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औपनिवेशिक चुनौतियों के बावजूद हमारी सृजनशीलता बरकरार

2022 में अलेन आस्पेक्ट, क्लाउजर और एन्टोन जिलिंगर को भौतिक शास्त्र में जिस बात के लिए नोबल पुरस्कार मिला है वह हजार साल पूर्व शंकराचार्य के दर्शन में वर्णित है। ऐसे अनगिनत ज्ञान के मंजर उपलब्ध हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 11, 2024 11:44 IST
औपनिवेशिक चुनौतियों के बावजूद हमारी सृजनशीलता बरकरार
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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राकेश सिन्हा

वर्ष 1841 में बंबई गजट में संपादक के नाम आठ पत्र छपे, जिसने साम्राज्यवाद के सच को उजागर किया था। इसके लेखक भास्कर पांडुरंग थे। उन्होंने गहन शोध के द्वारा इन पत्रों में भारत के आर्थिक शोषण को उजागर किया था। पांडुरंग ने छद्म नाम ‘हिंदू’ का उपयोग किया था। उन पत्रों ने राष्ट्रवादी विमर्श का स्वरूप ही बदल दिया।

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1909 में लाला लालचंद ने पंजाब में पंजाबी अखबार में छद्म नाम से संपादक के नाम 21 पत्रों में साम्राज्यवाद और हिंदुओं के हितों के प्रश्नों को उठाया। हर पत्र शिक्षित लोगों को झकझोरता था। उसी वर्ष बंगाली (अंग्रेजी सामाचार पत्र) में कर्नल (सेवानिवृत्त) यूएन मुखर्जी ने 32 लेखों की शृंखला में जनसंख्या असंतुलन और हिंदू समाज की प्रवृतियों, सामाजिक-आर्थिक दृष्टि, विषमता के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर किया। बाद में लालचंद और मुखर्जी दोनों के द्वारा लिखी गई सामग्रियों को पुस्तक का स्वरूप मिला।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में भारतीय मेधा ने अद्भुत रचनात्मकता और मौलिकता का परिचय दिया। उनके मन में विद्या, बुद्धि और चिंतन को व्यवसाय बनाने की कल्पना तक नहीं थी। वे साधक थे। ऐसे साधक सभ्यता को यांत्रिक और भौतिक नहीं होने देते हैं। उनका लक्ष्य मनुष्यता को समृद्ध करना होता है।

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इस काल की एक और बात उल्लेखनीय है। विचार एक केंद्र से संचालित नहीं था। राष्ट्रीय नेताओं के अपने प्रकाशन थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक दो अखबारों- केसरी (मराठी) और मरट्ठा (अंग्रेजी में) का प्रकाशन और संपादन करते थे। महर्षि अरविंद, विपिन चंद्र पाल, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, डा बाबा साहब आंबेडकर- सभी अखबारों का प्रकाशन और संपादन करते थे। यह न तो महत्त्वाकांक्षा का परिणाम था, न ही प्रतिद्वंदिता का। तब साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति के बीच अनूठा संबंध था।

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सतहीपन और तात्कालिकता से मुक्ति की चुनौती सबके सामने है। तब संपादक के नाम पत्र भी प्रभावकारी थे और अब पुस्तकें भी भीड़ का हिस्सा मात्र बन रही हैं। ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र मन बुद्धि, चेतनायुक्त रचनाकारों की प्रजाति पूरी तरह समाप्त हो गई है। 1931 में प्रो कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य ने कोलकाता में दिए गए आशुतोष मेमोरियल व्याख्यान में इस प्रश्न को तबके संदर्भ में उठाया था। उन्होंने मानसिक दासता को राजनीतिक दासता से अधिक घातक बताया था।

वर्तमान लड़खड़ाता है तब अतीत सहारा बनता है। खासकर उस समाज के लिए जिसका अपना लंबा इतिहास और गौरवशाली विरासत हो। एक अनुमान के अनुसार भारत के पास चार करोड़ पांडुलिपियां हैं जो संभवत: यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका की कुल पांडुलिपियों की तुलना में कई गुणा अधिक है।

1881 में पेशावर से कुछ दूर बख्शाली पांडुलिपि मिली। शून्य लिखने का संकेत अंकित है। अर्थात भारत में शून्य की जानकारी आर्यभट्ट से पूर्व थी। 2022 में अलेन आस्पेक्ट, क्लाउजर और एन्टोन जिलिंगर को भौतिक शास्त्र में जिस बात के लिए नोबल पुरस्कार मिला है वह हजार साल पूर्व शंकराचार्य के दर्शन में वर्णित है। ऐसे अनगिनत ज्ञान के मंजर उपलब्ध हैं।

मुगल और औपनिवेशिक कालों की चुनौतियों के बावजूद हमारी सृजनशीलता समाप्त नहीं हो पाई। तुलसी से लेकर काशी के पंडित गंगाधर शास्त्री इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। 1903 में वायसराय लार्ड कर्जन ने शास्त्री से किसी विवाद को निबटाने के लिए मिलना चाहा तो शास्त्री ने अपनी परंपरागत वेशभूषा में ही जाने की शर्त रखी। कर्जन को झुकना पड़ा। शास्त्री की विद्वता से प्रभावित होकर उनकी शिक्षा के बारे में जानना चाहा तो उनका उत्तर था, ‘महाशय मैं आपका अनुगृहित रहूंगा, यदि भूमंडल में कोई मिल जाए और मेरे ज्ञान की परीक्षा ले ले। मुझे स्वयं उसकी थाह नहीं है।’

विचारों का पुनर्जागरण उसी समाज धर्मी चिंतन सृजन का नाम है, जिसमें नवनिर्माण की दृष्टि और रूपरेखा रहती है। अन्यथा कोल्हू के बैल की तरह लगातार चलने के बावजूद वे कहीं नहीं पहुंचा पाते। इसके लिए त्रिगुणात्मक होने की आवश्यकता है। विरासत के साथ ही वर्तमान की चुनौतियों एवं भविष्य की पीढ़ियों को सामने रखकर हमें चिंतन मनन और स्वाध्याय एवं सत्संग करने की जरूरत है।

भौतिकता की मार से विचारों की दुनिया अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। रचनाओं की मात्रात्मक स्थिति अच्छी है पर गुणात्मकता नहीं है। विपिन चंद्र पाल ‘सोल आफ इंडिया’ के रचनाकार भी हैं। उनका उदाहरण अत्यंत ही प्रेरणादायक है। उनकी मृत्यु (20 मई 1932) के बाद तब यूरोप के द्वारा संचालित द स्टेट्समैन ने 22 मई के संपादकीय में लिखा था कि अपने जीवन काल में वे अभावग्रस्त थे और हमारे स्तंभ के लेखन से मिले पारिश्रमिक के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। पर पाल राष्ट्रीय आवश्यकता को महसूस कर थे। अपने जीवन मूल्यों, विविधता की व्यापकता और विरासत की विशेषताओं को जानना समझना और स्वायत्तता के साथ रचनाधर्मिता का परिचय ही नए बुनियाद की तलाश मानी जाएगी।

वर्तमान लड़खड़ाता है तब अतीत सहारा बनता है। खासकर उस समाज के लिए जिसका अपना लंबा इतिहास और गौरवशाली विरासत हो। एक अनुमान के अनुसार भारत के पास चार करोड़ पांडुलिपियां हैं, जो संभवत: यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका की कुल पांडुलिपियों की तुलना में कई गुणा अधिक है।

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