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Navratri 2nd Day, Maa Brahmacharini Vrat Katha, Aarti: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से मिलता है ज्ञान और धन का आशीर्वाद, जानिए पूजा विधि, मंत्र, भोग सहित सबकुछ

Maa Brahmacharini Ji Ki Aarti, Mantra, Vrat Katha Lyrics in Hindi: चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से ज्ञान और धन की प्राप्ति होती है...
Written by: Astro Aditya Gaur
नई दिल्ली | Updated: April 09, 2024 15:56 IST
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मां दुर्गा की नव शक्तियों का दूसरा स्वरूप माता ब्रह्मचारिणी का है-
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Navratri 2024 2nd Day, Maa Brahmacharini Ji Ki Aarti, Mantra, Vrat Katha Lyrics in Hindi: चैत्र नवरात्रि 9 अप्रैल से शुरू हो गए हैं और आज यानी 10 अप्रैल को नवरात्रि का दूसरा दिन है। वहीं इस दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा- अर्चना की जाती है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ तपस्या है और ‘चारिणी’ का अर्थ आचरण करने वाली यानी तप का आचरण करने वाली देवी।  देवी के इस रूप को माता पार्वती का अविवाहित रूप माना जाता है। वहीं ब्रह्मचारिणी देवी की आराधना करने से भक्त के तप की शक्ति में वृद्धि होती है। साथ ही सुख- समृद्धि की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी कौन हैं और इनकी पूजा का क्या महत्व है…

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप

वहीं दुर्गा सप्तशती के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्र धारण किए हैं और दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए सुशोभित हैं।

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मां ब्रह्मचारिणी पूजा- विधि

नवरात्रि के दूसरे दिन जल्दी उठ जाएं और स्नान करके साफ- सुथरे वस्त्र धारण कर लें। वहीं पूजा की चौकी पर मांं ब्रह्मचारिणी का फोटो या चित्र स्थापित करें। साथ ही अगर आपके पास मांं ब्रह्मचारिणी का फोटो नहीं है तो आप नवदुर्गा का फोटो स्थापित कर सकते हैं। वहीं इसके बाद घूप और अगरबत्ती प्रज्वलित करें। साथ ही मां का षोडशोपचार पूजन करें। वहीं फिर मां को चीनी का भोग लगाएं और फल अर्पित करें। साथ ही अंत में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर मां ब्रह्मचारिणी की आऱती करें।

इन चीजों का लगाएं भोग

वहीं अगर मां ब्रह्मचारिणी के भोग की बात करें तो मां को चीनी का भोग लगाना चाहिए। साथ ही अगर आप चाहे तो ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान में भी चीनी भी दे सकते हैं। मान्यता है ऐसा करने व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही मां की असीम कृपा बनी रहती है।

मां ब्रह्माचारिणी की कथा

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पूर्वजन्म में ब्रह्मचारिणी देवी ने पर्वतों के राजा हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। साथ ही नारदजी के उपदेश से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।

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कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए. कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की. यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ. जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

मां ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र (Maa Brahmacharini Puja Mantra)

मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान

वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥

परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

मां ब्रह्मचारिणी का स्तोत्र पाठ

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति- मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

मां ब्रह्मचारिणी का कवच

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी” ।

मां ब्रह्मचारिणी की आरती ( Brahmacharini Mata Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi)

जय अंबे ब्रह्मचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्म मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्मचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।

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