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राकेश सिन्हा का कॉलम संदर्भ: धर्मनिरपेक्षता का भारतीय पक्ष

धर्मनिरपेक्षता का भारतीय पक्ष समझने के लिए संस्कृति और पूजा पद्धति में अंतर रेखांकित करना आवश्यक है। हालांकि दोनों पर एक दूसरे का सीमित प्रभाव है, पर दोनों की स्वायत्तता भी बनी रहती है। जब एक दूसरे पर आरोपित करने का प्रयास होता है, तब विवाद गहराता है और यूरोप मार्गदर्शक बन जाता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: March 24, 2024 12:17 IST
राकेश सिन्हा का कॉलम संदर्भ  धर्मनिरपेक्षता का भारतीय पक्ष
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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राकेश सिन्हा

चुनाव के समय जो शब्द सबसे अधिक विमर्श का हिस्सा बनता है वह है धर्मनिरपेक्षता। यह कुछ हद तक देश की राजनीति ही नहीं, बौद्धिक, अकादमिक जगत सहित अन्य क्षेत्रों में ध्रुवीकरण का कारण भी बनता है। राजनीति का अपना स्वभाव होता है। इसे जानते-समझते भी बौद्धिक अकादमिक जगत उसी बहस का सहचर बनता है। यही कारण है कि लंबी समयावधि में भी हम अपनी संस्कृति को परिभाषित नहीं कर पाए हैं। समाजशास्त्र की पुस्तकें यूरोपीय दृष्टिकोण से उधार लेकर परिभाषाएं एवं प्रकृति को गढ़ती रही हैं।

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एक विडंबना और विरोधाभास रोचक है। भारतीय राजनेता जो यूरोप से शिक्षित हुए और वहां की वैश्विक दृष्टि से प्रभावित हुए, वे उसी में भारत के लोगों के धार्मिक व्यवहार और परंपरा को देखने की कोशिश करते रहे। इनमें स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू भी थे। उन्हें इस दृष्टिकोण को आधिपत्यवादी बनाने में मार्क्सवादी विद्वानों का साथ मिला।

हमारी अपनी संस्कृति और पूर्वजों की धार्मिक प्रवृत्ति गोलमटोल प्रशंसनीय लेखों की सामग्री बनकर रह गई। एक दूसरा पक्ष भी है। यूरोप के जो अधिकारी और समाजशास्त्री भारत आए, उन्होंने भारत के अंतर्मन को समझने का प्रयास किया। इसका सबसे अच्छा उदाहरण औपनिवेशिक काल की आठ जनगणनाएं हैं। पहली जनगणना 1872 में शुरू हुई और अंतिम 1941 में।

इसकी खास बात थी कि यह सिर्फ संख्या गिनने और सामाजिक-आर्थिक पक्ष जानने तक सीमित नहीं थी, बल्कि बहुत ही गहन तरीके से समुदायों, जातियों, वर्गों में विभाजित लोगों का स्वभाव, उनकी परंपराएं, इतिहास और आध्यात्मिक वृति समझने के अवसर के रूप में उपयोग किया गया। इसलिए उन रपटों में विस्तार से उसका उल्लेख भी किया गया है। उनमें अनेक इस सूक्ष्म संस्कृतियों, परंपराओं आध्यात्मिक चेतना से प्रभावित होने से नहीं बच पाए।

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इन रपटों से समाजशास्त्रियों ने आंकड़े लिए, पर उनके पीछे जो वैचारिक समझ थी, उसे छोड़ दिया। औपनिवेशिक जनगणना पर बहुत ही अल्प अध्ययन भी इसका एक बड़ा कारण है। इन रपटों के अध्ययन से धर्मनिरपेक्षता के भारतीय पक्ष को समझना आसान होगा और उस अध्ययन शैली से समकालीन शोध को बड़ा फलक मिल सकता है। वास्तव में 1872 की जनगणना में यह प्रश्न उठाया गया था कि ‘हिंदू कौन है!’ उसके बाद की सभी जनगणनाओं में राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की रपटों में इसका उत्तर ढूंढ़ा जाता रहा। आखिर निष्कर्ष निकला कि विविधताओं से पूर्ण हिंदू शब्द को परिभाषित करना असंभव है।

धर्मनिरपेक्षता का भारतीय पक्ष समझने के लिए संस्कृति और पूजा पद्धति में अंतर रेखांकित करना आवश्यक है। हालांकि दोनों पर एक दूसरे का सीमित प्रभाव है, पर दोनों की स्वायत्तता भी बनी रहती है। जब एक दूसरे पर आरोपित करने का प्रयास होता है, तब विवाद गहराता है और यूरोप मार्गदर्शक बन जाता है।

धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद संस्कृति होती है जो एक समाज के लंबे समय से उसके व्यवहार, उसकी आकांक्षा और परस्पर संबंधों के आधार पर निर्धारित होती है। भारत में मूल आस्था हिंदू चेतना से जुड़ी रही है। जब तक उस चेतना का आयाम हम नहीं समझ पाते, उसकी प्रवृत्ति को सही रूप स्वरूप में नहीं जान पाएंगे। व्यवहार की स्वतंत्रता ही इसके मूल में है। व्यक्ति और समुदाय व्यवहार में प्रयोगधर्मी है।

इसी ने विविधता को भारतीय समाज का स्थायी भाव बना दिया। आध्यात्मिक साहित्य, वेद, उपनिषद, पुराणों मे यह दार्शनिक रूप में परिलक्षित है। इसी कारण से बहुमतवाद का साया भारतीय धर्म-संस्कृति के प्रवाह पर नहीं पड़ा, जिसे हम यूरोप और इस्लामी दुनिया में देखते है। जब पूरी दुनिया में पारसी समुदाय संकट में था, तब 1921 और 1931 के बीच इसकी जनसंख्या 7.8 फीसद की दर से भारत में बढ़ी।

31 करोड़ आबादी वाले देश में तब एक लाख नौ हजार सात सौ बावन पारसी और चौबीस हजार यहूदी आस्था और संस्कृति में पूर्ण स्वतंत्र थे। किसी ने उन पर चोट की कल्पना तक नहीं की। भारतीय धर्मनिरपेक्षता समन्वयात्मक रास्ते से चलती है। यह राह अपरिवर्तनीय है। इसकी संस्कृति का प्रभाव दूसरी पूजा पद्धतियों पर हुआ। कोलकाता में एक काली मंदिर का नाम फिरंगी काली मंदिर है।

संस्कृति रचनात्मक संवाद और सामुदायिक सहयोग पर आधारित है। तभी तो 1921 की जनगणना रपट में बताया गया कि मदुरई के तंजौर मंदिर में मुसलिम ट्रस्टी थे, जो रक्षासूत्र और चंदन-टीका कर मंदिर की बैठकों में आते थे। मद्रास के जनगणना अधिकारी जे चार्ल्स मोलोनी ने 1921 में लिखा था कि नागोर में मुसलिम ‘अल्ला-ईश्वर’ की मूर्ति बनाकर तीर्थयात्रा पर जाते थे और साथ तीर्थयात्रा एक हज के समकक्ष माना जाता था।

संस्कृति विरोधाभासों को समाप्त करती है और सामुदायिकता बढ़ाती है। भारत की धर्मनिरपेक्षता का यह प्रवाह ही इसे जीवंत बनाता है। चुनावी शोरगुल से हटकर संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन के भारतीय प्रकृति पर वैज्ञानिक और सर्वेक्षण आधारित अध्ययन हमें अपनी परिभाषा और प्रकृति गढ़ने और समझने का अवसर देता है। यह एक चुनौती भी है भारत के अकादमिक जगत के लिए।

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