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पढ़िए अपर्णा चौधरी रचना की कहानी: रसिका की साइकिल

ड्राइवर बताने लगा रसिका को कि अब गांव के लोग अपने बच्चों को साइकिल नहीं, स्कूटी दिला रहे हैं स्कूल जाने के लिए। रसिका ने ड्राइवर से कहा कि साइकिल की बात ही दूसरी थी।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | February 04, 2024 12:51 IST
पढ़िए अपर्णा चौधरी रचना की कहानी  रसिका की साइकिल
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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अपर्णा चौधरी रचना

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लगभग बारह वर्षों बाद रसिका अपने गांव वापस लौटी थी। दिल्ली में स्रातक कि पढ़ाई करने के बाद वह सीधे अमेरिका चली गई थी परास्रातक और शोध की शिक्षा के लिए। उसके मन मे अपने पुराने गांव की तस्वीर थी। कार से गांव की ओर जाते हुए रसिका ने ड्राइवर से पूछा कि गांव में क्या-क्या बदल गया है! ड्राइवर ने बताया कि अब गांव में बिजली और पानी की सुविधा आ गई है। लड़के-लड़कियां सब स्कूल के बाद कोचिंग में पढ़ने जाते हैं। गांव के तालाब पक्के बन गए हैं। कुओं के ऊपर छाया कर दी गई है।

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रसिका ने गाड़ी से मुंह निकालकर देखा कि अब भी मड़नी चलती है या नहीं। तभी साइकिल से एक महिला को जाते देखकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। उसके बचपन में यह भी अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि की श्रेणी में गिना जाता था। गांव की सड़क से गुजरते हुए उसे याद आया कि कैसे मोहल्ले के कई लड़के साइकिल दौड़ाते हुए निकलते थे।

शाम को महाभारत का एक अध्याय सुनाने के बाद रसिका के बाबा का निर्देश मिला कि जीवन में चिड़िया की आंख भेदने का लक्ष्य होना चाहिए और उसके लिए वह आंख साइकिल है। यह भी बताया गया कि दो दिन से ज्यादा नहीं लगेंगे, इसमे अगर मन लगा कर सीखा गया तो। तय हुआ कि जहां बाबा ताश खेलते हैं, वहां से साइकिल चलाते हुए गुजरना है, ताकि लोग जान लें कि उनकी पोती अब साइकिल चला लेती है।

रसिका पुराने दिनों में खो गई। एक पूरी रात उसके सपने में साइकिल आई। एक पांव डंडे के इस पार, दूसरा उस पार और पैडल मारना है, हैंडल संभाले रखना है। उसने सोच लिया था कि स्कूल साइकिल से जाएंगे। गाड़ी के किराए का जो पैसा बचेगा, उससे ट्यूशन फीस दी जाएगी. आखिर बड़ी बेटी थी घर की, उसे हाथ बंटाना चाहिए खर्चों में। पूरी सड़क पर साइकिल दौड़ाई जाएगी, मुहल्ले के लड़कों से भी तेज।

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सुबह स्कूल में सबको बता दिया कि दो दिनों बाद साइकिल से वह आएगी। रवि, सूरज, इलियास, रेखा, बिंदु… सब अचरज वाली नजरों से देख रहे थे। दोपहर के अवकाश में सबने उसे घेर लिया जानकारी के लिए। साइकिल में हवा कितनी हो, चैन कैसे चढ़ाई जाए, ग्रीस कहां-कहां लगती है. हैंडल तिरछा हो जाए तो क्या किया जाए आदि। सारे सवाल सुने गए और उनका उत्तर बहुत जल्दी देने की बात कही गई।

अगले ही दिन रसिका निकल चली साइकिल लेकर। पहली कोशिश में साइकिल में दोनों तरफ पांव करने की कोशिश की, पर ठीक दो मिनट बाद वह जमीन पर ताजा गोबर के ऊपर थी और साइकिल उसके ऊपर। रेहू की अम्मा कुआं पर कपड़े धो रही थी, फूलदुलारी आजी अपनी बहुरिया को गरियाए जा रही थी कि उसने सबेरे बिना नहाए ही रोटी सेंक दी थी, राकेश की भौजाई अपनी देवरानी के मायके से आई पेड़ियां में सिक्का न मिलने की बात से तमतमाई थी। इन सबका ध्यान रसिका पर गया। सब ठठा कर हंस पड़ीं।

इसी बीच चिंटू साइकिल से ‘आधी कैंची’ चलाते हुए निकला। चिंटू की अम्मा अपने घर के मुहार पर खड़ी हो गई और कुएं वाली औरतों को बताने लगी कि उनके चिंटू ने कितनी जीतोड़ मेहनत की है साइकिल सीखने में। यह सबके बस की बात नहीं… जनानियों को तो बिल्कुल नहीं आएगा। अरे लड़के, लड़के होते हैं।

इस बात पर सबने हामी भरी। फाइव-जी की गति से शुकुल के लड़के ने बात पहुंचाई रसिका के बाबा को। शाम को हवेली के कठघरे में पहले तो अर्जुन ने कैसे तपस्या करके शिवजी से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए, ये सुनाया गया। फिर दिन की घटना पूरे विस्तार से सुनी गई। रसिका ने अस्त्र डाल दिए और कहा कि यह साइकिल बड़ी है… पांव नहीं पहुंचते और उसे नहीं करनी ये चिंटू, पिंटू से प्रतिस्पर्धा।

आखिर ये लोग भी तो खानदान के ही हैं, जरूरत पड़ी तो इन्हीं के साथ साइकिल पर बैठ लिया जाएगा। बदले में गीता का सार सुनाया गया कि कोई अपना नहीं है, प्रतिस्पर्धा में प्रतियोगी पर कोई दया नहीं। कुल मिलाकर एक ही विकल्प दिया गया जो साइकिल सीखना था, कैसे भी।

रसिका के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई कि कैसे उसने साइकिल एक पूरी प्रक्रिया से सीखी थी। पहले केवल सड़क पर यों ही साइकिल थामे घूमा करती थी। फिर आधी कैंची, फिर पूरी, इसके बाद डंडा, फिर गद्दी, फिर ‘केरियल’। सब नहर किनारे उड़ती धूल में गाय-भैंसों के झुंड से बचते-बचाते सीखा था। पूरी सीख लेने के बाद साइकिल से उतरना नहीं आता था। उतरने के लिए ऊंचा स्थान देखना पड़ता था, सहारा लेने के लिए। खैर… सात-आठ दिन बाद वह भी सीख लिया था।

रसिका को आश्चर्य हुआ कि अब उसकी साइकिल वाला गांव बहुत बदल चुका था। पांच से सात मिनट के अंतर पर एक लड़की और दो महिलाएं, जो बहुएं थीं, स्कूटी चलाते हुए दिखी थीं। ड्राइवर बताने लगा कि अब गांव के लोग अपने बच्चों को साइकिल नहीं, स्कूटी दिला रहे हैं स्कूल जाने के लिए। रसिका ने ड्राइवर से कहा कि साइकिल की बात ही दूसरी थी। कितनी खुशी मिलती थी।

शायद स्कूटी ने साइकिल को अप्रासंगिक बना दिया है। न बच्चों में वह उत्साह दिखता है और न ही सड़कें साइकिल चलाने वालों को कोई जगह देती हैं। इस तरह तो हमारा समाज भी मानवीय मूल्यों से दूर हो जाएगा जैसा कि अमेरिका में है और लोग प्रकृति के बजाय मशीनों पर आश्रित हो जाएंगे।

ड्राइवर मुस्कुराया और बोला, ‘दीदी अगर आपको अमेरिकी समाज से इतनी शिकायतें है तो आप खुद वहां क्यों गई?’ रसिका ने सोचने की कोशिश की कि इस बात का जवाब क्या दिया जाए। शायद इसका कोई उपयुक्त जवाब उसके पास नहीं था। ड्राइवर ने आगे कहा- ‘विदेश में रहने वाले लोग खुद तो अच्छा जीवन जीते हैं, पर हम लोगों से उनकी उम्मीद यह रहती है कि हम गोबर-मिट्टी में ही सने रहें।’ रसिका सोचने लगी कि शायद जीवन कि लय और गति यही है। चीजें बदलती रहनी चाहिए। इस बीच ड्राइवर ने कहा, ‘जैसा आप आज के दस बरस पहले सोचती थी या करती थीं, क्या आज वैसा सोचती हैं या करती हैं?’

रसिका ने उसकी ओर ध्यान से देखा, मानो जीवन का सारा दर्शन उसे इसी ड्राइवर से मिलने वाला हो। रसिका ने पूछा, ‘तो क्या तुम अपने बचपन को विस्मृत कर चुके हो?’ ड्राइवर भी रसिका की उम्र का ही था और पास के गांव मे रहता था। उसने जवाब में कहा, ‘जो पिछड़ापन हमारी पीढ़ी में रहा, वह आगे की पीढ़ी में न रहे। यही अच्छा है कि हम आगे बढ़ें, न कि पीछे लौटें।’

रसिका को यह बात जंची और उसने सोचा कि विकल्पों में विस्तार होते रहना चाहिए। जब वह गांव में थी, तब किसी लड़की का साइकिल चलाना सीखना ही बड़ी बात थी, पर अब लड़कियां स्कूटी चला रही हैं। उसी गांव में यह देखकर सुकून मिलता है। कुछ परिवर्तन प्रगतिशील होते हैं, यह शायद वैसा ही कुछ है। यही सोचते-सोचते वह कार से नीचे उतरी और अपने घर की ओर मुड़ गई।

चिंटू की अम्मा अपने घर के मुहार पर खड़ी हो गई और कुएं वाली औरतों को बताने लगी कि उनके चिंटू ने कितनी जीतोड़ मेहनत की है साइकिल सीखने में। यह सबके बस की बात नहीं… जनानियों को तो बिल्कुल नहीं आएगा। अरे लड़के, लड़के होते हैं।
इस बात पर सबने हामी भरी।

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