scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

जनसत्ता प्रश्नकाल: यह राजनीतिक पलटीमार युग, प्रतिबद्धता नहीं सुविधा का सवाल

भारतीय राजनीति में 2014 के बाद के बदलाव को समझने के लिए सत्तर के दशक में जाना होगा जब गैर कांग्रेसी सरकार के लिए मुहिम चली, परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठी। केसी त्यागी भारतीय राजनीति के उन चेहरों में हैं जिन्होंने राजनीतिक प्रतिबद्धता को राजनीतिक सुविधा में बदलते देखा है। आज जब 2024 के आम चुनावों की तारीखें ऊंगलियों पर गिनी जा रही हैं तब विपक्ष का वह गठबंधन क्षत-विक्षत है जिसे नीतीश कुमार ने अपनी अगुआई में खड़ा किया। आज जद (एकी) राजग गठबंधन का हिस्सा है। विपक्ष का गठबंधन छोड़ कर नीतीश कुमार का राजग में शामिल होने का कदम आज भी सवालशुदा है। इन सवालों का जवाब देने के लिए नीतीश कुमार के विशेष सलाहकार और जद (एकी) के प्रमुख प्रवक्ता केसी त्यागी से बेहतर और कौन हो सकते थे?
Written by: मुकेश भारद्वाज
नई दिल्ली | Updated: March 31, 2024 10:15 IST
जनसत्ता प्रश्नकाल  यह राजनीतिक पलटीमार युग  प्रतिबद्धता नहीं सुविधा का सवाल
जनता दल (यू) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी।
Advertisement

जद (एकी) नेता केसी त्यागी का कहना है कि आज राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं, राजनीतिक सुविधा का समय है। पलटने के आरोप नीतीश कुमार पर लग रहे हैं, लेकिन यह राजनीतिक पलटीमार युग है। उनका आरोप है कि इंडिया गठबंधन से नीतीश कुमार ने इसलिए नाता तोड़ा क्योंकि कांग्रेस की तिकड़मबाजी के कारण घोर निराश हो चुके थे। वो नीतीश थे जिन्होंने तीसरे मोर्चे को आधारहीन बता कर कांग्रेस के साथ अन्य क्षेत्रीय दलों को खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन, जब देश में ज्यादातर क्षेत्रीय दल कांग्रेस के विरोध में ही उभरे हैं तो यह साझेदारी चल नहीं सकती है। सारे प्रयोग कर चुके नीतीश कुमार अब पाला नहीं बदलेंगे। नई दिल्ली में केसी त्यागी के साथ कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के चुनिंदा अंश।

मुकेश भारद्वाज- 2024 की लड़ाई में विपक्ष को इकट्ठा करने की अगुआई करते हुए नीतीश कुमार सामने आए। विपक्ष के गठबंधन को धूम-धड़ाके से ‘इंडिया’ नाम दिया गया। फिर ऐसा क्या हुआ कि जिसे खुद बनाया नीतीश कुमार ने उसे ही तोड़ दिया। इसके वास्तविक कारणों को आज हम आपसे जानना चाहेंगे।
केसी त्यागी: 27 सितंबर 2022 से इसकी शुरुआत हुई। हिसार में चौधरी देवीलाल की जयंती में नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, ओम प्रकाश चौटाला, सीताराम येचुरी, डी राजा, शिवसेना के नेता अरविंद देसाई और फारुक अब्दुल्ला मिलते हैं। यह तीसरा मोर्चा बनाने के पैरोकारों का दौर था जिनमें ममता बनर्जी, केसीआर, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव थे। हम खुद तीसरे मोर्चे के जनक रहे हैं जब देवगौड़ा जी प्रधानमंत्री बने। इसे लेकर हमारा अनुभव है। हमारा मानना है कि आज के दौर में तीसरे मोर्चे जैसी कोई चीज संभव नहीं है। नीतीश कुमार ने कहा कि कांग्रेस को साथ लाए बगैर कोई मोर्चा भाजपा के खिलाफ सफल नहीं होगा, चाहे पहला बनाओ या दूसरा। दिल्ली में आकर वो लालू प्रसाद, राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मिल कर इसके लिए शुरुआत करने को कहते हैं। पांच महीने तक इंतजार करने के बाद नीतीश कुमार अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद, शरद पवार से मिलकर पटना में बैठक बुलाते हैं। असंभव को संभव करते हुए वो कांग्रेस पार्टी के नेताओं के बराबर में केजरीवाल, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव को बिठाने में कामयाब हो जाते हैं। उसके बाद फिर कई महीने तक कोई बैठक नहीं होती। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद एक मीटिंग बंगलुरु में होती है। लेकिन, तब तक न कोई संगठन का स्वरूप था, न सीटों के बंटवारे पर कोई चर्चा। किसी तरह की कोई गंभीर चर्चा नहीं। संसद सत्र के करीब आने पर मुंबई में बैठक होती है। तीन-चार समिति बनती है, उनमें से एक समिति का मैं भी सदस्य रहा। मैं आज तक उस समिति की बैठक में नहीं बुलाया गया। ऐसी असक्रियता मैंने अपने 50 साल के राजनीतिक जीवन में नहीं देखी थी। बहुत आग्रह के बाद अशोका होटल में बैठक होती है। इन सारी बैठकों का संयोजन और आयोजन कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में हुआ। अन्य पार्टी से एक-दो लोग और कांग्रेस पार्टी से एक दर्जन लोग इन बैठकों में होते थे और अपने तरीके से संचालित करते थे। अशोका होटल की बैठक में ममता दीदी अचानक से खड़ी होकर कहती हैं कि मैं चाहती हूं कि प्रधानमंत्री का चेहरा के रूप में सबसे उत्तम खरगे साहब हैं।

Advertisement

मुकेश भारद्वाज- जबकि मुंबई की बैठक में तय हो गया था कि प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में किसी के नाम को आगे नहीं बढ़ाया जाए?
केसी त्यागी: जी, यह उसी तिकड़मबाजी राजनीति का हिस्सा था। उसके बाद संयोजक के पद के लिए जब चर्चा चलती है तो श्री राहुल गांधी कहते हुए पाए गए कि ममता दीदी को नीतीश कुमार के नाम पर ऐतराज है। अब तो कांग्रेस पार्टी के नेता ये भी कहते हैं कि लालू प्रसाद जी भी नीतीश कुमार को किसी बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने के खिलाफ हैं। इसके बाद हम बिलकुल निराश हो गए।

मुकेश भारद्वाज- इसके साथ ही बिहार की गठबंधन सरकार में भी परेशानी आने लगी?
केसी त्यागी: बिहार के शिक्षा मंत्री राम मंदिर, प्राण प्रतिष्ठा, हिंदू धर्म, तुलसीदास, रामायण को लेकर तीखी टिप्पणियां कर रहे थे। जिसके बाद हमारी पार्टी असहज महसूस कर रही थी। उत्तर भारत की सामाजिक संरचना को देखते हुए यह सब ठीक नहीं था। फिर हमें लगा कि गठबंधन तोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ध्यान दीजिए, नीतीश कुमार 303 के मोदी को छोड़कर गए थे तब भी मुख्यमंत्री थे। गठबंधन तोड़ने की विशुद्ध वजह निराशा थी।

मुकेश भारद्वाज- इसके बाद नीतीश कुमार की राजनीतिक छवि पर सवालिया निशान लगे। उनके पलटने पर कई तरह के विशेषण बने। क्या आपको लगता है कि इससे नीतीश कुमार की राजनीतिक साख पर नकारात्मक असर हुआ?
केसी त्यागी: हमारा जो समाजवादी आंदोलन है, उसमें डाक्टर लोहिया और कुछ लोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर नेता परिवारवादी हो गए। ज्यादातर पर आयकर विभाग की छापेमारी हुई। अकेले नीतीश कुमार थे जिन पर गैरकानूनी तरीके से संपत्ति अर्जित करने, परिवारवाद या जातिवाद के आरोप नहीं लगे। बिहार की सामाजिक संरचना ऐसी है कि कोई भी दल अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। वहां का समाज आर्थिक तौर पर और सामाजिक न्याय के तौर पर भी विभाजित है। वहां नीतीश कुमार मूल्यपरक राजनीति के प्रतिनिधि हैं। हमने अपनी सुविधा से, बिना लालच के कई राजनीतिक प्रयोग किए। लंबे समय तक भाजपा में रहने के बाद 2014 में उससे अलग हुए। जो भी रुख रखा, वह राजनीतिक मूल्यों को लेकर था, कुछ भी व्यक्तिगत नहीं। राजनीतिक सुविधा हम सब लोग देखते हैं। एक स्थिति पर आकर लगा कि यही हमारी राजनीति के लिए सही है। सबसे अहम बात सिर्फ नीतीश कुमार जी ने पलटी नहीं मारी है। ये देश की राजनीति का पलटीमार युग है। कश्मीर में भाजपा राजनीति कर रही थी, जहां कुर्बान हुए मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है। 70 साल तक वह लड़ती रही। फिर उसी शेख अब्दुल्ला की पार्टी से हाथ मिलाया। फिर महबूबा मुफ्ती से हाथ मिलाया, जिनकी पार्टी का घोषणापत्र है कि हम भारतीय रुपए का भी इस्तेमाल जम्मू कश्मीर में नहीं करेंगे। कांग्रेस ने डीएमके की सरकार गिराई। आज वे करीबी हैं। देवगौड़ा के साथ भी यही हुआ। शिवसेना का जन्म कांग्रेस पार्टी को समाप्त करने के लिए हुआ। उसी शिवसेना के साथ आज कांग्रेस पार्टी है जो बाबरी मस्जिद के विध्वंस का दावा करती है। आज राजनीतिक अस्थिरता का युग है। वैचारिक प्रतिबद्धता अब दूसरे पायदान पर खिसक चुकी है।

Advertisement

मुकेश भारद्वाज- आपने परिवारवाद की बात कही। यह भी दिख रहा है कि परिवारवाद के नाम पर एकतरफा वार हो रहा है। परिवारवाद अगर विपक्ष की सीमा के उस पार है जिनमें कई नाम हैं तो फिर यह तकलीफदेह नहीं है। इसे आप कैसे देखते हैं?
केसी त्यागी: अगर किसी का बेटा विधायक बनता है या राजनीति में कोई छोटा पद पाता है तो उसे परिवारवाद नहीं कहते हैं। परिवारवाद का अर्थ राजवंशीय उत्तराधिकार से है। पश्चिम की लोकतंत्र की अवधारणा ही राजा-रानियों के खिलाफ विद्रोह से हुई। इसमें कई बड़े खूनी संघर्ष हुए। भारत पिछड़ी संस्कृति, पिछड़ी आर्थिक नीतियों का देश है। यहां हिंदू से लेकर मुगल राजा-रानियों का लंबा इतिहास रहा है। महात्मा गांधी का शुक्रिया जिनके नेतृत्व में लोकतंत्र स्थापित हुआ और हर व्यक्ति को मताधिकार मिला। डाक्टर आंबेडकर हमारे पूजनीय हैं। मैं पंडित नेहरू का बड़ा सम्मान करता हूं। लेकिन, उनके कार्यकाल में ही यह राजवंशीय उत्तराधिकार शुरू हुआ, जब 1957 में श्रीमती इंदिरा गांधी को उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार बनाया। उस वक्त कांग्रेस नेता महावीर त्यागी ने नेहरू से मांग की कि या तो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दीजिए या इंदिरा जी को अध्यक्ष नहीं बनने दीजिए। एक परिवार से एक ही पद होना चाहिए। इसी के साथ परिवारवाद की राजनीति शुरू हुई। 1977 में चुनाव के मुद्दों में इंदिरा गांधी की विरासत संजय गांधी को मिलना भी मुद्दा था। आज दुखद यह है कि ज्यादातर राजनीतिक दल परिवारवाद की खंडित राजनीति से प्रेरित हैं। राजवंशीय उत्तराधिकार का आधार योग्यता नहीं होती है। यह अपने साथ परंपरागत जाति व्यवस्था को भी लाता है जो संसदीय लोकतंत्र की पहली शर्त का उल्लंघन करता है। हम इस व्यवस्था के पूरी तरह खिलाफ हैं।

मुकेश भारद्वाज- आपने अहम बात कही कि नीतीश कुमार के खिलाफ किसी एजंसी की जांच नहीं है। लेकिन आज देखा जा रहा है कि 95 फीसद विपक्ष के नेताओं के खिलाफ जांच चल रही है। सरकार पर विपक्ष के खिलाफ जांज एजंसियों के दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं।
केसी त्यागी: हमारा मानना है कि किसी को बेवजह प्रताड़ित करने का काम नहीं करना चाहिए। यह गांधी की सीख है कि देश में राजनीतिक कार्यकर्ताओं का जीवन पारदर्शी होना चाहिए। हमारे पुरखे लोहिया, जयप्रकाश और नरेंद्र देव, वे 1948 में कांग्रेस से अलग हो गए थे। भगत सिंह खुद ये कह के फांसी पर चढ़े कि मेरी आजादी का अर्थ ये नहीं है कि काले शासक आ जाएं, लूट के लिए गोरे शासक चले जाएं। जब तक व्यक्ति का व्यक्ति के द्वारा, समाज का समाज के द्वारा और देश का देश के द्वारा शोषण समाप्त नहीं होता है, हमारे जैसे नौजवानों की लड़ाई चलती रहेगी।

मुकेश भारद्वाज- विपक्ष के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों और जेल के बीच में एक नाम खास तौर पर लेना चाहता हूं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर मुख्यमंत्री बने थे। अरविंद केजरीवाल का फिलहाल जेल में होना एक बड़े तबके के भरोसे का टूटना भी है। इस नाम पर आप क्या कहेंगे?
केसी त्यागी: केजरीवाल जी मेरे मित्र भी हैं। थोड़ा व्यक्तिगत है, लेकिन एक किस्सा मैं सुनाता हूं। नीतीश कुमार जी के शपथ ग्रहण के समय केजरीवाल जी को हमने पटना आमंत्रित किया था। वो वहां आए और मुझसे कहा, त्यागी जी ऐसा न हो कि मेरी लालू जी के साथ तस्वीर खींच ली जाए। वे लालू प्रसाद यादव के साथ फोटो खिंचवाने से बचते रहे। लेकिन वे बच न सके और उनकी लालू यादव के साथ तस्वीर खींच ली गई। अरविंद केजरीवाल की यही चिंता थी कि वह फोटो सार्वजनिक न हो। जो केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी के साथ फोटो तक साझा नहीं करना चाहते थे, आज जेल साझा कर रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य ज्यादा है अरविंद केजरीवाल का कम। कुछ लोग प्रतिनिधि चेहरा होते हैं, जैसा कि नीतीश कुमार जी का जिक्र किया। नीतीश कुमार की तस्वीर से आने वाली पीढ़ी को प्रतिबद्धता का प्रतिनिधि चेहरा दिखाया जाएगा। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का मामला अभी तो अदालत में चल रहा है। आगे क्या होता है देखते हैं। लेकिन, ये जो शराब का कारोबार है वह सत्ता का भी नशा देता है और पैसे का भी नशा देता है। नीतीश कुमार जी, मोरारजी भाई, कर्पूरी ठाकुर ने जब नशाबंदी की तो इनके खिलाफ आंदोलन छिड़ गया। शराब के ठेकों में अनियमितताएं ज्यादा होती हैं। मैं गाजियाबाद से सांसद रहा हूं। यहां कई ठेकेदारों ने सरकारें बदलवाई हैं। लिहाजा वक्त तय करेगा केजरीवाल जी के बारे में। केंद्रीय जांच एजंसियों ने अगर अतिरिक्त रुचि लेकर फंसाया होगा तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अगर उसमें केजरीवाल जी फंसे हुए होंगे तो यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

मुकेश भारद्वाज- आज हर समस्या की जड़ कांग्रेस को माना जा रहा है। उसके खत्म होने की बात भी की जा रही है। अगर कांग्रेस खत्म हो रही है तो सारे हमले उस पर क्यों?
केसी त्यागी: राष्ट्रीय स्तर पर तो पूरी तरह टूटी-फूटी है कांग्रेस। आप उत्तर प्रदेश में जब चुनाव लड़ेंगे तो डीएमके को क्यों गाली देंगे? पंजाब में चुनाव लड़ने जाएंगे तो शिवसेना के खिलाफ क्यों बोल देंगे? कल को कई प्रयोग असफल होते हैं तो राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस के उद्भव की संभावना हो सकती है। तृणमूल, एनसीपी से लेकर कितने दल हैं जो कांग्रेस से निकले हैं। वे कांग्रेस पर प्रहार करते हुए अपने जनाधार को मजबूत करते हैं। कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष है तो मुझे कबूल है, कांग्रेस समाजवादी है तो मुझे कबूल है। लेकिन इससे भी हटी तो कबूल नहीं। कांग्रेस उस रास्ते से हट गई है जो रास्ता गांधी ने दिखाया था। जितनी आर्थिक असमानता भारत की व्यवस्था में है वह विश्व में कहीं नहीं है। कांग्रेस की शुरुआती गलत नीतियों के कारण है। 1952 में जो पहली पंचवर्षीय योजना बनी थी तो कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए 35 फीसद का आरक्षण किया गया। 1962 में जब तीसरी पंचवर्षीय योजना बनती है तो ग्रामीण क्षेत्र के लिए 15 फीसद, औद्योगिक क्षेत्र के लिए 35 फीसद हो जाता है। जवाहरलाल नेहरू उदार थे। उन्होंने संसद में माना था कि प्राथमिकताओं को बदलना गलती थी। तो शुरू से ही देश गलत दिशा में चला, यह गांधी के स्वावलंबी भारत का नक्शा नहीं था।

मुकेश भारद्वाज- आपके लिए यह कितना मुश्किल है कि आज ऐसी पार्टी के साथ दोबारा खड़े हैं जिस पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप लगता है। जबकि आप खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं।
केसी त्यागी: मुझे उस दिन जरूर अटपटा लगा था जब जार्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में एनडीए बना था, जिसमें जनता दल (एकी), समता पार्टी भाजपा के साथ गए। यह पहली बार नहीं था। चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर सब लोगों ने जब गैर कांग्रेस सरकार बनाई थी, तो कम्युनिस्ट और जनसंघ भी साथ थे। लेकिन प्रतिबद्धताओं के सवाल पर एक दूरी बनाकर रखी गई। एनडीए में होते हुए जब अनुच्छेद 370 को खत्म करने की घोषणा माननीय अमित शाह ने की तो हमने साथ नहीं दिया। हम संसद से बाहर चले गए। समान नागरिक संहिता पर नीतीश कुमार ने चिट्ठी लिखी, हम इसकी हिमायत नहीं करते।

jansatta prashnakaal, Lok Sabha Election 2024

मुकेश भारद्वाज- अबकी बार 400 पार, इस नारे को क्या आप भी मानते हैं?
केसी त्यागी: देखिए, एक जिम्मेदार, वैचारिक, प्रतिबद्ध, लड़ाकू विकल्प के अभाव में ये स्थिति बनी है। जैसे बुलडोजर उत्तर प्रदेश में चला था, उस तरह का राजनीतिक बुलडोजर चल रहा है राजग का नरेंद्र मोदी की अगुआई में। नरेंद्र मोदी के सामने कौन है? राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात कहीं भी कांग्रेस अपनी स्थिति सुधार नहीं सकी। कांग्रेस की प्रतिरोध शक्ति समाप्त हो चुकी है, वरना कम से कम अपने राज्यों में तो बढ़त ले सकती थी। मैं कुछ विद्वानों से सहमत हूं कि भाजपा का जहां भी थोड़ा बहुत मुकाबला है, वह क्षेत्रीय अस्मिता वाली पार्टी से है चाहे बंगाल हो या तमिलनाडु। अभी एक पत्रकार बता कर गए कि 60 हजार से ज्यादा कांग्रेस के कार्यकर्ता व एक दर्जन पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री भाजपा में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस में हौसला ही मर गया है।

मुकेश भारद्वाज- बिहार में रोजगार के सवाल पर राजनीतिक लड़ाई है। तेजस्वी यादव का दावा है कि जब उन्होंने पांच लाख नौकरियां देने की बात की थी तब नीतीश कुमार ने कहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है। अब नीतीश कुमार इस पर दावा कर रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि इन नौकरियों के श्रेय का असली हकदार कौन है?
केसी त्यागी: किसी भी राज्य की सरकार का संचालन मुख्यमंत्री के बिना तो नहीं होता है। यह सही है कि राजद के नेता ने यह सवाल उठाया था। रोजगार का यह सवाल राजद की परंपरागत राजनीति से अलग सवाल है। लालू जी के समय में रोजगार और विकास की कोई बात नहीं होती थी। इसलिए कई लोगों को तेजस्वी का यह ‘तेजस्वी स्वरूप’ अच्छा लगता है। लेकिन, यह भी सच है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किसी भी स्तर पर इसका विरोध नहीं किया था। उन्होंने इसे लागू किया और आगे बढ़ाया। आगे भी नौकरियां देने का सिलसिला जारी रहेगा।

मुकेश भारद्वाज- तेजस्वी यादव ने कहा था कि इस बात की गारंटी कौन लेगा कि नीतीश कुमार फिर पलटी नहीं मारेंगे? क्या आज आप यह गारंटी देंगे?
केसी त्यागी: जितना मैं नीतीश कुमार को 50 साल से जान सका हूं उस आधार पर कह सकता हूं कि ऐसा नहीं होगा। यूं भी अब हम लोग 70-75 आयु वर्ग के हैं। हमने अपने जीवन में काफी प्रयोग कर लिए हैं। नीतीश जी, लालू जी, शरद जी हम सब एक पीढ़ी के हैं। इन राजनीतिक प्रतिभाओं के बीच मैं नीतीश कुमार को सबसे आगे देखता हूं। नीतीश कुमार ने खुद को सबसे ज्यादा संभाल कर रखा है। जिंदगी के इस पड़ाव पर कुछ और प्रयोग करने के लिए बचा नहीं है। लिहाजा मैं कह सकता हूं कि वर्तमान ही अंतिम पड़ाव है।

(प्रस्तुति- मृणाल वल्लरी)

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो