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रविवारी जीवन शैली: अपनी रुचियों का करें परिष्कार

रचनात्मक काम करके न केवल व्यक्ति को प्रसन्नता मिलती, वह ऊर्जावान रहता है, बल्कि उसकी सोच में सकारात्मकता भी आती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 18, 2024 11:53 IST
रविवारी जीवन शैली  अपनी रुचियों का करें परिष्कार
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(फ्रीपिक)।
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आजीवका के लिए तो अक्सर लोगों को अपनी रुचि के विरुद्ध जाकर भी काम करने पड़ते हैं। इसे लेकर कई लोग अफसोस करते भी देखे-सुने जाते हैं। खासकर महिलाओं को अपनी रुचि का उपयोग न करने का मलाल रहता है। मगर रुचियों के परिष्कार की कोई उम्र नहीं होती। उन्हें किसी भी उम्र में विकसित-परिष्कृत किया जा सकता है।

समय को व्यवस्थित करें

बहुत सारे लोग अपनी रुचियों, अपने शौक के काम इसलिए नहीं कर पाते कि वे अपने समय को व्यवस्थित नहीं कर पाते। वे अपने को आजीविका में इस कदर उलझा लेते हैं कि संगीत, चित्रकला, अभिनय, साहित्य लेखन आदि जैसी अपनी रुचियों के लिए समय ही नहीं मिल पाता। महिलाओं पर दफ्तर के कामकाज के साथ-साथ घर के बहुत सारे काम का बोझ होता है। मगर फिर भी, रोज न सही हफ्ते में एक-दो दिन भी वक्त निकाल कर अपनी रुचि का काम कर लें, तो उन्हें संतोष मिलता है।

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ऊर्जा का संचार

अपनी रुचि का काम करने से व्यक्ति के भीतर ऊर्जा का संचार होता है। अपनी रुचि का काम करे उसे जो प्रसन्नता मिलती है, वही उस ऊर्जा का स्रोत होती है। इस तरह कई शारीरिक व्यतिक्रमों यानी डिसआर्डर से भी मुक्ति मिलती है। तब रोजमर्रा या दफ्तरी कामकाज से जो ऊब और तनाव पैदा होता है, वह भी दूर हो जाता है। इसलिए जिस भी रचनात्मक काम में आपकी रुचि हो, उसका परिष्कार जरूर करें। हर व्यक्ति में कोई न कोई रचनात्मकता होती है, अपनी रचनात्मक क्षमता को पहचानें और परिष्कृत करें।

सकारात्मक सोच का स्रोत

रचनात्मक काम करके न केवल व्यक्ति को प्रसन्नता मिलती, वह ऊर्जावान रहता है, बल्कि उसकी सोच में सकारात्मकता भी आती है। उसके नकारात्मक विचार समाप्त होने लगते हैं। इस तरह वह अपने परिवार और समाज में भी एक प्रकार की सकारात्मक तरंगों का संचार करता है। हर समय थकान, ऊब और तनाव को दिमाग में बिठाए रख कर व्यक्ति न केवल अपना स्वास्थ्य खराब करता रहता, बल्कि परिवार के लोगों की सेहत भी बिगाड़ देता है। इसलिए अपनी रचनात्मक रुचि का परिष्कार कर सकारात्मक सोच का स्रोत बनें।

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निराश न हों

कई लोग इस हिचक के चलते अपनी रुचि के रचनात्मक काम नहीं शुरू करते या आगे बढ़ाते कि वे उसमें आत्यंतिक गुणवत्ता यानी परफेक्शन नहीं महसूस कर पाते। इसके फेर में न पड़ें। अगर संगीत में रुचि है, तो यह सोच कर गाना या बजाना न बंद कर दें कि आप बड़े उस्तादों जैसा नहीं गा या बजा पाते। जिस भी टूटे-फूटे रूप में कर सकते हों, उसे करें। चित्र बनाने का अभ्यास कर सकते हैं, कविता, कहानी लिखने की रुचि का विकास कर सकते हैं। अगर खराब भी हो रहा हो, तो निराश न हों, उससे आनंद तो मिलता ही है।

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