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पी. चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर: निराशाजनक विकास दर

सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था’, ‘दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ या ‘पांच ट्रिलियन अमेरिकी डालर की अर्थव्यवस्था’ जैसे आत्मसम्मोहन और अपना महिमामंडन करने वाले जुमलों के साथ अर्थव्यवस्था का उत्सव मनाना निहायत फिजूल है।
Written by: पी. चिदंबरम | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 25, 2024 09:49 IST
पी  चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर  निराशाजनक विकास दर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नियमित रूप से अपना संदर्भ ‘मैं’ या ‘मेरे’ के बजाय तृतीय पुरुष में देते हैं। ऐसी आदत के लिए एक शब्द है: अवैधता (इलेइज्म)। यह एक विचित्र कल्पना लग सकती है, मगर यह तथ्य स्थापित हो चुका है: कि मोदी ही भारत सरकार हैं और मोदी ही अकेले सरकार के अच्छे और बुरे के लिए जिम्मेदार हैं। अमित शाह को छोड़कर बाकी सभी मंत्री, पार्टी नेता, सांसद, यहां तक कि मुख्यमंत्री भी महत्त्वहीन हो गए हैं। विडंबना यह है कि वे सब महत्त्वहीन होने में ही प्रसन्नता का अनुभव करते हैं! इसलिए, हमारी अपीलें या आलोचनाएं केवल माननीय प्रधानमंत्री को संबोधित होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने एक नया नारा गढ़ा है: विकसित भारत। ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ से शुरू हुई नारों की एक लंबी शृंखला है, मुझे उम्मीद है कि यह आखिरी नारा होगा। कई नारे धरे के धरे रह गए। ‘विकसित भारत’ एक लक्ष्य है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री ने कहा है कि हमें 2047 तक वहां पहुंचना होगा। अब से लेकर 2047 के बीच चाहे जो सरकार में रहे, यह तय है कि 2024 की तुलना में भारत अधिक विकसित देश होगा, ठीक उसी तरह जैसे 1947 की तुलना में भारत 2024 में अधिक विकसित देश है। विकसित भारत की परिभाषा यही है।

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गतिमान गोलपोस्ट

सबसे पहले हमें गोलपोस्ट को स्थिर करना होगा। गोलपोस्ट गतिमान नहीं हो सकता। पांच ट्रिलियन यानी पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था के लिए, मूल लक्ष्य-वर्ष 2023-24 था। धीरे-धीरे खींच कर उसे 2027-28 तक बढ़ाया गया है। वित्तवर्ष 2023-24 के अंत तक भारत की जीडीपी का आकार 172 लाख करोड़ रुपए होगा। यह मौजूदा विनिमय दर के हिसाब से 3.57 लाख करोड़ अमेरिकी डालर बैठता है। अगर यही विनिमय दर बनी रहती है, तो अलग-अलग विकास दरों के अनुसार पांच ट्रिलियन अमेरिकी डालर के लक्ष्य तक पहुंचने में लगने वाले वर्षों का अनुमान अलग-अलग हो सकता है:

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विकास दर %वर्षों की संख्यालक्ष्य तक पहुंचने का वर्ष
662029-30
752028-29
84.5सितंबर 2028

अगर डालर और रुपए की विनिमय दर बिगड़ती है, तो गोलपोस्ट को और पीछे ले जाना पड़ेगा।

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पिछले दस वर्षों में भाजपा/राजग सरकार का कामकाज निराशाजनक ही रहा है। नई शृंखला के तहत यूपीए के 6.7 फीसद की दर (पुरानी शृंखला के तहत यह 7.5 फीसद थी) के मुकाबले, एनडीए सरकार दस वर्षों में केवल 5.9 फीसद की वृद्धि दर हासिल करने में सफल रही है।
क्या भाजपा इस शेखी के साथ कदम बढ़ाते हुए विकास दर बढ़ा पाएगी?

भाजपा में कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता, क्योंकि विकास दर बाहरी कारकों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के घरेलू प्रबंधन पर भी निर्भर करती है। अनिश्चितताओं के बावजूद, अगर मोदी तीसरा कार्यकाल हासिल करने में सफल हो जाते हैं और अर्थव्यवस्था प्रतिवर्ष आठ फीसद की दर से बढ़ती है, तो भारत की जीडीपी उनके तीसरे कार्यकाल के पांचवें वर्ष में मुश्किल से पांच लाख करोड़ अमेरिकी डालर तक पहुंच पाएगी।

विकसित होने का मतलब

मान लीजिए, भारत की अर्थव्यवस्था 2028-29 तक पांच ट्रिलियन अमेरिकी डालर के स्तर तक पहुंच जाती है, तो क्या भारत को एक विकसित देश कहा जा सकता है? 2028-29 में पांच ट्रिलियन अमेरिकी डालर और डेढ़ अरब की आबादी पर, प्रति व्यक्ति आय 3333 अमेरिकी डालर होगी। इसके चलते भारत निम्न मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था की श्रेणी में ही रहेगा।

प्रति व्यक्ति आय के आधार पर, दुनिया के देशों में फिलहाल भारत का स्थान 140 (मामूली संदर्भ में) है। 2028-29 तक इस स्थान में पांच-दस पायदान का सुधार हो सकता है। ‘सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था’, ‘दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ या ‘पांच ट्रिलियन अमेरिकी डालर की अर्थव्यवस्था’ जैसे आत्मसम्मोहन और अपना महिमामंडन करने वाले जुमलों के साथ अर्थव्यवस्था का उत्सव मनाना निहायत फिजूल है। मुझे इनमें से कोई भी पसंद नहीं और माननीय प्रधानमंत्री को भी पसंद नहीं होना चाहिए।

प्रासंगिक प्रश्न

कुछ प्रश्न प्रासंगिक हैं और उन पर आने वाले चुनाव में बहस होनी चाहिए: बहुआयामी गरीबी भारत पर एक कलंक है और 22 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। भारत यह कलंक कब मिटा पाएगा? यूएनडीपी के अनुसार, 2005-2015 के दौरान 27 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया। 22 करोड़ लोगों को गरीबी से कब बाहर निकाला जाएगा?

  1. बेरोजगारी और महंगाई लोगों की दो सबसे बड़ी चिंताएं हैं। मुझे याद नहीं आ रहा कि माननीय प्रधानमंत्री ने इन दो ज्वलंत मुद्दों पर आखिरी बार कब बात की थी। मुझे यह भी याद नहीं है कि माननीय प्रधानमंत्री ने आखिरी बार चीन पर कब बात की थी; मणिपुर; राजनीतिक दलबदल; राजनीतिक दलों को तोड़ने; निजता के अधिकार; नैतिक पुलिसिंग; या बुलडोजर न्याय पर कब बात की थी। राजनीतिक दलों को इन मुद्दों को बार-बार उठाना चाहिए और माननीय प्रधानमंत्री को उन मुद्दों पर अपनी सोची-समझी चुप्पी तोड़ने के लिए मजबूर करना चाहिए, जो लोगों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। भाजपा में जो एकमात्र व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है, उसे बोलना ही चाहिए।
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