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वायु प्रदूषण के कारण भारत और पाकिस्तान की महिलाएं सांस और हृदय संबंधी समस्याओं से परेशान

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ का कहना है कि पिछले दो दशक में वायु प्रदूषण वैश्विक संकट बन गया है, खासकर दक्षिण एशियाई देशों में इसका प्रभाव गहरा है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 19, 2024 04:12 IST
वायु प्रदूषण के कारण भारत और पाकिस्तान की महिलाएं सांस और हृदय संबंधी समस्याओं से परेशान
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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अमित बैजनाथ गर्ग

वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर के कारण दक्षिण एशिया, खासकर भारत और पाकिस्तान में महिलाएं सांस और हृदय संबंधी समस्याओं, कैंसर और अन्य बीमारियों से जूझ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे। हालांकि वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है। चिकित्सकों का कहना है कि महिलाओं को इससे कुछ अनोखी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हाल के शोधों में वायु प्रदूषण से महिलाओं में पैदा होने वाले स्तन कैंसर के मामले अधिक पाए गए हैं। वहीं, लकड़ी वाले चूल्हे पर खाना पकाने जैसी गतिविधियां महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ाती हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि घर के अंदर वायु प्रदूषण सिर्फ खाना पकाने से नहीं, बल्कि गर्मी और रोशनी से भी होता है। यह वनों की कटाई और शहरीकरण से काफी हद तक बढ़ गया है। वहीं महिलाएं अपनी शारीरिक संरचना, प्रजनन, संतुलित आहार न लेने, रसोई में अधिक समय बिताने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र न होने के कारण वायु प्रदूषण से अधिक प्रभावित होती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ का कहना है कि पिछले दो दशक में वायु प्रदूषण वैश्विक संकट बन गया है, खासकर दक्षिण एशियाई देशों में इसका प्रभाव गहरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य में योगदान देने वाला प्रमुख पर्यावरणीय कारक है, जिससे दुनिया भर में सालाना सत्तर से नब्बे लाख मौतें होती हैं।

शिकागो विश्वविद्यालय के प्रो माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा कि वायु प्रदूषण से प्रभावित वैश्विक आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा छह देशों- बांग्लादेश, पाकिस्तान, भारत, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया में रहता है। मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा बाहरी खतरा होने के बावजूद एचआइवी-एड्स, मलेरिया और टीबी के लिए सालाना आबंटित पर्याप्त धनराशि की तुलना में वैश्विक वायु गुणवत्ता सुधारने संबंधी बुनियादी ढांचे में निवेश बहुत कम है। इसे बढ़ाने पर सभी प्रमुख संगठनों को विचार करना चाहिए।

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शिकागो विश्वविद्यालय की ओर से जारी ताजा रपट विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान में जीवन प्रत्याशा पर वायु प्रदूषण के गंभीर प्रभावों को रेखांकित करती है। अध्ययन के अनुसार डब्लूएचओ के वायु गुणवत्ता मानकों का पालन करने से भारत के लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा में संभावित रूप से पांच वर्ष, जबकि पाकिस्तान के लोगों की जीवन प्रत्याशा में 3.9 वर्ष का इजाफा हो सकता है।

डब्लूएचओ का कहना है कि अगर वायु प्रदूषण का वर्तमान स्तर जारी रहता है, तो लाहौर, कसूर, शेखपुरा और पेशावर जैसे प्रमुख पाकिस्तानी शहरों में औसत जीवन प्रत्याशा सात साल तक कम हो सकती है। ‘पेशावर क्लीन एयर एलायंस’ संगठन की रपट कहती है कि पाकिस्तान में वायु प्रदूषण के कारण वार्षिक बाईस हजार से अधिक असामयिक मौतें होती हैं।

‘लैंसेट’ पत्रिका के अध्ययन में कहा गया है कि वायु प्रदूषण भारत में सालाना करीब 23 लाख से अधिक असमय मौतों का कारण बनता है। वहीं ‘आइक्यूएयर’ का कहना है कि भारत ने अब दुनिया के तीसरे सबसे प्रदूषित देश का स्थान हासिल कर लिया है। रपट के अनुसार, 2023 में भारत की वायु गुणवत्ता औसत वार्षिक पीएम 2.5 सांद्रता 54.4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के साथ केवल बांग्लादेश और पाकिस्तान से बेहतर है।

बांग्लादेश में यह 90.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, जबकि पाकिस्तान में 73.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इन आंकड़ों ने बांग्लादेश और पाकिस्तान को 134 देशों में क्रमश: सबसे अधिक और दूसरे सबसे प्रदूषित देशों के रूप में स्थान दिया है। पेशावर, लाहौर तथा कराची जैसे पाकिस्तानी शहरों में लोगों को दिल्ली जैसे भारतीय शहरों के समान स्वास्थ्य खतरों का सामना करना पड़ता है। पेशावर की हवा प्रतिदिन चार सिगरेट के बराबर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती है।

प्रदूषण महिलाओं के स्वास्थ्य को कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। कुछ महिलाओं का कहना है कि यह उनकी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में योगदान देता है। कई महिलाओं के लिए बाहरी वायु प्रदूषण के प्रभाव घर के अंदर के वायु प्रदूषण से और भी बदतर हो जाते हैं। परीक्षण से पता चला है कि लकड़ी से खाना पकाने वाली कई महिलाओं को ‘क्रोनिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज’ है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसके कारण सांस लेने में कठिनाई होती है। इसके लिए डाक्टरों ने धूम्रपान और वायु प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया है।

हालांकि लाइलाज होते हुए भी इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। बहुत सारी महिलाओं को इनडोर यानी घर के भीतर वायु प्रदूषण का खमियाजा भुगतना पड़ता है। खाना पकाने जैसी घरेलू गतिविधियों के लिए र्इंधन के रूप में लकड़ी या गोबर का इस्तेमाल करने से हानिकारक कण निकलते हैं, जो महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इसका प्रभाव फेफड़ों की बीमारियों से आगे बढ़कर त्वचा और आंखों की बीमारियों तक शामिल है। ये हानिकारक कण महिलाओं में हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के रोग, कैंसर और मधुमेह का कारण बन सकते हैं।

पाकिस्तान की एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कहती हैं कि जो महिलाएं खाना पकाने के लिए लकड़ी का उपयोग करती हैं, वे प्रदूषण से संबंधित बीमारियों से पीड़ित होती हैं। वहीं गोबर की आग से निकलने वाले धुएं से श्वसन और फेफड़ों की बीमारियां, ब्रोंकाइटिस आदि होती हैं। रसोई संबंधी गतिविधियों के दौरान गैस स्टोव का उपयोग करने और मास्क पहनने की सलाह दी जाती है।

पाकिस्तान में घर में खाना पकाने के लिए लकड़ी और मिट्टी के तेल के उपयोग से जुड़े खतरों के प्रति महिलाओं को आगाह किया जा रहा है। ये कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड और सल्फर डाइआक्साइड जैसी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन करती हैं, जो मस्तिष्क, छाती और फेफड़ों की बीमारियों में योगदान करती हैं। वायु प्रदूषण में वृद्धि अस्थमा और कैंसर जैसी स्थितियों में वृद्धि से भी जुड़ी हुई है। इस बीच, बाहरी वायु प्रदूषण हर किसी के लिए एक बढ़ती हुई समस्या है। वह प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करके पर्यावरण-अनुकूल र्इंट-भट्टों की वकालत करते हैं।

स्त्री रोग विशेषज्ञ वायु प्रदूषण से बचाव के लिए लोगों, विशेषकर श्वसन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त लोगों को मास्क पहनने की सलाह देते हैं। वे प्रदूषण के खिलाफ शरीर को मजबूत बनाने के लिए योग, व्यायाम और पौष्टिक आहार की वकालत करते हैं। स्वच्छ हवा की वकालत करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि सभी सरकारों को इस समस्या के समाधान के लिए और अधिक प्रयास करने की जरूरत है।

वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिए देशव्यापी प्रयासों की जरूरत है, जैसे प्लास्टिक और टायर जलाने पर रोक लगाना। हालांकि अभी हालात में कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा है। पूरे दक्षिण एशिया में महिलाएं वायु प्रदूषण से बड़ी संख्या में बीमार पड़ रही हैं। सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि हरे-भरे स्थान जीवन और स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं, इसलिए हमें पर्यावरण अनुकूल बनना होगा।

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