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पी. चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर: दो ही सूचक जाति और असमानता

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी ने प्रति व्यक्ति प्रति माह 1286 रुपए (शहरी) और 1089 रुपए (ग्रामीण) की कमाई को गरीबी रेखा का पैमाना बनाया, और अनुमान लगाया है कि भारत में गरीबों की संख्या 22.8 करोड़ है। यह किसी भी दृष्टि से बहुत ही कम आकलन है।
Written by: पी. चिदंबरम | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 26, 2024 07:53 IST
पी  चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर  दो ही सूचक जाति और असमानता
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(सोशल मीडिया)।
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कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम देखते तो हैं, लेकिन उनका संज्ञान नहीं लेते। कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम पढ़ते तो हैं, लेकिन उन्हें दर्ज नहीं करते। ऐसी चीजें भी होती हैं जो हमारे भीतर घबराहट पैदा करती हैं, पर हम उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। यह भारतीय जीवन की हकीकत है, जिसमें बड़ी संख्या गरीबों, पूर्वाग्रहों और भेदभाव से लड़ते लोगों, कड़ी प्रतिस्पर्धा से गुजरते, और परस्पर विरोधी आकांक्षाओं से प्रेरित लोगों की है।

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आधी रात को कोलकाता के सेंट्रल एवेन्यू की तरफ से गाड़ियों में गुजरते लोगों में कुछ ही ऐसे होंगे, जो सड़क के किनारे सो रहे लोगों की तादाद पर ध्यान देते होंगे या पूछते होंगे कि इन लोगों के पास रात गुजारने के लिए कोई ठिकाना क्यों नहीं है? दिल्ली की सड़कों से गुजरते हुए किसी भी चौराहे पर बड़ी संख्या में भीख मांगते, फूल, तौलिए या नकली किताबें बेचते बच्चे दिख जाते हैं, उन्हें देख कर कभी यह सवाल नहीं उभरेगा कि ये बच्चे स्कूल में क्यों नहीं हैं?

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भारत के अनेक इलाके शुष्क, सूखी जमीन वाले हैं, वहां पानी का कोई नामोनिशान नहीं, जमीन पर कुछ भी नहीं उगता दिखता, फिर भी उन जगहों पर हजारों लोग रहते हैं, उन इलाकों से गुजरें तो कुछ लोगों को हैरानी हो सकती है कि उन लोगों की आजीविका का स्रोत क्या है? कांग्रेस के लोकसभा 2024 के घोषणापत्र में स्वीकार किया गया है कि, पिछले कुछ वर्षों, खासकर पिछले तीन दशक में, भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ी है।

यह विकास बढ़ते मध्यवर्ग, उपभोक्ता वस्तुओं की प्रचुरता, हर हाथ में मोबाइल फोन, अच्छी अंतरराज्यीय सड़कें और शानदार माल, सिनेमा और शराबघरों में प्रकट हुआ है, जो शहरी भारत के ‘टाउन स्क्वायर’ बन गए हैं। हालांकि, ‘चमकते भारत’ की तस्वीर, उन बदरंग सच्चाइयों को नहीं छिपा सकती, जो हमारी विफलताओं की याद दिलाती और हमारी प्रगति की दिशा दुरुस्त करने का अवसर भी देती हैं।

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अर्थव्यवस्था समाज का दर्पण है

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी ने प्रति व्यक्ति प्रति माह 1286 रुपए (शहरी) और 1089 रुपए (ग्रामीण) की कमाई को गरीबी रेखा का पैमाना बनाया, और अनुमान लगाया है कि भारत में गरीबों की संख्या 22.8 करोड़ है। यह किसी भी दृष्टि से बहुत ही कम आकलन है। विश्व असमानता प्रयोगशाला के अनुसार, निचले पचास फीसद लोगों (71 करोड़) के पास राष्ट्रीय संपत्ति का तीन फीसद हिस्सा है और वे राष्ट्रीय आय का तेरह फीसद कमाते हैं। सरकार के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीएसई) का अनुमान है कि निचले पचास फीसद लोगों की प्रति माह घरेलू खपत 3094 रुपए (ग्रामीण) और 2001 रुपए (शहरी) है।

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निचले बीस फीसद लोगों के उपभोग व्यय का अनुमान लगाने के लिए किसी बड़े गणितीय कौशल की जरूरत नहीं है। उनके पास व्यावहारिक रूप से कुछ भी नहीं है, वे बहुत कम कमाते हैं और, एक गृहस्थ के रूप में, इस धरती पर जीवित रहने के लिए मुश्किल से ही उपभोग करते हैं। वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान 125 देशों में 111वां है।

एचसीएसई के अनुसार, गरीबों में ओबीसी औसत स्तर के करीब हैं और एससी और एसटी सबसे गरीब हैं। यह कोई हैरानी की बात नहीं कि आर्थिक सोपान उस सामाजिक सोपान को प्रतिबिंबित करता है, जो हजारों वर्षों से देश में चला आ रहा है। सामाजिक सोपान जाति पर आधारित है। अत्यंत गरीब और अत्यंत उत्पीड़ित लोग न्यूनतम मजदूरी पर कड़ी मेहनत करते हैं। 15.4 करोड़ लोग मनरेगा के तहत सक्रिय, पंजीकृत श्रमिक हैं। उन्हें वर्ष में औसतन पचास दिन काम दिया जाता है।

इस बीच, दूसरे छोर पर, शीर्ष दस फीसद आबादी राष्ट्रीय आय का 57.7 फीसद अर्जित करती है। सिर्फ 9223 लोगों की हिस्सेदारी 2.1 फीसद है और सिर्फ 92,234 लोगों की हिस्सेदारी 4.3 फीसद है। 2023 में भारत में 3.22 करोड़ रुपए से 8.89 करोड़ रुपए के बीच कीमत वाली 103 लैंबोर्गिनी कारों की बिक्री हुई। अमीरों ने तब अपना आभार व्यक्त किया, जब कारपोरेट के अलावा, 362 व्यक्तियों ने 757 करोड़ रुपए के कुख्यात चुनावी बांड खरीदे और राजनीतिक दलों को ‘दान’ किया। सभी राजनीतिक दल अपने दानदाताओं के प्रति कृतज्ञ हैं।

क्या अच्छे दिन आ गए? क्या भारत या भारतीय आत्मनिर्भर हो गए हैं? 2023-24 में अकेले चीन (हां, वही देश, जिसके सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है और भारतीय सैनिकों की गश्त पर रोक लगा दी है!) के साथ भारत का व्यापार घाटा सौ अरब अमेरिकी डालर था। क्या यही अमृतकाल की सुबह है? कब तक जनता को धोखा दिया जाएगा, झूठ बोला जाएगा?

दो सूचक

जब तक राजनीतिक दल यह स्वीकार नहीं करते कि भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के दो सूचक हैं- जाति और असमानता, तब तक हम गरीबी, भेदभाव और उत्पीड़न की जड़ पर प्रहार नहीं कर सकते। कांग्रेस घोषणापत्र ने भाजपा के ‘विकास’ के फसाने के अंधेरे पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित किया और प्रमुख हितधारकों से कुछ सरल वादे किए:

एससी, एसटी और ओबीसी के लिए:

राष्ट्रव्यापी सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना कराएंगे और डेटा एकत्र करेंगे, जो सकारात्मक कार्रवाई के एजंडे को मजबूत करेगा।
एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण पर 50 फीसद की सीमा को हटाएंगे। एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की सभी लंबित रिक्तियों को एक वर्ष के भीतर भरा जाएगा।

युवाओं के लिए:

प्रशिक्षुता का अधिकार अधिनियम पारित कर, एक वर्ष की प्रशिक्षुता और प्रतिवर्ष एक लाख रुपए के वजीफे तथा नौकरी की गारंटी प्रदान करेंगे।
केंद्र सरकार में लगभग 30 लाख रिक्तियों को भरा जाएगा। बकाया शिक्षा ऋण और अवैतनिक ब्याज माफ किया जाएगा।

महिलाओं के लिए:

महालक्ष्मी योजना शुरू करेंगे और सबसे गरीब परिवारों को प्रतिवर्ष एक लाख रुपए दिए जाएंगे। मनरेगा के लिए न्यूनतम मजदूरी 400 रुपए प्रतिदिन तक बढ़ाई जाएगी।केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए 50 फीसद आरक्षण होगा।

गरीब की धुरी

जून 2024 में चुनी जाने वाली नई सरकार का मार्गदर्शक सिद्धांत ‘गरीबों और बहिष्कृतों की धुरी’ होना चाहिए। कांग्रेस के घोषणापत्र में इस दायित्व को स्वीकार किया गया; इसलिए यह पूरे देश में ‘चर्चा का विषय’ बन गया। भाजपा ने अपने फेफड़ों की अधिकांश शक्ति और धनशक्ति कांग्रेस के घोषणापत्र, बल्कि उसके काल्पनिक संस्करण की निंदा करने में खर्च की है। जैसे-जैसे चुनाव सात चरणों में पूरा होने की तरफ बढ़ रहा है, लड़ाई यथास्थिति बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित लोगों और यथास्थिति भंग करने के लिए दृढ़ संकल्पित लोगों के बीच बढ़ती गई है। चार जून तक सावधान रहें।

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