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मोदी सरकार के सहयोगी हैं नायडू-नीतीश, फिर भी क्यों मुश्किल है विशेष राज्य का दर्जा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार केंद्र सरकार से राज्य को स्पेशल स्टेटस देने की मांग करते रहे हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के नए सीएम ने साल 2018 में एनडीए गठबंधन से अलग होने का फैसला केवल आंध्र प्रदेश को स्पेशल स्टेटस देने की मांग को तवज्जो न मिलने पर किया था।
Written by: आंचल मैगजीन
नई दिल्ली | Updated: June 13, 2024 09:39 IST
मोदी सरकार के सहयोगी हैं नायडू नीतीश  फिर भी क्यों मुश्किल है विशेष राज्य का दर्जा
मोदी सरकार का बिना शर्त समर्थन कर रहे हैं नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू (सोर्स - PTI)
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आंध्र प्रदेश और बिहार दोनों ही राज्यों की सत्ताधारी पार्टियां अल्पमत में चल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को समर्थन दे रही है। सरकार के भीतर आंतरिक चर्चा से पता चलता है कि बीजेपी के दो प्रमुख सहयोगियों द्वारा विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग टीडीपी और जेडी(यू) के लिए आंध्र प्रदेशऔर बिहार के लिए काफी कठिन है। इसकी वजह यह है कि कई ऐसे राज्य हैं, जिन्हें अपने सामाजिक-आर्थिक और राजकोषीय स्वास्थ्य को देखते हुए अधिक अनुदान प्रतिशत की जरूरत पड़ती है।

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स्पेशल स्टेटस दिए गए राज्यों के लिए सबसे बड़ा लाभ यह था कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत 90 प्रतिशत धनराशि केंद्र द्वारा दी जाती थी, जबकि राज्य का योगदान केवल 10 प्रतिशत था। अन्य सभी राज्यों के लिए, यह विभाजन 60-40 के अनुपात में था, केंद्र 60 प्रतिशत देता था और 40 प्रतिशत राज्यों को लगाना पड़ता था।

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क्या है केंद्र की टेंशन?

इसके अलावा विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए केन्द्र सरकार से सामान्य केन्द्रीय सहायता में 90 प्रतिशत अनुदान और 10 प्रतिशत कर्ज शामिल था; अन्य राज्यों के लिए यह 30 प्रतिशत अनुदान और 70 प्रतिशत कर्ज था। केंद्र सरकार को डर है कि इस तरह का रास्ता खोलने सेआंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी इसी प्रकार की मांग उठेगी। ये राज्य संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे हैं, जिनमें बिहार तो काफी पिछड़ा है।

सूत्रों ने बताया कि दोनों ही राज्यों को केंद्र द्वारा विशेष पैकेज के रूप में दिया जा सकता है, जैसे आंध्र प्रदेश में राजधानी अमरावती के निर्माण के लिए धनराशि या शहर के लिए अधिक केंद्रीय परियोजनाएं लॉन्च की जा सकती है।

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राज्यों को दी जा सकती है ये सलाह

जानकारी के मुताबिक योजना आयोग का अस्तित्व समाप्त हो गया और वित्त आयोग ने विशेष श्रेणी के दर्जे की अवधारणा को खत्म कर दिया है। इसके बाद भी पूर्ववर्ती विशेष श्रेणी वाले राज्यों को केंद्र प्रायोजित योजनाओं में 90:10 की हिस्सेदारी के साथ विशेष दर्जा जारी रहा, जिसमें 90 प्रतिशत योगदान केंद्र का था।

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राज्यों से कहा जा सकता है कि वे अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में 16वें वित्त आयोग के समक्ष विशेष श्रेणी के दर्जे के लिए अपना अनुरोध रखें। सूत्रों ने बताया कि वित्त आयोग के सदस्य जून के अंत से राज्यों का दौरा शुरू करेंगे, ताकि राज्यों के मुख्यमंत्रियों और अन्य प्रमुख अधिकारियों से इस मुद्दे पर बातचीत कर सकें। एक अधिकारी ने बताया कि राज्यों ने वित्त आयोग के साथ अपनी बैठकों में पैसे और टैक्स के ट्रांसफर को लेकर अपनी अहम मांगे रखी हैं।

क्या मिल सकते हैं फायदे?

दिलचस्प बात यह भी है कि विशेष राज्य के दर्जे की पुरानी व्यवस्था पर वापस लौटने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है, लेकिन इस मामले को लेकर एक अन्य जानकार ने कहा है कि राज्यों को विशेष पैकेज के रूप में धनराशि प्रदान की जा सकती है, जो एक राजनीतिक निर्णय होगा। व्यक्ति ने कहा कि आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज के तहत राजधानी अमरावती के निर्माण करना अहम हो सकता है। यह पैकेज आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत हो सकता है।

इस मामले में एक अन्य जानकारी ने कहा किआंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून में राज्य की राजधानी के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता का नियम हैं, कुछ धनराशि पहले प्रदान की गई थी, लेकिन पूरी तरह से वितरित नहीं की गई थी क्योंकि राजधानी का निर्माण बंद हो गया था। ऐसे में राज्य धनराशि की मांग कर सकता है, जिसे देने में सभवतः एनडीए सरकार को भी कोई परेशानी नहीं होगी।

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