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कुहू गर्ग: 8 घंटे कोर्ट पर पसीना बहाने वाली कैसे 16 घंटे करने लगी पढ़ाई, ओलंपिक मेडल लाने का सपना टूटा तो देश सेवा के लिए चुनी सिविल सर्विसेज

देहरादून की रहने वाली कुहू गर्ग ने यूपीएससी सिविल सर्विसेज एग्जाम में 178वीं रैंक हासिल की हैं। वह एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुकी हैं।
Written by: Riya Kasana
नई दिल्ली | Updated: April 18, 2024 21:04 IST
कुहू गर्ग  8 घंटे कोर्ट पर पसीना बहाने वाली कैसे 16 घंटे करने लगी पढ़ाई  ओलंपिक मेडल लाने का सपना टूटा तो देश सेवा के लिए चुनी सिविल सर्विसेज
कुहू गर्ग जल्द ही आईपीएस ऑफिसर बनने वाली हैं।
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कहते हैं जीवन वह नहीं है जो हम सोचते हैं जीवन वह है जो हमारे साथ होता है। मनुष्य चाहे समय को अपनी मुठ्ठी में करने की कितनी ही कोशिश कर ले लेकिन कोई नहीं बता सकता अगले पल क्या होगा। ऐसे में जीवन जीने का मतलब बीती बातों पर रोना नहीं हर पल एक नई शुरुआत के लिए कदम बढ़ाना है। शायद आपको यह पंक्तियां महज कुछ शब्दों के संयोजन से बना वाक्य लगे लेकिन यह वाक्य कुछ लोगों के जीवन का आधार है।

कुहू गर्ग जैसे लोगों के जीवन का आधार, जिन्होंने जीवन में कभी मुश्किल हालात के आगे घुटने नहीं टेके, राह में आई पहाड़ जैसी मुश्किलों को देखकर जिनका मनोबल नहीं टूटा बल्कि जिन्होंने उठकर फिर से चलना सीखा, जिन्होंने अपनी हिम्मत के वार से चट्टानों के बीच राह बना ली। कुहू गर्ग वह अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी जो यूपीएससी सिविल सर्विसेज की परीक्षा में 178वीं रैंक हासिल करके अब पिता की तरह आईपीएस अफसर बनने जा रही हैं।

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बैडमिंटन उपलब्धियों से भरा करियर

कुहू का बैडमिंटन करियर ऐसी उपलब्धियों से भरा हुआ है जिसपर सिर्फ उन्हें नहीं बल्कि पूरे देश को गर्व है। कुहू वर्ल्ड रैंकिंग में 34वें स्थान पर रह चुकी हैं। वह 15 साल की उम्र में ही नेशनल टीम का हिस्सा बन गई थीं। उन्होंने साल 2015 में मौजूदा वर्ल्ड नंबर वन सात्विक साईंराज के साथ जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप के मिक्स्ड डबल्स वर्ग में हिस्सा लिया जहां वह मेडल के बेहद करीब आकर चूक गईं थीं।

इसके अलावा भी कुहू के नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियां दर्ज हैं। उन्होंने साल 2019 में काठमांडू में हुए साउथ एशियन गेम्स के महिला टीम इवेंट में गोल्ड और महिला डबल्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। उन्होंने साल 2018 में रशियन ओपन सुपर 100 इवेंट में मिक्स्ड डबल्स में सिल्वर, लागोस इंटरनेशनल में महिला डबल्स में गोल्ड और साल 2019 में इजिप्ट इंटरनेशनल में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। कुहू जूनियर के अलावा सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

इंजरी ने दी नई राह

बात 2021 की है। कोरोना के बाद धीरे-धीरे सबकुछ सामान्य हो रहा था। हैदराबाद की गोपीचंद अकेडमी में उबर कप के लिए ट्रायल्स होने वाले थे। इन्हीं ट्रायल्स से आने वाले एक साल के लिए नेशनल टीम का फैसला भी होने वाला था। एक महीने तक टायफाइड के कारण बिस्तर पर रहने वाली कुहू पूरी तरह फिट नहीं थी इसके बावजूद वह इन ट्रायल्स में अपना सबकुछ देने को तैयार थीं। हालांकि इसी दौरान उनके पैर में चोट लग गई। स्कैन के बाद पता चला कि उन्हें एसीएल इंजरी हुई है जिसके लिए सर्जरी की जरूरत है। इस चोट ने भारत की टॉप डबल्स खिलाड़ी के पेरिस ओलंपिक जाने का सपना तोड़ दिया लेकिन जन्म दिया एक और सपने को। सपना सिविल सर्विसेज का परीक्षा देने का। लोगों की सेवा करने का। समाज को एक बेहतर जगह बनाने का।

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जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

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पिता को देखकर मिली प्रेरणा

कुहू ने हरिवंशराय बच्चन की इन पंक्तियों के सार को दिल में बैठाया और अपनी आंखों में एक नए सपने को जन्म दिया। कुहू ने जनसत्ता.कॉम से बातचीत में बताया कि उन्होंने भले ही चोट के बाद सिविल सर्विसेज में आने का फैसला किया लेकिन उनके मन में यह इच्छा शुरू से ही थी। उन्होंने कहा, 'बचपन से ही मैं पिता को वर्दी में लोगों की सेवा करते देखती थी लेकिन मेरे मन पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव कोरोना काल में पड़ा। सात साल के ब्रेक के बाद कोरोना के दौरान जब घर आई तो एक बार फिर से सिविल सर्विसेज की तरफ झुकाव हुआ। उस समय पर मैंने देखा कि किस तरह मेरे पिता काम कर पा रहे थे। उनपर कितनी अहम जिम्मेदारियां थी। इंजरी के बाद मुझे लगा कि अब सिविल सर्विसेज के बारे में सोचना चाहिए।'

यूपीएससी की तैयारी में भी बैडमिंटन ने की मदद

कोर्ट से परीक्षा हॉल तक का सफर कुहू के लिए आसान नहीं था। वह अकेडमी में ट्रेनिंग के दौरान भी अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती थी लेकिन सिविल सर्विसेज की तैयारी करना उतना आसान नहीं था। कुहू ने बताया, 'बैडमिंटन से सिविल सर्विसेज की तैयारी का सफर आसान नहीं था। बैडमिंटन के समय हमें 6 से 8 घंटे कोर्ट पर ट्रेनिंग करनी होती थी। मुझे इतने सालों तक यही करने की आदत थी। इसलिए एक जगह बैठकर घंटों पढ़ना आसान नहीं था। मैं शुरुआत में 3-4 घंटे पढ़ती थी। फिर मैंने धीरे-धीरे इस समय को बढ़ाया और एक समय ऐसा भी आया जब मैंने दिन में 16-16 घंटे बैठकर पढ़ाई की।'

उन्होंने आगे कहा, 'मुझे लगता है कि बैडमिंटन में मैंने जितनी मेहनत की, जो मेरी दिनचर्या थी मुझे उससे बहुत मदद मिली। हर सुबह साढ़े चार बजे उठ जाना। ट्रेनिंग करना, समय पर हर काम करना। इसी अनुशासन के कारण मुझे तैयारियों में भी मदद मिली।

कुहू को भी ओलंपिक में बैडमिंटन में मेडल आने की उम्मीद

कुहू ने अपने जीवन को नई राह दे दी है लेकिन दिल से बैडमिंटन के लिए प्यार खत्म नहीं हुआ है। वह आज भी खाली समय मिलने पर बैडमिंटन मैच देख लेती हैं। जब उनके पास समय नहीं होता तब भी वह टूर्नामेंट और स्कोर को लेकर अपडेट रखती हैं। अपने रिहैब के लिए भी उन्होंने बैडमिंटन को ही चुना। कुहू को उनकी मंजिल मिल गई है और अब उन्हें उम्मीद है कि भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी इस बार पेरिस ओलंपिक में मेडल्स के साथ लौटेंगे।

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