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सेतुसमुद्रम और कच्चातिवु द्वीप नहीं, यहां चुनाव में ओ पनीरसेल्वम की लड़ाई की चर्चा, जानें श्रीलंका के सामने वाली रामनाथपुरम सीट के क्या हैं समीकरण

Ramanathapuram Lok Sabha Seat: ओट्टाकरथेवर पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) का कहना है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि मोदी सरकार के रिकॉर्ड को देखकर मुसलमान भी उन्हें वोट देंगे। वो कहते हैं कि मोदी राज में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना नहीं बनाया गया है।
Written by: अरुण जनार्दनन
नई दिल्ली | Updated: April 12, 2024 09:51 IST
सेतुसमुद्रम और कच्चातिवु द्वीप नहीं  यहां चुनाव में ओ पनीरसेल्वम की लड़ाई की चर्चा  जानें श्रीलंका के सामने वाली रामनाथपुरम सीट के क्या हैं समीकरण
Ramanathapuram Lok Sabha Seat: ओ पन्नीरसेल्वम मंगलवार शाम रामनाथपुरम के पास एक तटीय गांव देवीपट्टिनम में एक चुनावी रैली को संबोधित करने के दौरान सभा में मौजूद महिलाएं (इनसाइट में ओ पन्नीरसेल्वम)। (Photo: Arun Janardhanan)
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Ramanathapuram Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव को लेकर सभी दल जीत हासिल करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अगर हम दक्षिणी तमिलनाडु में स्थित रामनाथपुरम लोकसभा सीट की बात करें तो यहां का मुकाबला काफी दिलचस्प देखने को मिल सकता है। क्योंकि रामनाथपुरम पर लंबे वक्त से भाजपा की नजर है।

केंद्र में यूपीए सरकार के तहत इसने भारत और श्रीलंका के बीच एक शिपिंग मार्ग बनाने के लिए सेतुसमुद्रम परियोजना के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, जिसका एक छोर रामनाथपुरम को छूता था। यह दावा करते हुए कि यह रामायण के अनुसार भगवान राम की सेना द्वारा बनाए गए पुल को नष्ट कर देगा।

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रामनाथपुरम से पीएम मोदी के चुनाव लड़ने की थी चर्चा

पिछले साल यह चर्चा शुरू हुई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनकी सरकार तमिलों तक व्यापक पहुंच बना रही है, रामनाथपुरम से चुनाव लड़ेंगे।
लोकसभा चुनाव की लड़ाई शुरू होने के बाद भाजपा ने एक और पासा फेंका। भाजपा ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर रामनाथपुरम तट से 33 किमी दूर स्थित कच्चातिवु द्वीप को देने का आरोप लगाया, और सत्तारूढ़ द्रमुक (जो राज्य में भी सत्ता में थी) पर फैसला लेने में सहभागी होने का आरोप लगाया।

श्रीलंका से सामने है रामनाथपुरम लोकसभा सीट

रामनाथपुरम निर्वाचन क्षेत्र ऐसी जगह है। जिसका सीधा सामना श्रीलंका से होता है। मछुआरों का निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद उपरोक्त में से कोई भी मुद्दा यहां नहीं है। यहां लड़ाई की सबसे खास बात ओ पनीरसेल्वम (OPS) की उम्मीदवारी है, वह व्यक्ति जो दिसंबर 2016 में जे जयललिता के निधन के बाद से अन्नाद्रमुक में बदलाव का चेहरा बन गया है। इसे ज्यादातर भाजपा द्वारा किए गए प्रयास के रूप में देखा जाता है। OPS का पूरा नाम ओट्टाकरथेवर पन्नीरसेल्वम है।

पार्टी मंचों और कोर्ट में अन्नाद्रमुक पर नियंत्रण के लिए लगातार लड़ाई हारने के बाद अन्नाद्रमुक से अलग होने के बाद ओपीएस को भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। पूर्व सीएम अब भाजपा के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।

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अब शायद वह अपना आखिरी रुख अपना रहे हैं, उस सीट पर जो 2019 में DMK की सहयोगी IUML ने जीती थी, और जहां पार्टी मजबूत बनी हुई है। 73 वर्षीय व्यक्ति देर शाम तक प्रचार कर रहे हैं, जितना संभव हो उतना मैदान कवर करने की कोशिश कर रहे हैं। मंगलवार की आधी रात के करीब रामनाथपुरम शहर के पास एक छोटे से गांव में एक अभियान बैठक से एक काफिले में गाड़ी चलाते हुए ओ पनीरसेल्वम अपने लक्ष्य पर अडिग है।

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उन्हें ई पलानीस्वामी के नेतृत्व वाले आधिकारिक गुट के खिलाफ बगावत करने का कोई अफसोस नहीं है। जिसके चलते उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। जिसमें उन्होंने 45 साल से अधिक समय बिताया था। ओपीएस कहते हैं कि मेरे सभी कदम पार्टी को कुछ लोगों से वापस लाना और इसे सामान्य अन्नाद्रुमक कार्यकर्ताओं को सौंपना था।

ओपीएस जिन लोगों के बारे में बात करते हैं। वे हैं जयललिता की विश्वासपात्र वीके शशिकला और उनकी भतीजी टीटीवी दिनाकरण हैं। जो अब एआईएडीएमके से भी निष्कासित हैं और ओपीएस की तरह भाजपा खेमे का हिस्सा हैं।

ओपीएस वास्तव में दिनाकरन को थेनी सीट से चुनाव लड़ने देने पर सहमत हो गए हैं, जिसे 2019 में ओपीएस के बेटे ओपी रवींद्रनाथ कुमार ने जीता था (एकमात्र निर्वाचन क्षेत्र जो तब द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन ने नहीं जीता था)। रवींद्रनाथ अब ओपीएस के पैतृक शहर थेनी में दिनाकरन के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

दूसरी ओर रामनाथपुरम जहां से ओपीएस चुनाव लड़ रहे हैं, उनके लिए अपेक्षाकृत नया मैदान है। पहले से ही मौजूदा विधायक होने के बावजूद उन्होंने जोखिम उठाया है। सहयोगियों का कहना है कि भाजपा ने समर्थन के आश्वासन पर उन्हें अंतिम क्षण तक इंतजार कराया, क्योंकि वह अन्नाद्रमुक के साथ समझौते की गुंजाइश तलाश रही थी।

ओपीएस को थेवर जाति से उम्मीद

ओपीएस की सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि थेवर (ओबीसी समुदाय है जिससे वह आते हैं) जिसका यहां दबदबा है, उनके साथ खड़ा होगा। DMK गठबंधन ने IUML के 2019 के विजेता के नवास कानी को फिर से मैदान में उतारा है। एआईएडीएमके के पी जयपेरुमल और नाम तमिलर काची की चंद्रप्रभा भी मैदान में हैं।

उन खबरों का खंडन करते हुए कि उन्हें थेनी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था? ओपीएस का कहना है कि उन्होंने ही रामनाथपुरम को चुना था क्योंकि यह वह स्थान है जहां भगवान राम ने सीता देवी को बचाने के लिए समुद्र पर पुल बनाया था।

रामनाथपुरम सीट पर बीजेपी बड़ा रही कदम

यह तथ्य भी कि भाजपा यहां धीमी गति से बढ़त हासिल कर रही है, एक अन्य कारक रहा होगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में अगर उसे 16.5% वोट मिले तो 2014 तक यह बढ़कर 17.20% हो गया। 2019 में बीजेपी-एआईएडीएमके को मिलकर 32.31% वोट मिले थे।

जबकि 2014 में विजेता AIADMK ( 40.81% वोटों के साथ) थी। उपविजेता DMK (28.81% वोटों के साथ) थी। 2019 में DMK सहयोगी IUML को 44.29% वोट मिले और AIADMK-भाजपा गठबंधन दूसरे स्थान पर था।

रामनाथपुरम की महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक आबादी को देखते हुए IUML 2019 की जीत एक आकस्मिक घटना नहीं थी, एक और कारण यह है कि भाजपा ने यहां सहयोगियों की पीठ पर कदम रखा है। इस बार अगर डीएमके के साथ आईयूएमएल है तो एआईएडीएमके के पास सहयोगी के रूप में पीएफआई की राजनीतिक शाखा एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) है।

मोदी सरकार में किसी अल्पसंख्यक को निशाना नहीं बनाया गया- ओपीएस

ओपीएस का कहना है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि मोदी सरकार के रिकॉर्ड को देखकर मुसलमान भी उन्हें वोट देंगे। वो कहते हैं कि मोदी राज में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना नहीं बनाया गया है। सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है।

ओपीएस यह भी कहते हैं कि चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद से उनकी मोदी के साथ कोई विस्तृत बातचीत नहीं हुई है। वह 2016 से उनके लिए "सम्मान" का दावा करते हैं। वो कहते हैं हर कोई उनका सम्मान करता है, और यह निश्चित है कि वह तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बनेंगे।

पलानीस्वामी की ओर लौटते हुए और वह क्यों सोचते हैं कि एआईएडीएमके अब वह पार्टी नहीं रही, जो वह थी?ओपीएस कहते हैं कि जब एमजीआर ने पार्टी शुरू की, तो इसके कई नियम थे, और सबसे महत्वपूर्ण करोड़ों कार्यकर्ताओं द्वारा पार्टी महासचिव का प्रत्यक्ष चुनाव था। पलानीस्वामी ने इसे बर्बाद कर दिया है।

उन्होंने इस बात से इनकार किया कि पलानीस्वामी को "तानाशाहीपूर्ण, अलोकतांत्रिक" बताने का उनका वर्णन अन्नाद्रमुक के लिए लंबे समय से सही रहा है। ओपीएस कहते हैं कि अम्मा (जयललिता) बहुत लोकतांत्रिक थीं। उन्होंने जो कुछ भी किया वह मेरे जैसे लोगों, अधिकारियों और एक्सपर्ट के परामर्श से किया… पलानीस्वामी की तरह नहीं।

हालांकि, सभी लोग ओपीएस द्वारा खुद को अन्नाद्रमुक की आंतरिक लड़ाई के शिकार के रूप में प्रस्तुत करने पर विश्वास नहीं करते हैं। कई लोग उन्हें उस व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने जयललिता के निधन के तुरंत बाद अन्नाद्रमुक को धोखा दिया था, खासकर जब वह उनकी ओर से उस समय सीएम के रूप में कार्य कर रहे थे (जैसा कि उन्होंने पहले भी किया था)।

वहीं भाजपा गठबंधन के भीतर भी कुछ लोग उन्हें टिकट दिए जाने से खुश नहीं हैं और नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार करते हैं कि वे उन्हें हराने के लिए काम कर रहे हैं। तमिल मनीला कांग्रेस के मदुरै स्थित एक नेता कहते हैं (जो एनडीए का भी हिस्सा हैं) , 'ओपीएस वह व्यक्ति थे जिन्होंने पार्टी छोड़े बिना अन्नाद्रमुक के भीतर विद्रोह शुरू कर दिया था। लोग इसे स्वीकार नहीं करते, भले ही वे जहाज से कूदने वाले नेताओं को माफ कर दें।

यही कारण है कि अन्नाद्रमुक के अन्य विद्रोहियों जैसे दिनाकरन (थेनी) और नैनार नागेंद्रन (तिरुनेलवेली) को अधिक अनुकूल दृष्टि से देखा जाता है। कई लोग बताते हैं कि नागेंद्रन ने 2017 में अन्नाद्रमुक छोड़ दिया था, वहीं दिनाकरन ने भाजपा के खिलाफ लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी थी।

ओपीएस के लिए इस धारणा से बचना मुश्किल हो गया है कि उन्होंने अन्नाद्रमुक के भीतर विद्रोह भड़काने में आरएसएस के पिट्ठू के रूप में काम किया। 2019 में, आरएसएस के वरिष्ठ विचारक एस गुरुमूर्ति ने तुगलक पत्रिका के स्वर्ण जयंती समारोह में दावा किया था कि उनकी सलाह पर ही ओपीएस ने शशिकला के खिलाफ विद्रोह किया था, जो खुद को जयललिता की स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में देखती थीं।

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