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जेल से चुनाव जीतने के बाद क्या शपथ ले पाएंगे अमृतपाल और इंजीनियर राशिद? जानें क्या कहता है कानून

Lok Sabha Chunav Result: दोनों की चुनावी जीत का मतलब यह है कि अब जेल में रहने के बावजूद उनके पास सांसद के रूप में संवैधानिक तौर पर जनादेश है।
Written by: न्यूज डेस्क
नई दिल्ली | June 06, 2024 09:32 IST
जेल से चुनाव जीतने के बाद क्या शपथ ले पाएंगे अमृतपाल और इंजीनियर राशिद  जानें क्या कहता है कानून
अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह और इंजीनियर राशिद। (इमेज-पीटीआई और एक्सप्रेस आर्काइव)
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Lok Sabha Chunav Result: देशभर में लोकसभा चुनाव का परिणाम सामना आ चुका है। जेल में बंद खालिस्तानी अलगाववादी अमृतपाल सिंह खडूर साहिब लोकसभा सीट पर विजयी रहा और इंजीनियर राशिद जम्मू-कश्मीर के बारामूला से जीत दर्ज करने में कामयाब रहा। दोनों ही अभी गंभीर आरोपों की वजह से अभी जेल में बंद है। इनके मामलों की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसियों के द्वारा की जा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल है कि अब आगे क्या होगा और वे दोनों सांसद के रूप में शपथ कैसे लेंगे।

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अमृतपाल सिंह मार्च 2023 से एनएसए (NSA) के तहत असम के डिब्रूगढ़ की जेल में हैं। NSA एक ऐसा कानून है जो सरकार को औपचारिक रूप से आरोप लगाए बिना 12 महीने तक व्यक्ति को हिरासत में रखने की इजाजत देता है। राशिद इस समय दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। वह आतंकी फंडिंग मामले में यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं। पूर्व विधायक राशिद ने आवामी इत्तेहाद पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था।

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आप सांसद संजय सिंह को दी थी छूट

दोनों की चुनावी जीत का मतलब यह है कि अब जेल में रहने के बावजूद उनके पास सांसद के रूप में संवैधानिक तौर पर जनादेश है। शपथ लेना सांसदों के रूप में अपनी भूमिका निभाने का पहला कदम है। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें जेल में बंद कई सांसदों को शपथ लेने के लिए अस्थायी तौर पर पैरोल दी गई है। मार्च के महीने में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह को भी अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने के लिए कोर्ट ने इजाजत दी थी। वह मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद थे। एक ट्रायल कोर्ट ने जेल सुपरिटेंडेंट को यह तय करने का भी आदेश दिया था कि उन्हें पुख्ता सुरक्षा के साथ संसद ले जाया जाए और वापस जेल लाया जाए।

ऐसा ही एक और उदाहरण साल 2021 में भी देखने को मिलता है। असम के सिबसागर से जीतने के बाद एनआईए की कोर्ट ने अखिल गोगोई को असम विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के लिए अस्थायी रूप से जेल से बाहर आने की इजाजत दी। वहीं, ट्रेड यूनियनिस्ट जॉर्ज फर्नांडीस ने 1977 में जेल से चुनाव लड़ा था। आपातकाल के दौरान जेल में रहते हुए मुजफ्फरपुर सीट से चुने गए थे। शपथ ग्रहण समारोह से पहले उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

संसद सत्र में भाग लेने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा

शपथ लेने की इजाजत मिलने को यह नहीं मान सकते हैं कि वह जमानत पर रिहा हो गया है। यह एक दिन के लिए खास पैरोल की तरह ही है। जेल में बंद सांसद को स्पीकर को यह लिखकर देना होगा कि वह कार्यवाही में शामिल नहीं हो पाएगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि संविधान के अनुच्छेद 101(4) में कहा गया है कि अगर कोई सांसद बिना इजाजत के 60 दिनों से ज्यादा समय तक सभी बैठकों से नदारद रहता है, तो उसकी सीट खाली घोषित कर दी जाएगी। संसद सत्र में भाग लेने या संसद में वोट देने के लिए सासंद को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा।

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