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सौहार्द का तारीखी हर्फ बंगाल

भारत के इतिहास में बंगाल सिर्फ एक प्रांत का नाम नहीं है बल्कि यह लंबे समय से इस देश की सांस्कृतिक बहुलता और प्रखरता का बेहतरीन उदाहरण भी रहा है। बंग-भंग के विरोध का आंदोलनकारी फैसला दुनिया के इतिहास में अनूठा फैसला है जिसमें सौहार्द की सांस्कृतिक सामासिकता की हिफाजत की गहरी फिक्र दिखाई पड़ती है। आज जब सामाजिक दुराव और सांप्रदायिक कटुता का संकट नए सिरे से देश के सामने है तो बंगाल के इतिहास के पुराने पन्नों को फिर से पलटना चाहिए।
Written by: संजय दुबे
Updated: April 05, 2021 00:30 IST
सौहार्द का तारीखी हर्फ बंगाल
बीसवीं सदी के हमारे इतिहास में बंगाल का विभाजन एक बड़ी घटना थी, जिसने भविष्य की दिशा ही बदल दी थी। (फोटो- जनसत्ता फाइल)
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प्रेम प्रकाश

ब्रितानी औपनिवेशिकता के भारत में जड़ जमाने और आगे लंबे समय तक सफल रहने के पीछे एक बड़ी वजह यह थी कि अंग्रेज भारतीय संस्कृति के लोक तत्त्वों की उस बनावट को समझ गए थे जिसके केंद्र में अटूट संवेदना और भरपूर सौहार्द रहा है। भारत में ब्रितानी राज का आगाज और विस्तार तारीखी तौर पर बंगाल से सबसे ज्यादा जुड़ा है। बांग्ला समाज का सौहार्द, उसकी भद्र मानसिकता और उसके बीज पनप रहे नवजागरणवादी तत्त्वों से अंग्रेजों को हमेशा खतरा लगता रहा। बंगाल विभाजन के पीछे ब्रितानी हुकूमत की मंशा वहां की सामाजिक समरसता और एकजुटता के बड़े आधार को छिन्न-भिन्न करना था। दिलचस्प है कि 1857 के बाद भारतीय समाज की ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ जो दूसरी सबसे बड़ी तारीखी भिड़ंत है, वह है बंगाल विभाजन का विरोध। 1905 में खिंची विभाजन की लकीर 1912 में जाकर अमान्य हो गई तो इसलिए कि बांग्ला जनमानस न तो अपने भूगोल को बदलने देना चाहता था और न ही अपनी संस्कृति के साझेपन में उसे कोई दखलंदाजी कबूल थी।

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विभाजन का विरोध
बंगाल विभाजन के भारत में सूत्रधार लॉर्ड कर्जन थे। बांग्ला संस्कृति में आज भी कई ऐेसे लोकगीत हैं जिसमें कर्जन को एक बड़े खलनायक के रूप में रेखांकित किया गया है। कर्जन बंग जनमानस में चुभे ऐसे कांटे की तरह हैं, जिसकी टीस को याद कर वहां के लोग आज भी इस बात का सबक लेते हैं कि बांग्ला संस्कृति एक साझेपन का नाम है और किसी भी तरह का विभाजन एक असांस्कृतिक कार्रवाई है। गौरतलब है कि बंग-भंग की जिद कर्जन ने न सिर्फ बांग्ला समाज के गहरे एतराज बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कड़े विरोध की उपेक्षा करके पूरी की थी। यह अलग बात है कि उनकी यह जिद ब्रितानी सरकार के एक ऐसे बड़े फैसले के तौर पर याद की जाती है, जिसकी वापसी तक बंगाल के लोग संघर्ष करते रहे।

कविगुरु की कविता
आलम यह रहा कि कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर तक इस विरोध के लिए सड़कों पर उतरे। उन्होंने बंग-भंग के विरोध का सांस्कृतिक तरीका निकाला। ऐसा करते हुए उन्होंने रक्षाबंधन को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्योहार को नई लोकप्रियता और व्याख्या दी। 1905 में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘मातृभूमि वंदना’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें वे लिखते हैं- ‘सप्त कोटि लोकेर करुण क्रंदन/ सुनेना सुनिल कर्जन दुर्जन/ ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन करिल/ आमि स्वजने राखी बंधन।’ इस विभाजन का बंगाल के भद्र जनों तक में विरोध कितना गहन और तीव्र रहा होगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कविगुरु ने अपनी कविता में लॉर्ड कर्जन के लिए ‘दुर्जन’ शब्द का इस्तेमाल किया है।

औपनिवेशिक हिमाकत
दरअसल, बंग-भंग विरोध के आंदोलन के पूरे वृतांत को देखें तो इसमें एक तरफ बांग्ला लोक के रूप में भारतीय लोकमानस का सामासिक गठन दिखलाई पड़ता है, तो वहीं दूसरी तरफ ब्रितानी हुकूमत की वह मंशा और नीति जिसे तारीखी तौर पर ‘फूट डालो और राज करो’ के मुहावरे के तौर पर हम जानते हैं। लॉर्ड कर्जन ने जिस तरह लंदन में बैठे अपने सरपरस्तों के कहने पर एक आज्ञा जारी करके बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया था, वह संस्कृति और समाज के खिलाफ औपनिवेशिक हिमाकत की एक ऐसी दास्तान है, जिसकी खरोंचें आज तक महसूस की जाती हैं।

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1905 का विभाजन अगले कुछ वर्षों के सतत आंदोलनकारी हस्तक्षेप के बाद अमान्य जरूर हो गया, पर 1947 में जब भारत विभाजन की नौबत आई तो फिर से पुरानी लकीरें जिंदा हो गर्इं। देश की स्वाधीनता के साथ विभाजन का दंश झेलने पर एक साथ भारत के दो हिस्से पंजाब और बंगाल मजबूर हुए। गौरतलब है कि भारत के ये दोनों छोर अपनी प्रतिबद्ध सांस्कृतिक रचना के लिए सदियों से विख्यात रहे हैं। इस सांस्कृतिक अनूठेपन के कारण बंगाल के हिस्से जहां सांस्कृतिक नवजागरण जैसा यश है तो वहीं पंजाब के पास नैतिकता और एकता का ऐसा गुरुत्व, जिसके कारण इस क्षेत्र में साहस और संघर्ष की जड़ें आज भी काफी मजबूत हैं।

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तब का बंगाल
जिस दौर के बंगाल का जिक्र करके हम वहां की सांस्कृतिक सामासिकता का जिक्र कर रहे हैं, उसकी तब की रचना को भी समझना चाहिए। उस समय बंगाल प्रांत में आज का बांग्ला देश, पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा शामिल थे। इसका क्षेत्रफल 1,89,000 वर्ग मील और जनसंख्या थी करीब आठ करोड़। इसमें बिहार और उड़ीसा की जनसंख्या दो करोड़ दस लाख थी। बंटवारे के बाद पूर्वी बंगाल और असम का एक नया प्रांत बनाया गया जिसमें राजशाही, चटगांव और ढाका के तीन डिवीजन सम्मिलित थे। इसका क्षेत्रफल 1,06,540 वर्ग मील और जनसंख्या तीन करोड़ दस लाख थी, जिसमें से एक करोड़ 80 लाख मुसलमान थे और एक करोड़ 20 लाख हिंदू। इस प्रांत का मुख्य कार्यालय ढाका में था और यह एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन था। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा थे, जिनका क्षेत्रफल 1,41,580 वर्गमील था और जिनकी जनसंख्या पांच करोड़ 40 लाख थी, जिसमें चार करोड़ 20 लाख हिंदू और 90 लाख मुसलमान थे। इसमें बंगाली अल्पसंख्यक थे।

साफ समझा जा सकता है कि फिरंगी हुकूमत अपनी विभाजनकारी नीति से भारत के एक ऐसे हिस्से को बांट रही थी, जिसकी सांस्कृतिक सामासिकता ने जाति और संप्रदाय की दूरी को पाट दिया था। रोजी-रोजगार से लेकर व्रत-त्योहार तक में इस सामासिकता की बहुरंगता इंद्रधनुषी छटा बिखेरती थी। यही इसकी ताकत भी थी और खूबसूरती भी थी। दरअसल, बंगाल का विभाजन भौगोलिक रूप से अपने लिए सहूलियत हासिल करने की ब्रितानी हुकूमत की चाल थी। प्रशासनिक आधार पर लोगों को बांट देने से उसे यह भरोसा था कि उनके बीच के एकता के सूत्र छिन्न-भिन्न हो जाएंगे। अलबत्ता फैसले से जुड़ा यह मंसूबा भारी विरोध के कारण पूरा नहीं हो पाया।

घर-आंगन में दरार
लंदन से चली ‘फूट डालो और राज करो’ की सोच भारत पहुंचकर एक ऐसे फैसले में तब्दील हुई जिसमें लोगों ने अपने घर-आंगन में दीवार खड़ी होने या दरार पड़ने जैसी पीड़ा महसूस की। पर यह पीड़ा खामोश नहीं रही। इसने एक विरोधी शक्ल अख्तियार की और तकरीबन सात साल लंबा चले संघर्ष के बाद फिरंगी हुकूमत को अपना फैसला वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। आंदोलनों के इतिहास में दुनियाभर में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण शायद ही देखने को मिले जहां कोई संघर्ष सांस्कृतिक समुच्चयता और सद्भाव को बहाल रखने के नाम पर न सिर्फ शुरू हुआ हो बल्कि कामयाबी के अंजाम तक भी पहुंचा हो।

बंग-भंग विरोधी आंदोलन का सबक भारतीयता की रक्षा का एक ऐसा सांस्कृतिक सबक है, जिसे भूलना अपने बीच दरारों और दीवारों की गुंजाइश को खुली दावत है। एक ऐसे दौर में जब संस्कृति का एकमात्र नियामक बाजार है और लोकतांत्रिक ढांचे में राजनीतिक दल अपनी जीत-हार के लिए हर हिमाकत के लिए तैयार दिखते हैं तो नवजागरण की धरती बंगाल का इतिहास हमें कड़ी हिदायतों के साथ बहुत कुछ बताता-सिखलाता है।

विभाजन का प्रस्ताव पहले दिन से अस्वीकार
बंगाल के विभाजन के बारे में सर्वप्रथम 1903 में सोचा गया था। चटगांव तथा ढाका और मैमनसिंह के जिलों को बंगाल से अलग कर असम प्रांत में मिलाने के अतिरिक्तप्रस्ताव भी रखे गए थे। इसी तरह छोटा नागपुर को भी केंद्रीय प्रांत से मिलाया जाना था। 1903 में ही कांग्रेस का भी 19वां अधिवेशन मद्रास में हुआ था। अधिवेशन के सभापति लालमोहन घोष ने अपने अभिभाषण में इस प्रतिक्रियावादी नीति की आलोचना करते हुए ब्रितानी हुकूमत के षड्यंत्र के बारे में देश को आगाह कराया। ब्रितानी शासन ने आधिकारिक तौर पर जनवरी, 1904 में यह विचार प्रकाशित किया। कांग्रेस के अगले अधिवेशन में सभापति पद से बोलते हुए सर हेनरी कॉटन ने कहा कि यदि यह बहाना है कि इतने बड़े प्रांत को एक राज्यपाल संभाल नहीं सकता तो या तो बंबई और मद्रास की तरह का शासकीय मॉडल अपनाया जाए या बांग्लाभाषियों को अलग करके एक प्रांत बनाया जाए। उन दिनों बंगाल प्रांत में बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे।

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