन जाता है। मिट्टी की खुशबू मन को आनंद से भर देती है। वहां की मिट्टी से हमारे दिल का रिश्ता जुड़ जाता है।

गांव की मिट्टी की सोनी गंध में ही तो जीवन की गरिमा है। गांव मेरे लिए नया न्यारा नहीं है। मैं गांव में ही पैदा हुआ और इंटर तक की शिक्षा मेरी गांव में ही हुई है। यादों की पिटारी खोल वे बहुत देर तक बतियाते रहे। कामिनी उनके तर्क के सामने निरुत्तर हो गई और अमृतलाल जी के साथ गांव जाने के लिए तैयार हो गई। अमृतलाल जी का मन तो जैसे बल्लियों उछल रहा था।

अमृतलाल जी वर्षों के लंबे अंतराल के बाद गांव आए थे। गांव अब कस्बे में बदल चुका था, जहां लोगों का आपस में जैसे कोई लेना-देना न था। घरों के भीतर घुटन और घरों के बाहर मायूसी मंडराती! गांव में युवा वर्ग नशे में धुत रहता है। इस गांव के युवा गैर कानूनी मादक द्रव्यों, चरस, गांजा, हेरोइन आदि की तस्करी में संलिप्त थे। यहां आए दिन शहर से पुलिस आती रहती और नशे के कारोबारियों को अपने साथ ले जाती रहती।

पैंतीस वर्षों में गांव में कितने परिवर्तन हो गए। गांव के अधिकांश लोगों के शहर में मकान बन गए। गांव में नदी गायब हो चुकी थी। अमृतलाल जी को गांव के लोगों का बर्ताव बेहद रूखा लगा। अमृतलाल जी अपने बचपन के दोस्तों की दशा देखकर विचलित हो गए। उनके अधिकांश मित्र अपनी उम्र से बहुत ज्यादा के लग रहे थे। वे सभी बीमार थे और वीलचेयर पर या बिस्तर पर थे।

गांव की दशा देखकर वे असमंजस में पड़ गए थे। गांव आकर उनके मन में कुछ दरक-सा गया था। अमृतलाल जी गांव में चार दिनों में ही स्मृतियों के सुखद कल्पना लोक से यथार्थ के धरातल पर आ गए थे। एक सप्ताह के अंदर ही वे गांव के माहौल में ऊबने लगे थे। उन्हें गांव की वह खुशबू नसीब न हो पाई जो उसकी यादों में बसी थी। गांव में अमृतलाल जी एक महीना ही रहे।

यह एक महीना अमृतलाल जी के लिए और भी तनाव भरा साबित हुआ। वे सोच कर गए थे कि वहां शायद मन को सुकून मिलेगा या जिंदगी के नए अर्थ उन्हें भी मिल जाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांव पहुंचकर अमृतलाल जी का सारा उत्साह कपूर-सा उड़ गया। भादो का महीना। कृष्ण पक्ष की अंधेरी रात। जोरों की बारिश। हमेशा की भांति बिजली का गुल हो जाना।

अंधकार में डूबा गांव तथा अपने घर में सोए-दुबके लोग! पूरे गांव पर खौफ का कहर था, क्योंकि आज भी गांव में पुलिस आई थी और तीन लड़कों को रंगे हाथ पकड़ लिया था और उन्हें अपने साथ ले गई थी। उन तीनों लड़कों ने गांव वालों को धमकी दी थी कि जिसने भी पुलिस से मुखबिरी की है, उसे और उसके परिवार को छोड़ेंगे नहीं। अमृतलाल जी और कामिनी रात भर सो नहीं सके।

अगले दिन सुबह आकाश साफ हो गया था। बादल छंट गए थे। गांव की जो खुमारी अमृतलाल जी पर तारी रही थी, उसका अंत हो गया था। अमृतलाल जी और कामिनी अपने बड़े बेटे के पास हैदराबाद जाने के लिए सुबह पहली बस से ही शहर की ओर निकल चुके थे।

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