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पी. चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर: लोकतंत्र को चाहिए एक समारोह

नकदी के चलन ने चुनावों को बहुत महंगा बना दिया है। अगर उम्मीदवारों या उनके राजनीतिक दलों को खुले तौर पर अधिक धन खर्च करने की अनुमति दे दी जाए और चुनाव प्रचार को जमीनी स्तर पर लाया जाए, तो समय के साथ वोट के बदले नोट की प्रथा समाप्त हो सकती है।
Written by: पी. चिदंबरम | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 10, 2024 08:16 IST
पी  चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर  लोकतंत्र को चाहिए एक समारोह
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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उम्मीद है कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआइ) इस सप्ताह लोकसभा चुनाव कार्यक्रमों की अधिसूचना जारी कर देगा। इसके पहले के चुनाव में उसके कार्यक्रमों की इसलिए काफी आलोचना हुई थी कि उसकी घोषणा प्रधानमंत्री की देश भर में होने वाली यात्राओं को ध्यान में रखते हुए की गई थी। इस बार का कार्यक्रम तर्कसंगत और संक्षिप्त होगा या नहीं, यह जल्दी ही पता चल जाएगा।

चुनाव के संचालन में कई खामियां देखी गई हैं। सबसे पहली बात तो मतदान के चरणों की है। देश में तीन से अधिक चरणों में चुनाव नहीं होने चाहिए। राज्यों में एक ही दिन मतदान होने चाहिए, बड़े राज्यों में यह दो दिन में हो सकता है। 2019 में, मतदान की तारीखें 11 अप्रैल से 19 मई तक 39 दिनों तक खिंच गई थीं।

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बिहार (40 सीटें), उत्तर प्रदेश (80) और पश्चिम बंगाल (42) में सात चरणों में मतदान हुआ था। तमिलनाडु और पुदुचेरी (39+1) में निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बिहार और पश्चिम बंगाल के बराबर ही है, फिर भी वहां मतदान एक ही दिन कराया गया। मध्यप्रदेश में, जहां केवल 29 विधानसभा क्षेत्र हैं, चार चरण में मतदान क्यों होना चाहिए? उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या तमिलनाडु से दोगुनी है, फिर वहां सात चरण में मतदान क्यों होना चाहिए?

कोई वाजिब वजह नहीं

इतने चरण में चुनाव कराने के पीछे ‘सुरक्षा’ संबंधी कारण बताए जाते हैं। कहा जाता है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को किसी राज्य के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए समय की आवश्यकता होती है। यह गले उतरने वाली बात नहीं है। एक बार चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद, राज्य के सभी निर्वाचन क्षेत्रों में पुलिस और सीएपीएफ तैनात कर दी जाती है।

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जिस दिन पहले चरण के निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हो रहा होता है, उसी दिन उसी राज्य के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव प्रचार चल रहा होता है, और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और सीएपीएफ तैनात किए जाते हैं। ऐसा कतई नहीं होता कि मतदान से पहले और बाद में किसी निर्वाचन क्षेत्र में पुलिस नहीं होती। इसके अलावा, भाजपा के मुताबिक बिहार और उत्तर प्रदेश में ‘डबल इंजन’ की सरकार है और कानून-व्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ है। तो फिर, इन राज्यों में हिंसा की आशंका क्यों होनी चाहिए?

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इससे शक यह पैदा होता है कि कई चरण में मतदान कराने के पीछे असल मकसद होता है, राज्य के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं की आवाजाही को सुविधाजनक बनाना। इसके कई नुकसान भी हैं। सबसे पहला कि अगर मतदान की तारीखें अलग-अलग हैं, तो ‘मौनकाल’ भी अलग-अलग होगा।

मसलन, जिस दिन निर्वाचन क्षेत्र ‘क’ में तथाकथित ‘मौनकाल’ होगा, उस दिन नेता पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र ‘ख’ में प्रचार कर सकते हैं और उनका भाषण टीवी, रेडियो, अखबारों और सोशल मीडिया के माध्यम से निर्वाचन क्षेत्र ‘क’ तक भी पहुंचाता है। दूसरे, कई चरण में मतदान होने पर, पहले चरण में संभावित परिणामों का मतदान आकलन निश्चित रूप से दूसरे चरण और उसके बाद के चरणों में होने वाले मतदान व्यवहार को प्रभावित करेगा।

भेदभावपूर्ण नियम

दूसरा मामला, जिसे लेकर ईसीआइ को चिंतित होना चाहिए, वह है राज्यों में ईसीआइ का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्य चुनाव अधिकारियों द्वारा लागू किए जाने वाले भेदभावपूर्ण नियम। मसलन, 2019 में तमिलनाडु में सीईओ ने नगर पंचायतों और नगर पालिकाओं में पोस्टर, फ्लेक्सबोर्ड, बैनर और झंडे के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था।

उन्होंने प्रति उम्मीदवार एक दिन से अधिक ‘रोड शो’ की इजाजत नहीं दी थी। उन्होंने ऐसी जगहें सीमित कर दी थी, जहां प्रचारक मतदाताओं को संबोधित कर सकते हैं। उन्होंने प्रत्याशी के साथ तीन से अधिक वाहनों को जाने की अनुमति नहीं दी। जब कोई सार्वजनिक बैठक या रैली निर्धारित की जाती थी, तो सीईओ बैठक/रैली से एक दिन पहले, उसी दिन और उसके अगले दिन स्थानीय क्षेत्र में झंडे लगाने की अनुमति देता था।

ये सारे प्रतिबंध सख्ती से लागू किए गए थे, जबकि तमिलनाडु के लोग यह देख कर हैरान थे कि कैसे अन्य राज्यों के कस्बे और शहर पोस्टर, बैनर, झंडों आदि से पटे पड़े थे और उनमें अनेक वाहनों के साथ कई ‘रोड शो’ की अनुमति दी गई थी। ईसीआइ को यह भेदभाव समाप्त करना चाहिए और पूरे देश में समान नियम और मानदंड लागू करने चाहिए।

खुला प्रचार पर इस तरह के अनुचित प्रतिबंध एक तरह से लोकतंत्र में चुनाव की सुगंध को बाधित करने जैसा है- चुनाव लोकतंत्र का एक त्योहार है। तमिलनाडु में 2019 में प्रचार अवधि के अधिकांश हिस्से में मातम जैसा माहौल नजर आया। प्रतिबंधों के चलते चुनाव एक तरह से भूमिगत हो गया था। चुनाव प्रचार को अंधेरे में धकेल दिया गया और पार्टी कार्यकर्ता चुपचाप घर-घर जाकर वोट मांग रहे थे।

पैसा भूमिगत हो जाता है

मैंने यह सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा अंत कि लिए सुरक्षित रखा है: पैसा और चुनावों में इसकी भूमिका। कुख्यात चुनावी बांड के कारण, खेल का मैदान समतल नहीं रह गया है। भाजपा ने विशाल साजो-सामान इकट्ठा कर लिया है, जिसे चुनाव में इस्तेमाल किया जाएगा। माननीय प्रधानमंत्री की एक रैली पर कथित तौर पर कई करोड़ रुपए खर्च होते हैं।

उम्मीदवार मंच पर मौजूद रहेंगे, मगर उस रैली पर हुए खर्च का हिस्सा उम्मीदवार के खाते में नहीं दिखाया जाएगा- मुझे ऐसा लगता है, और यह बिल्कुल सही है। मगर तमिलनाडु में पिछले लोकसभा चुनाव में अगर उम्मीदवार किसी पार्टी नेता (स्टार प्रचारक) के साथ मंच पर मौजूद होता था, तो उस खर्च का एक हिस्सा उस उम्मीदवार के खाते में चढ़ाया और उसके चुनाव खर्च में जोड़ा जाता था। ईसीआइ को इस भेदभाव को दूर करना चाहिए।

वोट के बदले नोट की घिनौनी प्रथा का कारण भूमिगत होकर चुनाव अभियान चलाना है। सौभाग्य से, कई मतदाता अपनी मर्जी से मतदान करते हैं, मगर नकदी के चलन ने चुनावों को बहुत महंगा बना दिया है। अगर उम्मीदवारों या उनके राजनीतिक दलों को खुले तौर पर अधिक धन खर्च करने की अनुमति दे दी जाए और चुनाव प्रचार को जमीनी स्तर पर लाया जाए, तो समय के साथ वोट के बदले नोट की प्रथा समाप्त हो सकती है। चुनाव का प्रतिस्पर्धी, शोर-शराबे, हर्षोल्लासपूर्ण, उत्सवपूर्ण माहौल बहाल करने के लिए ईसीआइ को विभिन्न उपाय करने चाहिए। लोकतंत्र को उत्सव मनाने का हक है।

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