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भौतिक संसाधनों की होड़ में मनुष्य अवसाद, कुंठा और निराशा के गर्त में गिरता जा रहा

अवसाद की स्थिति व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि परिवार या समूह भी इसकी चपेट में हैं, जिन्हें लगता है कि मृत्यु ही इस स्थिति से बचने का एकमात्र हल है। इसलिए इस विषय पर बात करना जरूरी हो गया है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 03, 2024 09:24 IST
भौतिक संसाधनों की होड़ में मनुष्य अवसाद  कुंठा और निराशा के गर्त में गिरता जा रहा
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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ज्योति सिडाना

आज के दौर को क्रोध या अवसाद का युग कहा जाने लगा है। यह देखा गया है कि मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के सहयोग से विकास की ऊंचाइयों को भले ही छू लिया है, लेकिन खुश रहना आज भी उसे नहीं आया है। शायद यही कारण है कि ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ या खुशी के सूचकांक में विश्व के अधिकांश समाजों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

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भौतिकतावादी संसाधनों को एकत्र करने की होड़ में मनुष्य अवसाद, कुंठा और निराशा के गर्त में गिरता जा रहा है। अवसाद एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें लोग उदासी, अकेलापन या ऊर्जा की कमी अनुभव करते हैं। यह स्थिति कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों तक बनी रह सकती है। अवसाद की स्थिति में व्यक्ति निराशा, अरुचि, बिना कारण रोना, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, खुद को दोषी महसूस करना, शरीर के विभिन्न अंगों में दर्द महसूस करना, थकान, ध्यान की कमी, निर्णय लेने की क्षमता में कमी और आत्महत्या के विचार का सामना करता है। वर्तमान उपभोक्तावादी समाज में लोगों में व्यक्तिवाद की भावना में वृद्धि हुई है, जिसके कारण लोगों में अकेलेपन का अहसास गहरा हुआ है।

लंबे समय तक अकेलेपन में रहने के कारण अवसाद और व्यग्रता के लक्षण मनुष्य में उत्पन्न हो जाते हैं और कब यह अहसास कुछ लोगों में धीरे-धीरे आत्महत्या के विचार के रूप में उभार ले लेता है, यह पता भी नहीं चल पाता। कई बार परिवार या समूह में रहकर भी मनुष्य यह अनुभव करता है कि कोई उसे नहीं समझता, किसी के पास उसके लिए समय नहीं है, वह किसी से अपनी बात साझा नहीं कर पाता।

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आज के दौर में हर तरह के संबंधों में विश्वास का संकट उत्पन्न हुआ है। इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि अकेलापन मनुष्य की घटती उम्र के लिए भी उत्तरदायी है। इसलिए शायद छोटी उम्र में दिल की बीमारी, रक्तचाप और कई तरह के मानसिक रोग होना एक सामान्य बात हो गई है। हालांकि अकेलापन और एकांत में अंतर करने की जरूरत है।

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अकेलापन मन की अवस्था है, जो मनुष्य को नकारात्मक विचारों की तरफ ले जाती है। दूसरी तरफ एकांत आध्यात्मिक विकास की अवस्था है जो मनुष्य को सृजनशीलता की ओर या सकारात्मक विचारों की तरफ ले जाती है। यानी एकांत में रहना अवसाद की स्थिति का द्योतक नहीं है जबकि अकेलेपन का सामना कर रहा व्यक्ति अवसादग्रस्त हो सकता है।

अकेलेपन के अतिरिक्त भी कुछ और कारण हैं जो अवसाद की स्थिति को उत्पन्न करते हैं। तनावपूर्ण जिंदगी की घटनाएं जैसे दुख, तलाक, बीमारी, बेरोजगारी, नौकरी या पैसे की चिंता, शारीरिक या मानसिक हिंसा, किसी नजदीकी और प्रिय व्यक्ति की मृत्यु या फिर वैवाहिक संबंधों में खटास आदि कारणों से भी व्यक्ति को अवसाद की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। जापान में पिछले कुछ वर्षों में आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि देखी गई। माना जा रहा है कि कोरोना, बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक उथल-पुथल के कारण लोगों में अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

इसकी गंभीरता को देखते हुए जापान में फरवरी 2021 में ‘मिनिस्ट्री आफ लोनलीनेस’ यानी अकेलेपन को दूर करने के लिए मंत्रालय बनाया गया। इसका उद्देश्य लोगों को अवसाद से बाहर लाना, उन्हें अकेलेपन से मुक्त कराना और आत्महत्या करने से बचाना था। इसके बावजूद आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं, बल्कि वृद्धि देखी गई। इसका अर्थ है कि केवल मंत्रालय या विभाग बना देना इस समस्या का हल नहीं है।

देखा जाए तो यह एक गंभीर चिंता का विषय है जिसका उपचार या समाधान करना परिवार, समाज और देश के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि जो व्यक्ति कुंठा, निराशा और अवसाद को अपने व्यक्तित्व में शामिल करते हैं, वे अपने खिलाफ ही नहीं, समाज और देश के विकास के विरुद्ध भी काम कर रहे होते हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में सालाना औसतन 1,44,000 लोग आत्महत्या करते हैं। सामूहिक आत्महत्या के मामले में भी काफी बढ़ोतरी देखी गई है। यह कहा जा सकता है कि अवसाद की स्थिति व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि परिवार या समूह भी इसकी चपेट में हैं, जिन्हें लगता है कि मृत्यु ही इस स्थिति से बचने का एकमात्र हल है। इसलिए एक व्यापक पैमाने पर इस विषय पर बात करना जरूरी हो गया है। अकादमिक बुद्धिजीवियों की इस दिशा में भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है।

मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकों के अनुसार मनुष्य के मस्तिष्क का ‘फ्रंटल लोब’ वाला हिस्सा उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए सावधान करता है और उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। लेकिन अवसाद की स्थिति में यह हिस्सा काम नहीं करता या कहे कि निष्क्रिय हो जाता है, जिसके चलते इंसान खुद को नुकसान पहुंचा देता है।

यही कारण है कि आत्महत्या करने वाले नब्बे फीसद लोग तनाव या अवसाद के शिकार होते हैं और ‘फ्रंटल लोब’ में गड़बड़ी होने पर सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाते। डब्लूएचओ की एक रपट के अनुसार, भारत अवसाद के मरीजों के मामले में अग्रणी देशों में से एक है। दरअसल, सूचना क्रांति के बाद से भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति, व्यक्तिवाद और दिखावे के उपभोग की प्रवृत्तियों में वृद्धि हुई है और दूसरी तरफ कोरोना महामारी के कारण समाज में उत्पन्न अव्यवस्थाओं एवं असंतुलन की स्थिति ने अवसाद और निराशा को अधिकांश लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया है।

ऐसे में समाज में चारों तरफ नकारात्मक ऊर्जा व्याप्त दिखाई देती है। जब युवाओं को अपना भविष्य असुरक्षित अनुभव होने लगे, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र परीक्षा कक्ष से पहले ही बाहर आ जाएं और लंबे समय से प्रतीक्षित परीक्षा रद्द हो जाए, सफलता के बावजूद मनचाहे कालेज या नौकरी में प्रवेश न मिले और अगर नौकरी मिल भी जाए तो महामारी या किसी आर्थिक संकट के समय छंटनी होने का डर, बिना कसी प्रकार के अवकाश के काम के अधिक घंटे किसी को भी अवसाद की तरफ धकेलने के लिए पर्याप्त हैं।

देखा जाए तो आजकल जिंदगी के महत्त्वपूर्ण वर्ष तो पढ़ाई से रोजगार पाने की प्रक्रिया में ही निकल जाते हैं और जब थोड़ा बहुत स्थायित्व जीवन में आने लगता है तो अनेक प्राकृतिक, राजनीतिक और पारिवारिक आपदाएं चुनौती बनकर सामने आ जाती हैं। सामाजिक संबंधों और आर्थिक असुरक्षा का भाव मनुष्य को खुश नहीं रहने देता और जहां खुशी न हो वहां अवसाद उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है।

इस चुनौती का सामना करने के लिए किसी भी एक समूह या संस्था की भूमिका तय नहीं की जा सकती, बल्कि जरूरी है कि सरकार, प्रशासन, शैक्षणिक संस्थाएं, बुद्धिजीवी, साहित्यकार और परिवार सभी अपने-अपने स्तर पर इसको दूर करने के प्रयास करें। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ जनसंख्या ही किसी भी समाज और देश के विकास और प्रगति में सहभागिता कर सकती है।

आज के दौर में जब संवादहीनता की स्थिति और भी बढ़ गई है, यह समस्या और भी गंभीर रूप लेती जा रही है। इसके लिए सभी संस्थाओं को आपस में संवाद करना बहुत जरूरी है। परस्पर संवाद से ही किसी भी बात का हल निकला जा सकता है, क्योंकि कोई भी समस्या मानव के हौसलों से बड़ी नहीं हो सकती। जीवन में धैर्य, साहस, आशा और सकारात्मकता से सब कुछ संभव है।

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