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मलेरिया को जड़ से खत्म करने के लिए गंभीर चिंतन की जरूरत

विश्व की आधी आबादी पर मलेरिया का खतरा बना हुआ है। मलेरिया की रोकथाम और नियंत्रण के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में दुनिया अभी काफी पीछे है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 10, 2024 09:36 IST
मलेरिया को जड़ से खत्म करने के लिए गंभीर चिंतन की जरूरत
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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रामानुज पाठक

मलेरिया कोई ‘वायरस’ (विषाणु) या ‘बैक्टीरिया’ (जीवाणु) जनित रोग नहीं है। यह एक ‘प्रोटोजोआ’ यानी परजीवी है, जो सामान्य विषाणु से हजारों गुना बड़ा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कोविड-19 विषाणु में लगभग बारह जीन होते हैं, जबकि मलेरिया में पांच हजार जीन पाए जाते हैं। मलेरिया परजीवी चार जीवन चक्रों से गुजरता है।

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संक्रामक रोगाणुओं के साथ-साथ यह और विकराल रूप धारण कर लेता है। मलेरिया एक मच्छर-जनित रक्त रोग है, जो प्लास्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है। इस परजीवी का प्रसार संक्रमित मादा एनाफिलीज मच्छरों के काटने से होता है। मानव शरीर में प्रवेश करने के बाद परजीवी शुरू में यकृत कोशिकाओं के भीतर वृद्धि करते हैं, फिर लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) को नष्ट करते हैं।

ऐसी पांच परजीवी प्रजातियां हैं, जो मनुष्यों में मलेरिया संक्रमण का कारण बनती हैं। इनमें से दो प्रजातियां, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम और प्लाज्मोडियम वाइवैक्स हैं, जिनसे मलेरिया संक्रमण का सर्वाधिक खतरा होता है। विश्व मलेरिया रिपोर्ट के अनुसार, इस बीमारी ने 2021-2022 में अनुमानित छह लाख उन्नीस हजार लोगों की जान ले ली।

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रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में पिछले दस वर्षों में मलेरिया के मामलों और मौतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। वैश्विक मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा शुरू किया गया था और इसका उद्देश्य वैश्विक प्रयासों के समन्वय से मलेरिया को नियंत्रित तथा खत्म करना है। इसका लक्ष्य मलेरिया मामलों और मृत्यु दर को वर्ष 2020 तक कम से कम 40 फीसद, वर्ष 2025 तक 75 फीसद और वर्ष 2015 की आधार रेखा के मुकाबले वर्ष 2030 तक कम से कम 90 फीसद कम करना है।

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विश्व की आधी आबादी पर मलेरिया का खतरा बना हुआ है। मलेरिया की रोकथाम और नियंत्रण के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में दुनिया अभी काफी पीछे है। ‘स्टैस्टिटा’ की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में मलेरिया पचासी देशों में स्थानिक महामारी के रूप में सक्रिय था।

मामूली सुधार के बावजूद विश्व अभी भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के उस लक्ष्य से पीछे है, जिसमें 2025 तक मलेरिया से प्रभावित देशों की संख्या 75 तक लाने की बात कही गई है। अब तक कुल 43 देशों को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मलेरिया मुक्त देश घोषित किया जा चुका है। डब्लूएचओ उन देशों को मलेरिया मुक्त घोषित करता है, जहां तीन साल तक मलेरिया के कोई स्थानिक मामले नहीं पाए जाते हैं।

भारत में ओड़ीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में मलेरिया के मामले सबसे ज्यादा हैं। इन राज्यों में मानसून के बाद जलभराव, वेक्टर (वाहक) की मौजूदगी के कारण मच्छर पनपते हैं, जो मलेरिया के मामलों को बढ़ाते हैं। भारत एक गर्म जलवायु वाला देश है। यहां गर्मी और बरसात का मौसम मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल होता है।

भारत में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एनएमसीपी) 1953 में शुरू किया गया था। यह तीन प्रमुख गतिविधियों पर केंद्रित है, डीडीटी के साथ कीटनाशक अवशिष्ट छिड़काव (आइआरएस), मामलों की जांच और निगरानी तथा रोगियों का उपचार। मलेरिया उन्मूलन के लिए डब्लूएचओ की वैश्विक तकनीकी रणनीति के आधार पर एनएफएमई (नेशनल फ्रेमवर्क आफ मलेरिया एलिमिनेशन) के लक्ष्य तय किए गए, जिसके तहत 2030 तक पूरे देश से मलेरिया को खत्म करना है।

कुछ साल पहले तक किसी भी देश में कोई पैरासाइटिक (परजीवी) रोगरोधी टीका विकसित नहीं हुआ था। अब मलेरियारोधी दो टीके आ चुके हैं, जिनके नाम आरटीएस-एस तथा आर-21 हैं। इसका फार्मूला आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में जेनर इंस्टीट्यूट के निदेशक एड्रियन हिल ने तैयार किया है। बच्चों में मलेरिया के गंभीर मामलों को रोकने में पहले टीके की प्रभावशीलता लगभग 30 फीसद है, लेकिन यह एकमात्र स्वीकृत टीका है।

यूरोपीय संघ के औषधि नियामक ने वर्ष 2015 में यह कहते हुए इसे मंजूरी दी थी कि इसके जोखिमों की तुलना में लाभ कहीं अधिक हैं। आरटीएस का उद्देश्य मलेरिया मच्छर के काटने से मानव रक्त प्रवाह में इसके प्रवेश करने और यकृत कोशिकाओं को संक्रमित करने के पहले चरण से ही बचाव के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली तैयार करना है।

मगर यह परजीवी उपभेदों के खिलाफ पर्याप्त रक्षा नहीं प्रदान करता। परजीवी टीके का प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं, इसलिए टीके को और विकसित करने की आवश्यकता है। टीके का प्रयोग असुविधाजनक माना गया है, क्योंकि एक बच्चे को दो साल की उम्र से पहले चार टीके लगते हैं, जो अधिकांश अन्य बीमारियों के लिए नियमित टीकों की तय अवधि से मेल नहीं खाते, वहीं टीका आंशिक रूप से ही प्रभावी है।

2009 से 2014 के बीच दस हजार से अधिक अफ्रीकी बच्चों में किए गए परीक्षण से पता चला कि चार खुराक लेने के बाद भी यह टीका लगभग 40 फीसद ही मलेरिया संक्रमणों को रोक सका। टीके का असर दीर्घकालिक नहीं है। यह स्पष्ट नहीं है कि टीका लगने के बाद प्रतिरोध कितने समय तक सक्रिय रहेगा। पिछले परीक्षणों में चार साल तक के बच्चों का टीकाकरण किया गया था। जबकि दूसरा टीका आर-21 मलेरिया उन्मूलन में अधिक प्रभावी है।

मलेरिया के चारों जीवन चक्र बेहद अलग हैं और इनसे निपटने के लिए अलग-अलग प्रतिजन की आवश्यकता होती है। प्रतिजन वह पदार्थ है, जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ‘एंटीबाडी’ पैदा करने के लिए सक्रिय करता है। इसके अलावा ‘स्पोरोजोइट्स’ (कोशिकाओं के एक रूप) पर गौर किया गया, जो मच्छर त्वचा पर काटकर मानव शरीर में छोड़ते हैं। इन कोशिकाओं के यकृत में पहुंचने से पहले इनका पता लगाने की कोशिश की गई।

ये कोशिकाएं तेजी से फैलती हैं और ज्यादा समय तक जीवित रहती हैं। हर मच्छर छोटी मात्रा में ‘स्पोरोजोइट’, शायद बीस ‘स्पोरोजोइट’, त्वचा में छोड़ते हैं। अगर इंसानी शरीर इन बीस ‘स्पोरोजोइट’ को झेल लेता है, तो माना जाता है कि आप सुरक्षित हैं। लेकिन एक भी ‘स्पोरोजोइट’ आगे बढ़ जाता है, तो आपके लिए मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। आर-21 टीकाकरण की स्थिति अभी संतोषजनक नहीं है।

हालांकि भारत में आर-21 टीके की लाखों खुराक भंडार करके रखी गई है। इसकी तुलना में अगर देखें तो आक्सफर्ड और एस्ट्राजेनेका कोरोनारोधी टीके को 2020 में नए साल की पूर्व संध्या पर मंजूरी दी गई थी और झटपट अगले ही सप्ताह कई देशों में इसका इस्तेमाल शुरू हो गया था। उस वर्ष अफ्रीका में कोविड-19 की तुलना में मलेरिया से अधिक मौतें हुई थीं।

मलेरियारोधी पहला टीका आरटीएस-एस पहले ही एक बड़े सुरक्षा परीक्षण के तहत लाखों बच्चों को लगाया जा चुका है और इसका इस्तेमाल वास्तव में बहुत अधिक है, इसलिए अफ्रीका में बड़े पैमाने पर टीकाकरण किया जा सकता है। दुनिया भर में मलेरिया को जड़ से खत्म करने के बारे में अधिक गहराई से सोचने की आवश्यकता है।

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