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राजपाट: विधानसभा अध्यक्ष से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग

राजद का दावा है कि जद (एकी) और जीतनराम मांझी की पार्टी के कई विधायक उसके संपर्क में हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | February 10, 2024 13:58 IST
राजपाट  विधानसभा अध्यक्ष से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग
अवध बिहारी चौधरी। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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बिहार में भाजपा और जद (एकी) गठबंधन की सरकार को सदन में बहुमत साबित करना अभी बाकी है। नीतीश सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर विधानसभा में 12 फरवरी को मतदान होगा। राजग सरकार विधानसभा अध्यक्ष को लेकर आशंकित है। अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी ठहरे राजद के नेता। जद (एकी) और भाजपा के विधायकों ने उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की थी। पर चौधरी ने साफ इनकार कर दिया। फरमाया कि वे नीतीश सरकार के सदन में बहुमत साबित कर देने के बाद ही पद छोड़ने के बारे में फैसला करेंगे।

हालांकि जद (एकी) विधायकों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दे दिया है। नियमानुसार अविश्वास प्रस्ताव प्राप्त होने के 14 दिन के भीतर अध्यक्ष को फैसला करना जरूरी है। चौधरी ने कहा कि उन्हें तो इस अविश्वास प्रस्ताव की जानकारी आठ फरवरी को ही मिली है। लिहाजा 12 फरवरी को सदन की कार्यवाही का संचालन वे ही करेंगे।

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राजद का दावा है कि जद (एकी) और जीतनराम मांझी की पार्टी के कई विधायक उसके संपर्क में हैं। भाजपा को अपने गिरेबां में भी झांकना चाहिए। उसे छोड़कर 2022 में नीतीश ने जब राजद के साथ साझा सरकार बनाई थी तब विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा भाजपा के थे। राजद की इस्तीफे की मांग उन्होंने ठुकरा दी थी। अब राजग के लोग अवध बिहारी चौधरी को नैतिकता का पाठ किस मुंह से पढ़ा सकते हैं।

ममता के बहाने

भाजपा कांग्रेस पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ती है। अब उसे ममता बनर्जी ने और मुद्दा थमा दिया। फरमाया कि कांगे्रस वाराणसी में नरेंद्र मोदी को हराकर दिखाए। और आगे जाकर यहां तक बोल दिया कि 40 सीटें भी नहीं जीत पाएगी कांगे्रस। ममता भूल गईं कि वे खुद को चाहे जितना बड़ा नेता समझती हों पर विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम में उन्हीं के पुराने चेले सुवेंदु अधिकारी ने भाजपा उम्मीदवार की हैसियत से 2021 में उन्हें धूल चटाई थी।

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बहरहाल राष्टपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के समर्थन में राज्यसभा में जब प्रधानमंत्री कांगे्रस की धज्जियां उड़ा रहे थे तो उल्लेख ममता बनर्जी के बयान का ही कर रहे थे कि कांगे्रस को 40 सीटें भी नहीं मिलने वाली। इतने विरोधाभासों वाले गठबंधन की विश्वसनीयता पर किसे संदेह नहीं होगा? देखना है अब यह गठबंधन और क्या बुरा देखता है।

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उपराष्ट्रपति को बधाई

राज्यसभा में राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण पर चर्चा में जवाब देने के दौरान प्रधानमंत्री ने पीठ पर बैठे सभापति को गलती से आदरणीय राष्ट्रपति कह कर संबोधित कर दिया। उनकी इस गलती के बाद विपक्षी सांसदों ने सभापति जगदीप धनखड़ को बधाई देनी शुरू कर दी कि आप राष्ट्रपति बन गए। प्रधानमंत्री ने भी माहौल को खुशनुमा बनाते हुए धनखड़ के लिए कई बार बधाई हो बोला।

अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री के मुंह से निकली यह बात धनखड़ के भविष्य के लिए शगुन साबित होती है या नहीं। कई हलकों में धनखड़ के अगले राष्ट्रपति बनने की भविष्यवाणी की जाती रही है। हालांकि अभी तो यह दूर का मामला है पर धनखड़ के लिए इसे आगे का शुभ शगुन बनना तो कहा जा सकता है।

महाराष्ट्र में भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर होने वाले घमासान की आशंका से डरी हुई भी है। ऊपर से मराठा आरक्षण के मुद्दे ने अलग भूचाल ला दिया है। मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल के आगे शिंदे सरकार को नतमस्तक होना पड़ा।

कुनबी मराठा समुदाय के लोगों को ओबीसी के प्रमाण पत्र देने की आंदोलनकारियों की मांग शिंदे ने स्वीकार की तो सूबे के तमाम ओबीसी नेताओं की बेचैनी बढ़ गई। ज्यादा मुखर सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के मंत्री छगन भुजबल दिखे। उन्होंने चेतावनी दी कि वे मराठों को ओबीसी आरक्षण में हिस्सा बांटने की नीति को सहन नहीं करेंगे।

सरकार चाहे तो उन्हें अलग आरक्षण दे सकती है। पर ऐसी कवायद तो उद्धव सरकार ने पहले ही कर दी थी। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर रद्द कर दिया कि कुल आरक्षण कोटा 50 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकता। पिछले हफ्ते भुजबल ने अहमदनगर में रैली कर खुलासा किया कि विरोधी ही नहीं उनकी अपनी पार्टी के मराठा नेता भी उन्हें बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं।

पर वे भूल रहे हैं कि मैंने तो मंत्री पद से इस्तीफा पिछले साल 16 नवंबर को ही दे दिया था। शिंदे और फडनवीस के कहने पर बस खुलासा नहीं किया था। सूबे की सियासत में चल रहीं खींचतान के बीच संकेत मिल रहे हैं कि छगन भुजबल अजित पवार का साथ छोड़कर जल्द ही अपनी अलग पार्टी बनाने का एलान कर सकते हैं।

संसद में संन्यास

तेलगुदेशम पार्टी के सांसद जयदेव गल्ला ने राजनीति से अचानक संन्यास लेने का एलान करके हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि राजनीति में कारोबार जगत से जुड़े लोगों की व्यथा कितनी गहरी होती है। गल्ला आंध्रप्रदेश की गुंटूर सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीते थे। उन्होंने सियासत से संन्यास लेने का एलान भी लोकसभा में ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए किया। गल्ला देश के चुनिंदा धनी सांसदों में हैं।

वे एमरान ब्रांड की बैटरी व अन्य उत्पादों वाले अमर राजा समूह के मुखिया हैं। आंध्र में जगन रेड्डी की सरकार ने उन्हें तंग करने में कसर नहीं छोड़ी। हाई कोर्ट ने राहत न दी होती तो वाईएसआर कांगे्रस की सरकार तो उनका कारखाना ही बंद कर देती। बहरहाल गल्ला ने कहा कि राजनीति और कारोबार दोनों एक साथ ईमानदारी से नहीं चल सकते।

उन्हें राजनीति में सच बोलने की सजा कारोबार में परेशानियों के रूप में भुगतनी पड़ी। सरकारी एजंसियों के राजनीतिक हित के लिए दुरुपयोग की शिकायत करना भी वे लोकसभा में नहीं भूले। फरमाया कि अब अपना सारा समय परिवार, कारोबार और दयानतदारी के लिए लगाएंगे।

संकलन : मृणाल वल्लरी

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