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हल्द्वानी हिंसा : फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में पुलिस पर लगाए गए गंभीर आरोप, लिखा- स्थानीय लोगों में डर का माहौल

रिपोर्ट में गवाहों का हवाला दिया गया है और पुलिस पर आरोप लगाए गए हैं कि हिंसा के बाद तलाशी अभियान के दौरान पुलिस ने स्थानीय लोगों के साथ बदतर सलूक किया है।
Written by: Mohammad Qasim
नई दिल्ली | Updated: February 17, 2024 17:50 IST
हल्द्वानी हिंसा   फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में पुलिस पर लगाए गए गंभीर आरोप  लिखा  स्थानीय लोगों में डर का माहौल
हल्द्वानी हिंसा में शामिल होने के आरोप में कई गिरफ्तारियां हुई हैं। (फोटो : पीटीआई)
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उत्तराखंड के हल्द्वानी में 8 फरवरी को एक मस्जिद और मदरसे को गिराने को लेकर भड़की हिंसा के बाद पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है। अब तक 300 घरों की तलाशी ली गई है और कई गिरफ्तारिययां भी हुई हैं। हल्द्वानी हिंसा को लेकर शुक्रवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में सिविल सोसायटी के एक समूह ने फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट पेश की है, जिसमें कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। रिपोर्ट में लिखा है कि हिंसा के बाद स्थानीय लोगों का डर बढ़ गया है।

8 फरवरी को बनभूलपुरा क्षेत्र में एक मदरसे पर प्राशासन ने कार्रवाई की थी। प्रशासन का कहना था कि यह निर्माण अवैध था और सरकारी जमीन पर था। पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाके में हिंसा भड़क गई। पुलिस के मुताबिक झड़पों में छह लोग मारे गए और पुलिस कर्मियों और मीडियाकर्मियों सहित 100 से अधिक घायल हो गए।

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फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में क्या किए गए हैं दावे?

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर), कारवां-ए-मोहब्बत और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जाहिद कादरी ने हल्द्वानी यात्रा के बाद एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में मुसलमानों के आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार और घरों और दुकानों से मुस्लिम किरायेदारों को बेदखल करने और शहर छोड़कर जाने की धमकियों जैसे मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है।

इसके अलावा फैक्ट-फाइंडिंग टीम के सदस्यों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हल्द्वानी की घटना सीएम धामी के बयान- जिसमें उन्होंने राज्य में 3000 मजारों के विनाश को अपनी सरकार की उपलब्धि- बताया था, को भी ऐसी हिंसा का कारण बताया है।

रिपोर्ट में गवाहों का हवाला दिया गया है और पुलिस पर आरोप लगाए गए हैं कि हिंसा के बाद तलाशी अभियान के दौरान पुलिस ने स्थानीय लोगों के साथ बदतर सलूक किया है। रिपोर्ट में लंबे समय तक कर्फ्यू लगाए रखने और इंटरनेट बंद करने की आलोचना की गई है और लिखा गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा है।

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क्या है पूरा मामला?

यह विवाद करीब छह एकड़ जमीन से जुड़ा है जिसमें 20 साल पुरानी मस्जिद और एक मदरसा स्थित है। मस्जिद और मदरसा दोनों को खाली करने के लिए 30 जनवरी को दिए गए बेदखली नोटिस के खिलाफ उलेमाओं के एक समूह ने नगर पालिका अधिकारियों से मुलाकात की थी, जिसके बाद 4 फरवरी को स्थानीय नगर पालिका द्वारा मस्जिद और मदरसे को सील कर दिया गया था। फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने दावा किया कि जमीन सरकार की है, जबकि विवादित जमीन की पट्टेदार होने का दावा करने वाली सोफिया मलिक ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

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एक सिंगल बेंच ने 8 फरवरी को मामले की सुनवाई की और अगली सुनवाई 14 फरवरी को की है और सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।। स्थानीय लोगों ने फैक्ट-फाइंडिंग टीम को बताया कि 8 फरवरी की शाम को स्थानीय अधिकारी बुलडोजर, नगर निगम के कर्मचारियों और महत्वपूर्ण पुलिस सुरक्षा के साथ निर्माण को गिराने पहुंचे, जबकि मामला कोर्ट में था। रिपोर्ट में स्थानीय लोगों से बातचीत के आधार पर यह दावा किया गया है कि जब बुलडोजर के सामने महिलाएं आकर खड़ी हुईं तो उन्हें महिला पुलिस और पुरुष पुलिस द्वारा मारा और पीटा गया। पुलिस की कार्रवाई से स्थानीय समुदाय में गुस्सा है।

इसके अलावा रिपोर्ट के अनुसार मस्जिद में कुरान और अन्य पवित्र संपत्तियों को मस्जिद गिराने से पहले इमाम को नहीं दिया गया। ऐसा दावा स्थानीय लोग करते हैं।

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