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पश्चिमी देशों के कचरे का भार ढोने को मजबूर गरीब देश

एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में एक टन घरेलू कचरे के निस्तारण में औसतन जितना खर्च आता है उससे आधे खर्च में, वही कचरा, खाली कंटेनरों के जरिए सुदूर गरीब देशों में ठिकाने लगा दिया जाता है। एक जर्मन आनलाइन पोर्टल के मुताबिक 2020 में एक टन घरेलू कूड़े के निस्तारण का खर्च 85 डालर आता था, जो मात्र 35 डालर के भाड़े में गरीब देशों तक पहुंचा दिया जाता था।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 04, 2024 09:53 IST
पश्चिमी देशों के कचरे का भार ढोने को मजबूर गरीब देश
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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कुशाग्र राजेंद्र

मनीला बंदरगाह वर्ष 2013 से 2019 के मध्य तक कनाडा और फिलिपींस के बीच एक अनोखे विवाद के केंद्र में रहा। कनाडा ने पुनर्चक्रित प्लास्टिक अपशिष्ट के नाम पर घरेलू कचरे से भरे 103 बड़े ‘कंटेनर’ फिलिपींस भेजे थे। फिलिपींस को जब इस घपले का एहसास हुआ तो उसने कहा कि कनाडा पुनर्चक्रित प्लास्टिक अपशिष्ट के बदले घरेलू कूड़ा भेज कर अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी कर रहा है, वह अपना घरेलू कूड़ा वापस ले।

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इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि फिलिपींस ने कनाडा के खिलाफ युद्ध तक की धमकी दे डाली थी। आखिरकार छह साल बाद कनाडा को अपने 103 में से 69 कंटेनर वापस लेने पड़े। दोनों देशों के बीच इस खींचतान से पश्चिमी देशों का दक्षिण के देशों के प्रति गैर-बराबरी की एक स्याह हकीकत का पता चला कि कैसे विकसित देश अपने कूड़े का निस्तारण खुद न कर अंतरराष्ट्रीय समझौतों को धता बताते हुए उसे गरीब और विकासशील देशों को निर्यात करते आए हैं।

गौरतलब है कि कनाडा और फिलिपींस दोनों ही खतरनाक अपशिष्ट पदार्थों के प्रसार और निस्तारण नियंत्रण के लिए हुए ‘बेसल समझौते’ का हिस्सा हैं। कचरे के तथाकथित वैश्विक व्यापार का एक सिरा चीन की अचानक आर्थिक प्रगति से जुड़ता है, जब चीन नब्बे के दशक में उत्पादक देश बन कर उभर रहा था। चीन से हर किस्म का उत्पाद ‘शिपिंग कंटेनरों’ में भर कर अमेरिका और यूरोप भेजा जा रहा था।

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वापसी में खाली कंटेनरों में पश्चिमी देशों ने अपने घरेलू और अन्य कूड़े-कचरे को भर कर चीन भेजना शुरू किया। खाली लौटते कंटेनरों को भर कर वापस भेजना आर्थिक रूप से लाभदायी भी था। पश्चिम से आने वाले मुफ्त कूड़े को शुरू-शुरू में चीन ने संसाधन के रूप में देखा और जितना पुनर्चक्रित कर सकता था, उससे नए उत्पाद बना लेता था।

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वहीं अमीर देशों के लिए स्थानीय कूड़े-कचरे के निस्तारण का यह एक सस्ता विकल्प मिल गया, इस तरह उनको अपने कूड़े से छुटकारा मिल जाता था। मगर इसका नतीजा यह हुआ कि अमीर देशों में कचरा फैलाने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी से बढ़ी। पश्चिमी देशों में नब्बे का दशक आते-आते प्लास्टिक की खपत बेतहाशा बढ़ गई, जिसे दक्षिण के गरीब विकासशील देशों की तरफ भेजा जाने लगा।

एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में एक टन घरेलू कचरे के निस्तारण में औसतन जितना खर्च आता है उससे आधे खर्च में, वही कचरा, खाली कंटेनरों के जरिए सुदूर गरीब देशों में ठिकाने लगा दिया जाता है। एक जर्मन आनलाइन पोर्टल के मुताबिक 2020 में एक टन घरेलू कूड़े के निस्तारण का खर्च 85 डालर आता था, जो मात्र 35 डालर के भाड़े में गरीब देशों तक पहुंचा दिया जाता था। चीन के साथ-साथ दक्षिण के अधिकांश देश, जिनमें अफ्रीका और एशिया के देश मुख्य रूप से शामिल हैं, सस्ते मजदूर और कम कठोर पर्यावरणीय नियम-कानून के कारण पश्चिम के कूड़े के व्यापार का हिस्सा बनने लगे। भारत और बांग्लादेश पुराने जहाजों के निस्तारण के लिए पसंदीदा जगह बने।

वर्ष 2018 तक चीन विश्व के कचरा निस्तारण या व्यापार का मुख्य केंद्र था, जहां अमेरिका और यूरोप से आने वाले कूड़े के निस्तारण के लिए कुछ हद तक आधारभूत संरचना विकसित हो चुकी थी। फिर भी इतनी भारी मात्रा में कचरे का निस्तारण, जिसमें अधिकांश एक बार इस्तेमाल किया जाने वाला प्लास्टिक होता है, जो पुनर्चक्रण के लायक भी नहीं होता, उससे पर्यावरण और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्परिणाम को ध्यान में रखते हुए बाद में चीन ने चौबीस प्रकार के कचरे के आयात पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी। इसका परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी देशों में कचरे के निस्तारण के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया और उनके कचरे से लदे जहाज नए ठिकाने ढूंढ़ने लगे।

संयोग से कचरे के नए ठिकाने चीन के पड़ोस में ही मिलने लगे। धीरे-धीरे दक्षिण पश्चिम एशिया, पश्चिम के कचरे का नया ढलाव बनने लगा, जिसमें मलेशिया, इंडोनेशिया, लाओस, म्यांमा, विएतनाम, फिलिपींस आदि देश शामिल हैं। हालांकि इस प्रवृति के शिकार यूरोप के गरीब देश, पूर्वी यूरोप के देश भी हैं। समृद्ध यूरोप का कूड़ा पूर्वी यूरोप में भी डाला जाने लगा। ‘साइंटिफिक अमेरिका’ के मुताबिक अमेरिका का एक आम आदमी भारत के आम आदमी के मुकाबले पैंतीस गुना ज्यादा प्रकृति को नुकसान पहुंचाता और चीन के आम आदमी के मुकाबले 53 गुना ज्यादा संसाधनों का दोहन करता है।

जितना ज्यादा संसाधनों का दोहन होता है, उसी हिसाब से कचरा भी पैदा होता है, पर उसके निस्तारण का बोझ गैरकानूनी तरीके से लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के देशों पर डाल देने की परंपरा विकसित हुई है, जहां कचरे के निस्तारण के लिए न्यूनतम आधारभूत ढांचे तक का नितांत आभाव है। ऐसा नहीं कि कचरे के व्यापार के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून नहीं है।

बेसल समझौते के तहत केवल ऐसे ही कचरे को एक देश से दूसरे देश में ले जाने की अनुमति है, जो पुनर्चक्रित होने लायक, दुबारा इस्तेमाल में आने वाला, जहरीला और पर्यावरण के लिए हानिकारक न हो। इसके बावजूद यह गोरखधंधा जारी है। अमेरिका एकमात्र देश है, जो बेसल समझौते को नहीं मानता।

‘कचरा उपनिवेशवाद’ शब्दावली का उपयोग पहली बार 1989 के ‘बेसल समझौते’ में अफ्रीकी देशों द्वारा अपनाए जा रहे इसी विकृत और गैर-बराबरी वाले रवैए के लिए किया गया। अमीर देशों का कचरा दक्षिण के देशों में थोड़ा-बहुत छांट कर अक्सर जला दिया, नदियों में बहा या कचरापट्टी में डाल दिया जाता है।

इससे जल, भूमि और वायु के गंभीर प्रदूषण के बाद स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। एक प्रकार से पश्चिम ने अपने कार्बन उत्सर्जन को गरीब देशों के जिम्मे डाल दिया है। अमीर देश अपने असीमित संसाधनों के दोहन का लाभ तो खुद लेते हैं, पर उससे उपजे लगभग हर दुष्परिणाम को बड़ी चालाकी से गरीब देशों के हिस्से डाल देते हैं।

यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है। औद्योगिक क्रांति के बाद उपजी पश्चिम की औपनिवेशिक मानसिकता इसके मूल में है। यह प्रवृत्ति जलवायु और पर्यावरण के संकट के वक्त एक नए रूप में सामने आई है, जो वैश्विक स्तर के लगभग हर जलवायु या पर्यावरण से जुड़े समझौते में दिख भी रही है। हालांकि दक्षिण के देश अब इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध अंतरराष्ट्रीय समझौते में कर रहे हैं और लामबंद भी हो रहे हैं, ताकि अमीर देशों की गैर-बराबरी और नैतिक रूप से विकृत व्यस्था को उजागर किया जा सके। इस कड़ी में भारत ने अपनी अध्यक्षता में ब्रिक्स के अन्य देशों के साथ मिल कर दक्षिण के देशों का पक्ष प्रभावी ढंग से रखा है, जिसमें पिछले वर्ष जी-20 समूह में अफ्रीकी संघ को सदस्यता दिलाना एक महत्त्वपूर्ण प्रगति है।

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