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मराठी में दर्ज किया हिंदी भाषी शख्स का बयान, फिर कोर्ट ने सुना दी रेप के मामले में फांसी की सजा, SC पहुंचा मामला तो हुआ बरी

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संजय करोल की ट्रिपल बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट के साथ हाईकोर्ट ने उन तमाम पहलुओं को नजरंदाज किया जो मामले की अहम कड़ी हो सकते थे।
Written by: shailendragautam
May 25, 2023 15:49 IST
मराठी में दर्ज किया हिंदी भाषी शख्स का बयान  फिर कोर्ट ने सुना दी रेप के मामले में फांसी की सजा  sc पहुंचा मामला तो हुआ बरी
तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है (Source- Indian Express)
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छह साल की बच्ची से रेप के मामले के आरोपी को पहले लोअर कोर्ट से फांसी की सजा मिली। फिर बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराकर सजा को बरकरार रखा। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो फैसले को खारिज करके दोषी को बरी कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस इस बात पर हैरत में थे कि दोषी प्रकाश निषाद मराठी भाषा नहीं जानता था। फिर भी पुलिस ने मराठी में उसका इकबालिया बयान दर्ज किया। जांच अधिकारी ने कभी भी इस बात की जहमत नहीं उठाई कि आरोपी को उसका इकबालिया बयान पढ़कर भी सुना दिया जाए।

महाराष्ट्र पुलिस के मुताबिक 12 जून 2010 को ये केस दर्ज किया गया था। इसमें प्रकाश निषाद पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 376 (दुष्कर्म), 377 (कुकर्म), 201 (साक्ष्यों को मिटाना) के तहत केस दर्ज हुआ था। पुलिस के मुताबिक प्रकाश ने छह साल की बच्ची के साथ पहले रेप किया और फिर साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से उसकी हत्या कर शव को नाले में फेंक दिया। प्रकाश को उस जगह के नजदीक से गिरफ्तार किया गया था जहां बच्ची के साथ वारदात हुई। उसकी निशानदेही पर वारदात से जुड़ी अहम चीजें किसी दूसरी जगह से बरामद की गईं। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बच्ची के साथ ज्यादती हुई। उसका बाद आरोपी के डीएनए सैंपल की भी जांच फारेंसिक लैब में कराई गई थी।

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नवंबर 2014 को आरोपी को दोषी करार देते हुए सुनाई गई फांसी की सजा

27 नवंबर 2014 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। 2015 में मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा तो वहां से भी फांसी की सजा पर मुहर लगाई गई। लेकिन दोषी लगातार कह रहा था कि वो बेकसूर है। उसे रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।

पुलिस ने नहीं कराया आरोपी का मेडिकल टेस्ट

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संजय करोल की ट्रिपल बेंच के पास ये केस पहुंचा तो सारे मामले पर फिर से गौर किया गया। बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट के साथ हाईकोर्ट ने उन तमाम पहलुओं को नजरंदाज किया जो मामले की अहम कड़ी हो सकते थे। ट्रिपल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि सीआरपीसी के सेक्शन 53 ए के तहत प्रकाश का मेडिकल टेस्ट भी कराने की जरूरत महसूस नहीं की गई। पुलिस ने ऐसा न करने का कोई कारण भी नहीं बताया। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर भी हैरान था कि मामले के जांच अधिकारी भी कई दफा तब्दील कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि सीन ऑफ क्राईम से जो सैंपल जुटाए गए वो काफी समय बाद जांच के लिए भेजे गए। पुलिस ने पंचनामा तक नहीं किया। प्रकाश की निशानदेही पर जिस मकान से वारदात से जुड़ी चीजें बरामद करने का दावा किया गया वो किसी तीसरे शख्स का था। उसका उससे कोई संबंध नहीं था। प्रकाश के ब्लड और सीमेन के सैंपल भी नहीं लिए गए। लिए भी गए तो एक महीने बाद।

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बच्ची के माता-पिता भी नहीं पहचान सके प्रकाश का घर

पुलिस ने प्रकाश निषाद को पहली नजर में कैसे आरोपी मान लिया ये बात भी सुप्रीम कोर्ट को रहस्यमय लगी। पुलिस कहती है कि प्रकाश और बच्ची एक ही बिल्डिंग में रहते थे। ये बात केस की अहम कड़ी है। लेकिन जब बच्ची के माता-पिता से प्रकाश का घर पहचानने को कहा गया तो वो नाकाम रहे। प्रकाश को पुलिस ने न तो उस जगह से गिरफ्तार किया जहां रेप की वारदात हुई थी और न ही उस जगह से जहां पर बच्ची की लाश मिली थी।

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