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राजपाट: बसपा का जौनपुर और बस्ती में उम्मीदवार बदलना समझ से परे

बसपा सुप्रीमो मायावती ने जौनपुर से आखिरी दिन श्याम सिंह यादव और बस्ती से लवकुश पटेल को चुनाव मैदान में उतार दिया। विरोधी इसे भाजपा के दबाव में लिया गया फैसला बता रहे हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 11, 2024 12:19 IST
राजपाट  बसपा का जौनपुर और बस्ती में उम्मीदवार बदलना समझ से परे
मायावती। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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बसपा सुप्रीमो मायावती के दो फैसले सबसे ज्यादा चर्चित रहे। पहला, उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को अचानक बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक के पद से भी हटा दिया और अपने राजनीतिक वारिस से भी। दूसरा दो लोकसभा सीटों के उम्मीदवार बदलने का फैसला। जौनपुर में मायावती ने बाहुबली पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला सिंह को उम्मीदवार बनाया था।

सजायाफ्ता होने के कारण धनंजय तो चुनाव लड़ नहीं सकते। धनंजय जेल में थे तो भाजपा के उम्मीदवार कृपाशंकर सिंह श्रीकला की उम्मीदवारी से ज्यादा चिंतित नहीं थे पर वे जमानत पर छूट गए तो कृपाशंकर को साफ दिखने लगा कि त्रिकोणीय मुकाबले में सपा के बाबूसिंह कुशवाह बाजी मार ले जाएंगे।

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इसी तरह बस्ती में पूर्व भाजपाई दया शंकर मिश्र की बसपा टिकट से उम्मीदवारी को लेकर भाजपा उम्मीदवार हरीश द्विवेदी को हार का डर सताने लगा। यहां सपा ने रामप्रसाद चौधरी को उतारा है। मायावती ने जौनपुर से आखिरी दिन श्याम सिंह यादव और बस्ती से लवकुश पटेल को उतार दिया। विरोधियों ने इसे भाजपा के दबाव में लिया फैसला बताया।

आकाश आनंद की स्थिति पर बदलाव को लेकर कोई नुक्ताचीनी न करता अगर मायावती ने यह न कहा होता कि आकाश आनंद अभी परिपक्व नहीं हैं। अब उनसे कौन पूछेगा कि अगर आनंद परिपक्व नहीं थे तो एक साथ इतनी अहम और दोहरी जिम्मेदारी दी ही क्यों थी?

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पांचों यादव उम्मीदवार सैफई परिवार से

बिहार में कभी एमवाइ की पार्टी कहलाने वाली सपा इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा के निशाने पर है। अमित शाह कह रहे कि अखिलेश ने पांचों यादव उम्मीदवार सैफई परिवार से उतारे हैं। परिवार से बाहर के किसी यादव को उम्मीदवार नहीं बनाया। डिंपल यादव अखिलेश की पत्नी हैं, जो मैनपुरी से लड़ रही हैं। कन्नौज से खुद अखिलेश मैदान में हैं।

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बदायूं में चाचा शिवपाल यादव का बेटा आदित्य उम्मीदवार है। आजमगढ़ में धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद में चाचा रामगोपाल के बेटे अक्षय हैं। हालांकि इस बार अखिलेश का अपना एजंडा है। वे इस बार पीडीए यानि पिछडे़, दलित और अल्पसंख्यक के फार्मूले को आजमा रहे हैं। पिछड़ों को ज्यादा टिकट देने से एक तो यादवी पार्टी होने के स्थाई आरोप से बच गए हैं, दूसरे भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाना आसान मान रहे हैं। यादव और मुसलमान तो साथ हैं ही।

अब कांग्रेस में वापसी पर सवाल

अरविंदर सिंह लवली के भारतीय जनता पार्टी में जाने के बाद अब गठबंधन के सहयोगियों को ही कांग्रेस में लाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता योगानंद शास्त्री ने एक बार फिर से कांग्रेस में घर वापसी की है। योगानंद शास्त्री पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शीला दीक्षित के कार्यकाल में मंत्री थे और कांग्रेस से नाराज होकर एनसीपी में चले गए थे।

कांग्रेस पार्टी छोड़कर आने वाले नेता इनकी वापसी पर सवाल खड़े कर रहे हैं कि जब एनसीपी और कांग्रेस पार्टी के बीच गठबंधन है तो अपने ही सहयोगी दल के नेताओं को पार्टी में लाकर कांग्रेस पार्टी क्या साबित कर रही है? ऐसा करके कांग्रेस के नेता अपने ही गठबंधन को कमजोर कर रहे हैं।

हिसार की राजनीति में परिवारवाद हावी

हरियाणा की हिसार लोकसभा सीट पर तीन उम्मीदवार तो केवल देवीलाल परिवार से हैं। दुष्यंत चौटाला ने जजपा से अपनी मां नैना चौटाला को उतारा है तो ओमप्रकाश चौटाला की इनेलोद ने देवीलाल के दिवंगत पुत्र प्रताप सिंह चौटाला की पुत्रवधू सुनैना को उम्मीदवार बनाया है, जो नैना की देवरानी ठहरी। भाजपा ने नैना और सुनैना के चचिया ससुर रंजीत सिंह चौटाला को उम्मीदवार बनाया है।

हिसार में भाजपा केवल 2019 में जीत पाई थी। तब वीरेंद्र सिंह के आइएएस पुत्र बृजेंद्र सिंह ने नौकरी से त्यागपत्र देकर लोकसभा चुनाव लड़ा था। बेटे के लिए वीरेंद्र सिंह ने अपना मंत्री पद और राज्यसभा की सीट छोड़ दी थी। फिर भी बृजेंद्र सिंह को मोदी सरकार में मंत्री पद नहीं मिल पाया। वीरेंद्र सिंह अपने बेटे को लेकर अब कांग्रेस में आ चुके हैं।

बृजेंद्र सिंह को उम्मीद थी कि कांग्रेस उन्हें टिकट देगी। लेकिन जयप्रकाश को टिकट मिला। हिसार से दो बार दुष्यंत चौटाला भी सांसद रह चुके हैं। रंजीत सिंह सिरसा जिले की रानियां सीट से निर्दली उम्मीदवार की हैसियत से पिछला विधानसभा चुनाव जीते थे। भाजपा ने इस बार हिसार सीट पर दांव उन्हीं पर लगाया है। चूंकि निर्दलीय किसी दल का उम्मीदवार नहीं बन सकता लिहाजा रंजीत सिंह को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा है। हालांकि उन्हें छह महीने की शेष विधायकी छोड़ने का घाटा कुछ नहीं होगा। निर्दलीय को नियम विधायक पद छोड़ने को कहते हैं, मंत्री पद छोड़ने को नहीं।

भाजपा ओडिशा में बीजू जनता दल के विधायकों को तोड़ने की साजिश रच रही: वीके पांडियन

ओडिशा में भाजपा विरोधाभास की शिकार हो गई है। लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने विरोधियों को लगातार ललकार रही है कि प्रधानमंत्री पद का अपना चेहरा क्यों नहीं बताते। ओडिशा में जब मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के सलाहकार वीके पांडियन भाजपा से यही सवाल करते हैं तो भाजपाई निरुत्तर नजर आते हैं। भाजपाई नवीन पटनायक से ज्यादा हमले पांडियन पर कर रहे हैं।

पांडियन ने हाल ही में यह आरोप भी लगाया था कि भाजपा बीजू जद के विधायकों को तोड़ने की साजिश रच रही है। वह सत्ता हासिल करने के लिए हताश है। विधानसभा में बहुमत नहीं मिलने पर भी मध्यप्रदेश जैसा प्रयोग दोहराने की कोशिश कर सकती है। ओडिशा में नवीन पटनायक की लोकप्रियता में कोई गिरावट नहीं आना भाजपा को सहन नहीं हो रहा।

भाजपा नेता कभी उड़िया अस्मिता की दुहाई देकर पांडियन पर वार करते हैं तो कभी लोगों से कहते हैं कि क्या वे फिर नवीन पटनायक को मुख्यमंत्री बनाकर सरकार का रिमोट एक ‘क्लर्क’ को सौंपना चाहते हैं। पांडियन भी भाजपा नेताओं पर यह कहकर पलटवार करने से नहीं चूकते कि सबसे ज्यादा आइएएस अफसर तो नौकरी छोड़कर भाजपा में ही गए हैं।

संकलन : मृणाल वल्लरी

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