scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

महिला आरक्षण पर चाहे मोदी वाहवाही लूट लें, OBC कोटे पर राहुल गांधी की चाल कांग्रेस के अच्छे दिन ला सकती है!

लंबे समय तक कांग्रेस की जैसी विचारधारा रही है, किसी एक जाति तक उसे सीमित रखना मुश्किल था। कांग्रेस पार्टी का पिछले कई सालों का इतिहास इस ट्रेंड को बखूबी समझा सकता है।
Written by: Sudhanshu Maheshwari
Updated: September 23, 2023 00:32 IST
महिला आरक्षण पर चाहे मोदी वाहवाही लूट लें  obc कोटे पर राहुल गांधी की चाल कांग्रेस के अच्छे दिन ला सकती है
राहुल की रणनीति, मोदी से मुकाबला
Advertisement

देश में महिला आरक्षण बिल दोनों लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो गया है। मोदी सरकार के कार्यकाल में ये ऐतिहासिक कदम उठा लिया गया है, बड़ी बात ये है कि जो पार्टियां इसका पहले विरोध भी करती थीं, इस बार उनका समर्थन भी मिला है। इसी वजह से राज्यसभा में एक भी वोट खिलाफ में नहीं पड़ा और सर्वसहमति के साथ बिल को पास करवाया गया। इस बिल के पारित होते ही श्रेय लेने की एक अलग ही सियासत तेज हो चुकी है, बीजेपी मुख्यालय में मना जश्न और पीएम मोदी का किया गया गुणगान ये बताने के लिए काफी है कि इस नेरेटिव के सहारे आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी किस रणनीति पर आगे बढ़ने जा रही है।

महिला आरक्षण बिल और ओबीसी विवाद

बीजेपी को तो अपना नेरेटिव मिल गया है, लेकिन इस महिला आरक्षण बिल के सहारे एक और बड़ी रणनीति को धार देने का काम किया गया है। कहने को कांग्रेस से लेकर आरजेडी तक जैसे दलों ने महिला आरक्षण बिल का समर्थन किया, लेकिन सभी ने दो प्रमुख मागें भी रखीं- पहली महिला आरक्षण में भी ओबीसी के लिए अलग से कोटा। दूसरी- देश में जल्द से जल्द हो जातिगत जनगणना। यहां भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार को ओबीसी विरोधी बताने की पूरी कोशिश की। उनकी तरफ से कहा गया कि वर्तमान सरकार में 90 केंद्रीय सचिव में से तीन ओबीसी हैं। उनका तर्क रहा कि ये पांच फीसदी लोग ही इस समय पूरे बजट को कंट्रोल कर रहे हैं।

Advertisement

अब महिला आरक्षण बिल को लेकर ये समझना जरूरी है कि, केंद्र सरकार द्वारा जो बिल लाया गया है, उसके तहत ओबीसी महिलाओं को भी आरक्षण देने की मांग जरूर हुई है, लेकिन अलग से कोटे की व्यवस्था नहीं की गई है। वर्तमान बिल के मुताबिक देश में एसी-एसटी के लिए जो 131 सीटें आरक्षित रहती हैं, वहां भी 43 सीटें महिलाओं के लिए रहने वाली हैं। लेकिन विपक्षी दल इस व्यवस्था से खुश नहीं हैं, वे ओबीसी समाज के साथ इसे अन्याय मान रहे हैं। उनके मुताबिक जब तक ओबीसी महिलाओं को अलग से आरक्षण नहीं दिया जाएगा, उनका सही प्रतिनिधित्व नहीं किया जा सकता। अब आरजेडी ये बात बोलती तो किसी को हैरान नहीं रहती, बसपा कहती तो भी लाजिमी लगता, लेकिन कांग्रेस के लिए इस ओबीसी पिच पर उतरना एक नया एक्सपेरिमेंट है।

कांग्रेस का जाति वाला इतिहास, ओबीसी पिच पर चलना मुश्किल

कुछ समय पहले ही कर्नाटक चुनाव में एक रैली में राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना की मांग उठाई थी, उस मामले में उनके विचार इंडिया गठबंधन के दूसरे तमाम दलों से मेल खाए थे। लेकिन कांग्रेस के लिए ये सहज पिच नहीं है, वो कहने को अब ओबीसी समाज को साधने के लिए जातिगत जनगणना की मांग कर रही है, लेकिन लंबे समय तक उसकी जैसी विचारधारा रही है, किसी एक जाति तक उसे सीमित रखना मुश्किल था। कांग्रेस पार्टी का पिछले कई सालों का इतिहास इस ट्रेंड को बखूबी समझा सकता है। असल में 90 के दौर में जब मंडल कमिशन आया था, ओबीसी राजनीति की अलग लहर देश में चल पड़ी। कांग्रेस को इसका सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी पट्टी वाले राज्यों में उठाना पड़ा। इन राज्यों में तो पार्टी हारी ही, इसके बाद उसकी ओबीसी रणनीति भी बिखराव का शिकार हुई।

Advertisement

इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कांग्रेस कभी ब्राह्मिणों को खुश करने में लगी रही तो कभी अचानक से मुस्लिमों को जीतने के प्रयास में दिखी। इसी बीच कभी कबार उसने ओबीसी वर्ग को भी साधने की कोशिश की, लेकिन एक रणनीति कभी दिखाई नहीं पड़ी।

Advertisement

पुरानी कांग्रेस और आज की कांग्रेस में बड़ा फर्क

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस हमेशा से ही ऐसी रही हो, लेकिन वक्त के साथ उसकी जातिगत रणनीति पीछे छूट गई और सारा फोकस 'सेकुलर' विचारधारा पर आ गया। वहां भी वो खुद को पूरी तरह सेकुलर नहीं रख पाई क्योंकि समय-समय पर सॉफ्ट हिंदुत्व का दांव उसकी तरफ से चला गया। पूर्व पीएम राजीव गांधी ने अगर राम मंदिर पर दांव चला था तो राहुल गांधी को एक समय कांग्रेस ने जनेऊधारी घोषित कर दिया था। वैसे कांग्रेस की विचारधारा में कन्फ्यूजन 1990 के बाद ज्यादा दिखा, उससे पहले तक हर राज्य में जातिगत रूप से पार्टी की मजबूत रणनीति देखने को मिल जाती थी। कौन भूल सकता है गुजरात में माधव सिंह सोलंकी की KHAM राजनीति जहां पर श्रत्रीय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम को साथ ला तीन बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई गई। कर्नाटक का वो AHINDA फॉर्मूला भी तो कांग्रेस का ही रहा जिसके सहारे राज्य में अल्पसंख्यक और पिछड़े समाज को साधा गया।

लेकिन अब कई सालों बाद फिर कांग्रेस एक स्थिर दिशा में जाती दिख रही है। जिस तरह से ओबीसी कोटे को लेकर वो मुखर हुई है, ये साफ बताता है कि दूसरी पार्टियों की तरह अब कांग्रेस भी इस वर्ग को लेकर गंभीर हो गई है। बड़ी बात ये भी है कि भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा चरण शुरू होने जा रहा है, उसका केंद्र हिंदी पट्टी राज्य रहने वाले हैं जहां पर ये ओबीसी राजनीति चरम पर रहती है। इसके अलावा हाल ही में जो CWC की बैठक हुई थी, उसमें भी आरक्षण सीमा को 50 फीसदी से ज्यादा करने पर विचार किया गाय है। संदेश साफ है कि कांग्रेस खुलकर ओबीसी पॉलिटिक्स करना चाहती है, वो खुद को सेकुलर या फिर सिर्फ एक विचारधारा तक अब रोक कर नहीं रखना चाहती।

देश की ओबीसी पॉलिटिक्स और कितना वोट?

अब इस बदली हुई रणनीति के अपने कारण भी नजर आ रहे हैं। देश में इस समय 45 फीसदी के करीब ओबीसी वोटर है, वहां भी हिंदी पट्टी राज्य उत्तर प्रदेश में 54 प्रतिशत के करीब इस समाज की उपस्थिति है। बिहार में ये आंकड़ा और ज्यादा बढ़कर 61 फीसदी पर पहुंच जाता है। इसके अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जहां पर कुछ महीनों में चुनाव होने जा रहा हैं, वहां भी ये ओबीसी वोट काफी निर्णायक भूमिका निभाता है। एक तरफ राजस्थान में इनकी संख्या 48 फीसदी के करीब है तो एमपी में ये 43 प्रतिशत है। वहीं छत्तीसगढ़ में ओबीसी समुदाय 45 प्रतिशत के करीब चल रहा है। ऐसे में भारत जोड़ो यात्रा के लिहाज से भी कांग्रेस का दांव सटीक बैठ रहा है और चुनावी मौसम में भी ये पार्टी को एक बूस्ट देने का काम कर सकता है।

बीजेपी के पास सफल ओबीसी मॉडल

अब कांग्रेस जिस दांव को चलने की तैयारी कर रही है, बीजेपी उस दिशा में कई सालों से चल रही है। इसी वजह से 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे 44 प्रतिशत ओबीसी का वोट मिला था। बड़ी बात ये है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में ये आंकड़ा सिर्फ 34 फीसदी था, यानी कि बीजेपी ने पांच सालों के अंदर में अपनी योजनाओं के दम पर 10 फीसदी का ओबीसी वोटबैंक में इजाफा कर लिया। लेकिन अब उसी फॉर्मूले पर कांग्रेस भी अमल करने जा रही है, कितना सफल होगी, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन उस राह पर चलने का काम जरूर शुरू कर दिया गया है।

Advertisement
Tags :
Advertisement
Jansatta.com पर पढ़े ताज़ा एजुकेशन समाचार (Education News), लेटेस्ट हिंदी समाचार (Hindi News), बॉलीवुड, खेल, क्रिकेट, राजनीति, धर्म और शिक्षा से जुड़ी हर ख़बर। समय पर अपडेट और हिंदी ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए जनसत्ता की हिंदी समाचार ऐप डाउनलोड करके अपने समाचार अनुभव को बेहतर बनाएं ।
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो