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Bengal Politics: मुस्लिम वोट बंटने के डर से कांग्रेस पर हमलावर हैं ममता? जानिए सत्ता में आने के बाद TMC ने इस वर्ग को कैसे रिझाया

Lok Sabha Elections: 2011 में सत्ता में आने के बाद टीएमसी सरकार ने इमामों के लिए भत्ते, मुस्लिम छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, कल्याण बोर्ड के निर्माण और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए 50 करोड़ रुपये के अनुदान की घोषणा करके अल्पसंख्यक वोटों को अपने पक्ष में और मजबूत किया।
Written by: शांतनु चौधरी
कोलकाता | Updated: February 04, 2024 17:12 IST
bengal politics  मुस्लिम वोट बंटने के डर से कांग्रेस पर हमलावर हैं ममता  जानिए सत्ता में आने के बाद tmc ने इस वर्ग को कैसे रिझाया
Lok Sabha Elections: टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी शुक्रवार को केंद्र के खिलाफ अपने धरने के दौरान कोलकाता में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रही हैं। (Express Photo: Partha Paul)
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Lok Sabha Elections: आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर इंडिया गठबंधन के दल कांग्रेस और टीएमसी में पिछले कई दिनों से जुबानी बयानबाजी अपने चरम पर है। यह बयानबाजी उस वक्त और बढ़ गई, जब टीएमसी चीफ ममता ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया। इसके बाद से दोनों दलों के नेताओं के बीच सियासी पारा सातवें आसमान पर है। हालांकि, इस घटनाक्रम के पीछे ममता को ऐसा लगता है कि कांग्रेस राज्य में उनके मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।

अयोध्या में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दिन टीएमसी ने कोलकाता के मुस्लिम बहुल पार्क सर्कस इलाके में सर्व धर्म रैली आयोजित की। ममता ने रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर कटाक्ष करने से लेकर अल्पसंख्यक मतदाताओं तक पहुंचने के लिए सबसे पुरानी पार्टी पर निशाना साधा। बता दें, टीएमसी चीफ ने सबसे पुरानी पार्टी पर ऐसे वक्त हमला बोला। जब कांग्रेस भारत जोड़ो न्याय निकाल रही है, जबकि बीजेपी हिंदुओं को लुभाने कि लिए अयोध्या का मुद्दा उठा रही है। ऐसे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी राज्य में अपने महत्वपूर्ण मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखने के लिए सभी कोशिश रही हैं।

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वहीं विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत धन रोकने के लिए केंद्र के खिलाफ अपने धरने के दौरान शुक्रवार को कोलकाता में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए, ममता ने कहा, "मैंने कांग्रेस से 300 सीटों पर लड़ने (और बाकी को इंडिया गठबंधन के लिए छोड़ने) के लिए कहा, लेकिन वे नहीं माने। अब वे राज्य में मुस्लिम मतदाताओं के बीच हलचल पैदा करने आए हैं। बीजेपी हिंदू वोटरों में हलचल पैदा करने की कोशिश कर रही है। हम जैसे सेक्युलर दल क्या करेंगे? मुझे नहीं पता कि कांग्रेस अगर 300 सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो 40 सीटें भी जीत पाएगी या नहीं।'

यह घोषणा करने के बाद कि उनकी पार्टी टीएमसी आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी। कांग्रेस के खिलाफ ममता के बयान ने संकेत दिया कि टीएमसी अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन नहीं चाहती है, जिस पर उनकी पार्टी ने 2011 में बंगाल में सत्ता में आने के बाद से कब्जा किया है।

22 जनवरी को टीएमसी की सर्व रैली में ममता ने मुस्लिम मतदाताओं से टीएमसी के अलावा किसी अन्य पार्टी का समर्थन करके "अपना वोट बर्बाद" न करने की अपील की।

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बंगाल में पिछली सीपीएम के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार को पारंपरिक रूप से मुस्लिम समुदाय का समर्थन प्राप्त था। हालांकि, 2007 में रिज़वानुर रहमान का मामला सामने आया, जिसे कथित तौर पर उसके प्रभावशाली हिंदू ससुराल वालों ने आत्महत्या के लिए मजबूर किया था और 2006 और 2008 के बीच नंदीग्राम और सिंगूर भूमि आंदोलन। इन सभी ने वाम मोर्चे के खिलाफ टीएमसी के उदय को बढ़ावा दिया और मुस्लिमों के वोट बैंक को ममता के पक्ष में मोड़ दिया।

सत्ता में आने के बाद TMC ने मुस्लिमों के लिए कई योजनाएं शुरू कीं

2011 में सत्ता में आने के बाद टीएमसी सरकार ने इमामों के लिए भत्ते, मुस्लिम छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, कल्याण बोर्ड के निर्माण और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों के लिए 50 करोड़ रुपये के अनुदान की घोषणा करके अल्पसंख्यक वोटों को और मजबूत किया। ममता ने सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम)-एनआरसी (राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) के खिलाफ दिसंबर 2019 और जनवरी 2020 के बीच जारी आंदोलन के पीछे भी अपनी अहम भूमिका निभाई।

ऐसी नीतियों का पालन करते हुए टीएमसी बंगाल में चुनाव दर चुनाव जीतती रही। 2018 और 2023 के पंचायत चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं ने टीएमसी को अपना पूर्ण समर्थन देकर एहसान का बदला चुकाया। यह 2021 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हुआ, जब गठबंधन बनाने के बावजूद कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों 294 विधानसभा सीटों में से एक भी जीतने में विफल रही। जिसमें नई पार्टी आईएसएफ भी शामिल थी।

2021 के बाद ममता ने 2023 में हार देखी

हालांकि, 2023 में टीएमसी ने 2021 के चुनावों के बाद राज्य में अपनी पहली चुनावी हार देखी। वाम समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार बायरन बिस्वास ने फरवरी 2023 में सागरदिघी विधानसभा उपचुनाव जीता।

यह उपचुनाव इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह मुर्शिदाबाद जिले में हुआ था, जहां राज्य में सबसे अधिक 66.28% मुस्लिम आबादी है। परिणाम को टीएमसी के घटते मुस्लिम वोट बैंक के संकेत के रूप में देखा गया। हार के बाद ममता ने पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के नेतृत्व में बदलाव का आदेश दिया था। मई 2023 में बिस्वास भी टीएमसी में चले गए।

ममता ने हाल ही में घोषणा की है कि टीएमसी बंगाल में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेगी, जिससे त्रिकोणीय मुकाबले का मंच तैयार हो गया है, जिससे अल्पसंख्यक वोट टीएमसी और वाम-कांग्रेस गठबंधन के बीच विभाजित हो सकते हैं। वहीं भाजपा राज्य में प्रमुख विपक्ष है।

भाजपा की हिंदुत्व राजनीति का मुकाबला करने के लिए टीएमसी को मुस्लिम समुदाय से जितना संभव हो उतना समर्थन प्राप्त करने की जरूरत है, जो राज्य की आबादी का 27% है। ऐसे में अल्पसंख्यक वोट टीएमसी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, क्योंकि भाजपा हिंदुत्व और राम मंदिर पर भरोसा करके अपने हिंदू आधार को मजबूत करना चाहती है।

बंगाल की 7 लोकसभा सीटें मुस्लिम बहुल

बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 7 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और अन्य 6 सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। 2019 के चुनावों में टीएमसी ने 7 मुस्लिम बहुल सीटों में से 3 और बड़ी मुस्लिम आबादी वाली सभी 6 सीटों पर जीत हासिल की थी। जैसे ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा बंगाल के मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में पहुंची, ममता ने चौतरफा हमला करते हुए दावा किया कि सबसे पुरानी पार्टी इस बार 40 सीटें भी नहीं जीत पाएगी।

शनिवार को बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने ममता पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी आरोप लगाती रही हैं कि कांग्रेस मुस्लिम वोट पाने के लिए तरह-तरह की बातें कर रही है। भाजपा यह भी कह रही है कि आने वाले दिनों में सबसे पुरानी पार्टी कमजोर हो जाएगी, और ममता कह रही हैं कि कांग्रेस द्वारा कुछ भी संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि एक नेता जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। वो ऐसी बातें कहता है तो यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। चौधरी ने पार्टी के मुर्शिदाबाद कार्यालय में मीडियाकर्मियों से यह बात कही। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी बीजेपी से डर गई हैं और यही कारण है कि वह हर दिन अपना रुख बदल रही हैं।

ममता को ऐसा क्यों लग रहा रैली लोगों को बांटने के लिए निकाली जा रही: सौम्या

राज्य कांग्रेस प्रवक्ता सौम्या आइच रॉय ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ममता "प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता" में लिप्त हैं। “जबकि भाजपा राम मंदिर उद्घाटन पर वोट मांग रही है, टीएमसी भी जगन्नाथ मंदिर उद्घाटन (इस साल के अंत में दीघा में होने वाले) पर ऐसा ही कर रही है। कांग्रेस भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रही है। उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि रैली लोगों को बांटने के लिए की जा रही है? वह भाजपा को एक तरीके से संजीवनी देने के लिए यात्रा पर हमला कर रही है। दरअसल, वह लोगों को गुमराह करने के लिए उन्हें धार्मिक आधार पर बांटना चाहती है। वह भाजपा को खुश रखना चाहती हैं।''

'सुबह जय मां काली का जाप, शाम को मुस्लिम रैलियों में भाग'

राज्य भाजपा प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा कि उनकी पार्टी केवल "निर्णायक" राजनीति में विश्वास करती है। उन्होंने कहा, ''उनकी (ममता की) धर्मनिरपेक्षता का ब्रांड यह है कि वह सुबह 'जय मां काली' का जाप करेंगी और शाम को मुस्लिम रैलियों में भाग लेंगी। वह इस तरह की राजनीति की आदी हैं। कांग्रेस भी अलग नहीं है। उनकी राजनीति विभाजनकारी राजनीति है और हमारी राजनीति निर्णायक राजनीति है।"

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