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शादी के आधार पर नौकरी से नहीं निकाल सकते, महिलाओं के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

महिलाओं की जॉब को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने महिला अधिकार की बात करते हुए उनके हक में फैसला दिया है।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: Jyoti Gupta
नई दिल्ली | Updated: February 21, 2024 13:28 IST
शादी के आधार पर नौकरी से नहीं निकाल सकते  महिलाओं के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
मैरिड वुमन की जॉब को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। (Freepik photo)
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सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में बड़ा फैसला दिया है। 26 साल पुराने मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है कि शादी के आधार पर किसी को नौकरी से नहीं निकाल सकते हैं। दरअसल, आज से 26 साल पहले शादी के आधार पर एक महिला अधिकारी को इसलिए सेवा से बर्खास्त कर दिया था क्योंकि उनकी शादी हो गई।

अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए महिलाओं के हित में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह का नियम बेहद मनमाना था। महिला की शादी हो जाने के कारण उसकी नौकरी समाप्त करना लैंगिक भेदभाव और असमानता है।

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शादी के आधार पर किसी महिला को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता

मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि, शादी के आधार पर महिलाओं को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। महिला कर्मचारियों को शादी के अधिकारी से वंचित नहीं किया जा सकता है। इसे आधार बनाने वाले नियम असंवैधानिक है। ये नियम पितृसत्तात्मक हैं जो मानव गरिमा को कमजोर करते हैं।

ये निष्पक्ष व्यवहार के अधिकार को कमजोर करते हैं। इतना ही नहीं कोर्ट ने क्रेंद्र सरकार को शादी के आधार पर सेवा से बर्खास्त की गई सैन्य नर्सिंग अधिकारी को 60 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

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26 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं सेलिना जॉन

दरअसल, याचिकाकर्ता सेलिना जॉन पिछले 26 सालों से अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं। अब कोर्ट के फैसले के साथ उनकी लड़ाई समाप्त होई है। उनकी जीत हुई है और अन्य महिलाओं को भी अधिकार मिला है।

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रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य नर्सिंग सेवा देने वाली सेलिना जॉन को बिना कारण बताओ नोटिस दिए ही नौकरी से रिलीज दिया गया था। वे आर्मी अस्पताल में प्रशिक्षु के रूप में शामिल हुईं थीं। उन्हें NMS में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन दिया गया था।

बाद में उन्होंने एक सेना अधिकारी मेजर विनोद राघवन से शादी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब 26 सालों बाद इसे लैगिंग भेदभाव का मामला बताया और महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।

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