scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

रविवारी: पढ़िए पूरन सरमा की कहानी कारण

पर घर में पूरे आठ प्राणी हैं। करें, तो क्या करें? रामधन को लगता है एक दिन उसके बच्चे और उसकी पत्नी उसके सामने दम तोड़ देंगे। इतना सोचते ही उसका कलेजा मुंह से बाहर आने को होता है। फिर वह हिम्मत करके मन को समझाता है कि वह ऐसी स्थिति कभी पैदा नहीं होने देगा। चाहे वह भूख से मर जाएगा, लेकिन अपने परिवार को नहीं मरने देगा।
Written by: पूरन सरमा | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: November 26, 2023 10:00 IST
रविवारी  पढ़िए पूरन सरमा की कहानी कारण
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
Advertisement

पिछले कई दिनों से रामधन को उसके गुजरे दिन दुखी करते रहे हैं। अपनी पारिवारिक समस्याओं पर उसने लाख बार सोचा है, पर कोई ठोस निर्णय वह उनके ऊपर नहीं ले पाया है। अक्सर वह सोचता है, वह क्या था और क्या हो गया? अब आगे क्या होगा, यह सोचकर तो वह भीतर तक डर जाता है और एक अजीब पीड़ा से मन परेशान-सा हो उठता है। उसे याद आते हैं आज से दस वर्ष पहले के दिन। वह जिंदगी भी क्या जिंदगी थी? उसके पास उन दिनों सुख कितना था? उसकी पत्नी बन्नो भी उन दिनों कम सुखी नहीं थी, और अब बन्नो जैसे मुरझा गई है। पच्चीस बरस की उम्र पर पहुंचते-पहुंचते तो सारी जवानी हाड़-मांस का ढांचा बनकर रह गई है।

इस समय वह स्वयं भी कम नहीं थका है। तीस वर्ष की उम्र में ही बूढ़ा हो गया है। जब उसकी शादी हुई थी, तब वह बहुत खुशहाल था। वह दिन भर खेत में काम करता था और दोपहर में बन्नो रोटी लेकर आती थी। दोनों फिर साथ-साथ खाना खाते थे, बहुत आनंद आता था। वहीं खेत पर झोपड़ी की छाया में देर तक लेटे-लेटे बातें करते थे, उन दिनों तो बस होठों से कभी हंसी नहीं हटती थी।

Advertisement

शाम होते ही वह बैलों को लेकर घर लौटता और बन्नो के साथ चूल्हे के पास बैठा बातें करता रहता था। उन दिनों पता ही नहीं चलता था कि रात-दिन कैसे बीत जाते थे, सब कुछ हंसी-खुशी में गुजर रहा था।जमीन तो पहले भी इतनी थी, जितनी आज है, जमीन कुल डेढ़ बीघा ही तो थी। किसी बात का जरा भी अभाव न था। किसी चीज की जरूरत पड़ती तो खरीदने में कतई परेशानी नहीं होती थी।

महाजन से उधार लेने की नौबत भी नहीं आती थी, और अब तो पैसे-पैसे के लिए मुंह ताकना पड़ता है। उसे याद आता है, जब उसके टाइफाइड निकला तो दो महीने तक घर से बाहर भी नहीं निकल पाया था। तब बचे हुए पैसे ही तो काम आए थे। वर्ना उस समय तो जिंदगी खतरे में ही थी। दवा की व्यवस्था समय पर नहीं होती, डाक्टर को समय पर पैसे नहीं देते तो मुश्किल ही थी। वह तो इलाज में कोई कमी नहीं रही इसलिए जल्दी चंगा हो गया।

Advertisement

इतना सोचकर रामधन ने लंबी सांस ली और मन ही मन में बोला, ‘मंगला काका ठीक ही तो कहता है। समय-समय की बात है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। वह समय भी नहीं रहा तो यह समय भी नहीं रहेगा।’ आजकल यही सोचकर रामधन मन को धीरज बंधाता है। पर इस सबके पीछे एक सत्य है, उसे जानते हुए भी वह टालता है और उसके बोझ को मन पर लादे अकेला ढोता है। वह इस बात को भी पूरी तरह जानता है कि इस सत्य ने ही उसके मन में दुख-परेशानी और घुटन भर दी है।

Advertisement

कितने दिनों तक वह इस सत्य को खुद से छुपाएगा? यह प्रश्न भी उसके मन को बहुत बेचैन करता है। इन बातों के साथ-साथ उसके सामने वह दृश्य घूमता है जब उसका पहला लड़का हुआ था। कितनी खुशी मनाई गई थी, गांव में अंगे्रजी बाजा बजाया गया था। गांव भर में गुड़ भी बांटा गया था। बहुत दिनों तक खुशी के गीत घर में गाए जाते रहे थे।

उन दिनों ही वह यह भी सोचने लगा था कि वह अपने लड़के को खूब पढ़ाएगा और कोई बढ़िया नौकरी पर लगाएगा। उन दिनों उसका सपना था कि उसका लड़का कोई बड़ा अफसर जरूर बनेगा। आज जब उसकी छठी संतान के रूप में घर में बेटे ने जन्म लिया है, न तो बाजा बजाया गया, न गांव में गुड़ बंटा और न ही खुशी के गीत गाए गए। इस नए पुत्र ने ही कौन से पाप किए हैं। बिल्कुल भी खुशी नहीं हुई है। एक सामान्य-सी घटना की तरह सब कुछ गुजर गया। वह संतान को होनी मानकर सोचता है वह तो होती है। जिस पुत्र को उसने अफसर बनाने का सपना देखा था, वह आज उसके साथ खेत में पानी मोड़ता है।

पैसे की कमी ने जैसे रामधन की कमर ही तोड़ दी है। बड़े लड़के को पांचवीं कक्षा तक पढ़ाकर स्कूल भेजना बंद करना पड़ा है। घर की जिम्मेदारियां इस बीच बढ़ती गई हैं, लेकिन आमदनी का साधन केवल वह डेढ़ बीघा जमीन है। अब तो रामधन को यह भी लगता है कि धरती की उत्पादन शक्ति दिनों-दिन घट गई है। इस साल तो वर्षा नहीं होने से सारी खेती चौपट हो गई है। फसल को सूखा खा गया है। अबकी बार तो सारे इलाके में अकाल की छाया अपने पंख फैला रही है। आदमी भूख से दम तोड़ देगा, ऐसा लगता है।

यह सोचकर तो रामधन का मन भीतर से बहुत घुटता है। उसके सामने उसके छह बच्चों की तस्वीर घूमने लगती है। जैसे कि वे सबके सब भूख के मारे चिल्ला रहे हों और रोटी के अभाव में अपना दम तोड़ रहे हों। बन्नो भी अब तो जैसे एक जिंदा लाश है। सारे घर में एक अजीब-सा सन्नाटा है। सारा घर-परिवार एक-दूसरे से अलग होकर जी रहा है। एक या दो प्राणी घर में हों तो रास्ता निकाला जाए।

पर घर में पूरे आठ प्राणी हैं। करें, तो क्या करें? रामधन को लगता है एक दिन उसके बच्चे और उसकी पत्नी उसके सामने दम तोड़ देंगे। इतना सोचते ही उसका कलेजा मुंह से बाहर आने को होता है। फिर वह हिम्मत करके मन को समझाता है कि वह ऐसी स्थिति कभी पैदा नहीं होने देगा। चाहे वह भूख से मर जाएगा, लेकिन अपने परिवार को नहीं मरने देगा। कभी-कभी वह यह भी सोचता है कि यह स्थिति उसने स्वयं पैदा की है। पर, इस बात को तो वह जानते हुए भी छिपाता है।

इस सोच-विचार में वह अपने परिवार को ही शामिल नहीं करता है। उसके दो बैल भी चारे के नहीं होने से आधे भूखे रहते हैं। इस बात का दुख भी रामधन के मन में कम नहीं है। बैल उसकी आमदनी का एकमात्र सहारा है। वे भूखे रहें, रामधन कभी भी यह सहन नहीं कर सकता। अबकी बार तो चारा भी सूख गया। बैलों के हाड़ निकल रहे हैं। आंखों से पानी और गीड़ गिरते हैं। लगता है कि ऐसा ही कुछ और हुआ तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे। आखिर किस बात की कटौती की जाए! घर में कटौती होने से बच्चों के भूखे रहने का सवाल है।

वैसे, रामधन इस समय भगवान का आभार मानता है कि इन दिनों उसके किसी बच्चे को कोई हारी-बीमारी नहीं है। वरना दवा-दारू की मुश्किल आ खड़ी होती। घर को छोड़कर कहीं बाहर नौकरी को जाने के लिए भी पहले पैसे होने चाहिए। पर, इसके साथ वह यह भी सोचता है कि हिम्मत हारने से बात नहीं बनेगी।

कुछ न कुछ मेहनत-मजदूरी तो करनी ही पड़ेगी। फिर वह भले वहां से कमाकर भेज देगा। इस समय जो समस्या आ खड़ी हुई है, उसे तो सुलझाना ही होगा। इस निश्चय के साथ ही वह अपनी पत्नी बन्नो के पास जाकर बोला, ‘बन्नो सुनती हो! राज्य में सूखा पड़ा है। सरकार ने भी अकाल की घोषणा की है। मुंह छिपाने और जिम्मेदारियों से अपने को बचाने से पार नहीं पड़ेगी, मैं शहर की ओर जाऊंगा। तुझे सावधानी से बच्चों का और बैलों का ध्यान रखना है। शहर में सड़क कूटने और पत्थर तोड़ने का काम करूंगा। पैसे कमाकर तुझे जल्दी ही भिजवा दूंगा। किसी तरह की चिंता मत करना। मेरे लिए आज शाम की रोटी और कपड़ों की गांठ बांध दे।’

यह सुनकर बन्नो की आंखें गीली हो गई। रोटी और कपड़ों की गांठ बांधकर और देकर वह रामधन को लगातार देखने लगी। रामधन बोला, ‘मन छोटा मत कर। जल्दी ही आ जाऊंगा।’ यह कहकर वह घर के दरवाजे की ओर बढ़ा पर फिर पलटकर बन्नो के कान के पास जाकर बोला, ‘बन्नो, परिवार की और जिम्मेदारी भी अब नहीं बढ़ानी है। शहर से अब की बार आते समय डाक्टर से सलाह करके आऊंगा। ज्यादा बच्चे ठीक नहीं हैं। यदि ऐसे समय बच्चे कम होते तो तुझे छोड़कर शहर जाने की नौबत नहीं आती।’ बन्नो की आंखों से दो गर्म जल की बूंदें जमीन पर गिर पड़ीं। रामधन ने गांठ कंधे पर रखी और शहर की तरफ कमाने चल दिया।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो