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ULFA Assam Peace Accord: असम का उल्फा समझौता क्या है? मोदी सरकार के शांति समझौते के बाद उग्रवाद पर कैसे लगेगी लगाम

ULFA Peace Sign: पूर्वोत्तर राज्यों में शांति बहाली की दिशा में आज का दिन काफी अहम है। शुक्रवार को केंद्र सरकार ने उल्फा के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए।
Written by: न्यूज डेस्क
नई दिल्ली | Updated: December 29, 2023 18:12 IST
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असम में शांति बहाली को लेकर उल्फा के साथ अहम समझौता होने जा रहा है।
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ULFA Assam Peace Accord: केंद्र सरकार और असम सरकार 29 दिसंबर को यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के साथ बड़ा समझौता किया है। इसे पूर्वोत्तर में शांति बहाली की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है। उग्रवादी समूह उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में केंद्र, असम सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इस मौके पर अमित शाह ने कहा कि असम लंबे समय तक उल्फा की हिंसा से त्रस्त रहा, वर्ष 1979 से अब तक 10,000 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उन्होंने कहा कि आज का दिन असम के लोगों के लिए बहुत बड़ा दिन, उल्फा ने सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। असम का सबसे पुराना उग्रवादी संगठन उल्फा हिंसा छोड़ने और संगठन को भंग करने पर सहमत हो गया।

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क्या है उल्फा?

बता दें कि असम में उल्फा एक सक्रिय उग्रवादी संगठन है। इसका गठन 1979 में 7 अप्रैल को परेश बरुआ ने अपने साथी अरबिंद राजखोवा, गोलाप बरुआ उर्फ अनुप चेतिया, समीरन गोगोई उर्फ प्रदीप गोगोई और भद्रेश्वर गोहेन के साथ मिलकर किया था। इसका उद्देश्य असम को एक स्वायत्त और संप्रभु राज्य बनाना था। इसके लिए कई बड़े हमले भी हुए। हालांकि 1991 में 31 दिसंबर को उल्फा कमांडर-इन-चीफ हीरक ज्योति महंल की मौत के बाद उल्फा के करीब 9 हजार सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया था। इस घटना के करीब 17 साल बाद 2008 में उल्फा के नेता अरबिंद राजखोवा को बांग्लादेश से गिरफ्तर कर लिया गया। बाद में उसे भारत को सौंप दिया गया था। केंद्र सरकार इस संगठन पर लगाम लगाने के लिए 1990 से काम कर ही है। सैन्य अभियान के जरिए भी इसके खिलाफ कई बार कार्रवाई की गई है।

कारोबारियों ने छोड़ दिया था असम

उल्फा के कारण असम में उग्रवाद चरम पर था। असम में चाय के कई व्यापारियों ने असम छोड़ दिया था। इन व्यापारियों को लगातार धमकी मिलती थी। इनसे फिरौती मांगी जाती थी। कई व्यापारियों की हत्या के बाद इलाके में दहशत का माहौल था। राज्य और अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई के बाद भी इन अंकुश नहीं लग सका। इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से शांति बहाली को लेकर प्रयास तेज किए गए। कई दौर की बातचीत के बाद शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर सहमति बनी है।

कब क्या हुआ?

उल्फा ने 1990 में सुरेंद्र पॉल नाम के एक चाय व्यापारी की हत्या कर दी। इससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल था। अगले ही साल 1991 में एक रूसी इंजीनियर का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी। 2008 में उल्फा ने बड़ा हमला किया। 30 अक्टूबर को एक सात 13 धमाके किए गए। यह धमाके कितने बड़े थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन हमलों में 77 लोगों की मौत हो गई। वहीं 300 से अधिक लोग इन हमलों में घायल हुए थे।

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