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Blog: देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन 31.1 करोड़ टन, भंडारण क्षमता केवल 14.5 करोड़ टन, लाखों टन भोजन हो रहा बर्बाद

एक अनुमान के अनुसार भारत को फसल कटाई के बाद खाद्यान्न में दस से पंद्रह फीसद के बीच वार्षिक नुकसान उठाना पड़ता है, जो ज्यादातर अपर्याप्त भंडारण सुविधाओं और अकुशल वितरण प्रणाली के कारण होता है। पढ़ें केसी त्यागी और बिशन नेहवाल की रिपोर्ट।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 28, 2024 01:52 IST
blog  देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन 31 1 करोड़ टन  भंडारण क्षमता केवल 14 5 करोड़ टन  लाखों टन भोजन हो रहा बर्बाद
बेहतर भंडारण सुविधाएं फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम कर सकती हैं
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भारत जीवंत कृषि परंपराओं का देश है, मगर यह एक विरोधाभास से जूझ रहा है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक होने के बावजूद, इसे भंडारण संकट का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, 2023 में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 31.1 करोड़ टन तक पहुंच गया था। मगर इसकी वर्तमान भंडारण क्षमता 14.5 करोड़ टन, यानी जरूरत के आधे से भी कम है। एक अनुमान के अनुसार भारत को फसल कटाई के बाद खाद्यान्न में दस से पंद्रह फीसद के बीच वार्षिक नुकसान उठाना पड़ता है, जो ज्यादातर अपर्याप्त भंडारण सुविधाओं और अकुशल वितरण प्रणाली के कारण होता है। यानी हर साल लाखों टन कीमती भोजन बर्बाद हो जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जो तत्काल और अभिनव समाधान की मांग करती है।

कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में 81.9 फीसद सीमांत किसान हैं

प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले देश में खाद्यान्न भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए ‘सहकारी क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना’ को मंजूरी दी, जिसे देश के विभिन्न राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में प्रायोगिक परियोजना के रूप में शुरू किया जा रहा है। भारत की बड़े पैमाने पर अनाज भंडारण योजना, कुल मिलाकर लाभकारी होते हुए भी, सभी किसानों, विशेषकर सीमांत और लघु किसानों की जरूरतों को सीधे तौर पर संबोधित नहीं कर सकती है। कृषि जनगणना (2010-11) के अनुसार, भारत में 81.9 फीसद सीमांत किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) से कम भूमि है। यह सीमित भूमि स्वामित्व कम उपज मात्रा की ओर इशारा करता है। इतनी छोटी मात्रा के लिए बड़ी भंडारण सुविधाएं किफायती नहीं हो सकती हैं।

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गरीब किसानों के पास अनाज भंडारण करने के लिए कम वित्तीय संसाधन

सीमांत किसान अक्सर तंगहाली में रहते हैं और उनके पास लंबे समय तक अपना अनाज भंडारण करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी होती है। स्वयं भंडारगृह बनाना या किराए पर लेना एक आर्थिक बोझ हो सकता है। इनमें से कई सीमांत किसान बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी फसल से होने वाली तात्कालिक आय पर निर्भर हैं। बेहतर कीमत के लिए उपज को रोके रखना उनके लिए कोई विकल्प नहीं हो सकता। कई सीमांत किसानों और अच्छी तरह से विकसित कृषि बाजारों के बीच भौगोलिक दूरी भंडारण सुविधाओं तक पहुंच की चुनौती को बढ़ा देती है।

इनमें से अधिकांश सीमांत किसान अक्सर अच्छी तरह से विकसित मंडियों या खरीद केंद्रों से दूर स्थित होते हैं। वहां तक माल पहुंचने की परिवहन लागत बेहतर कीमतों के लिए अनाज भंडारण के संभावित लाभों से अधिक हो सकती है, खासकर जब कृषि उपज की खराब होने वाली प्रकृति पर विचार किया जाता है। इस प्रकार, अनाज भंडारण के लिए ‘वन फिट फार आल’ दृष्टिकोण अनजाने में उन लोगों को बाहर कर सकता है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

वास्तव में सीमांत किसानों को सशक्त बनाने और भारत की अनाज भंडारण योजना में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अधिक सूक्ष्म और विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। केवल बड़ी भंडारण सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, सरकार को उत्पादन बिंदु के करीब छोटे, ग्रामीण स्तर की भंडारण सुविधाओं के नेटवर्क की स्थापना की संभावनाओं का पता लगाना चाहिए। ये विकेंद्रीकृत भंडारण इकाइयां न केवल परिवहन लागत को कम, बल्कि सीमांत किसानों को भंडारण विकल्पों तक आसान पहुंच प्रदान करेंगी। इसके अलावा, सहकारी समितियां और किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) भंडारण सुविधाओं के सामूहिक उपयोग को सुविधाजनक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। संसाधनों को एकत्रित करके और लागत साझा करके, व्यक्तिगत किसान बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं से लाभ उठा और भंडारण में वित्तीय बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

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ऐसी पहलों के सफल क्रियान्वयन के लिए सरकार से मौद्रिक सहायता आवश्यक है। सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से लक्षित सबसिडी या ब्याज मुक्त ऋण के रूप में सरकारी सहायता, उनकी भागीदारी को और प्रोत्साहित कर सकती है। यह वित्तीय समर्थन भंडारण-आधारित दृष्टिकोण अपनाने के शुरुआती बोझ को कम करेगा, दीर्घकालिक लाभों को बढ़ावा देगा। भंडारण का बुनियादी ढांचा मजबूत होना समीकरण का केवल आधा हिस्सा है। सीमांत किसानों के लिए बाजार पहुंच को मजबूत करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। भंडारण के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के अलावा, सीमांत किसानों के लिए बाजार पहुंच में सुधार के प्रयास भी किए जाने चाहिए। बेहतर सड़कों, परिवहन प्रणालियों और मोबाइल खरीद इकाइयों जैसे ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश करने से उत्पादकों और भंडारण सुविधाओं के बीच अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है, जिससे किसान अपनी उपज के लिए बेहतर कीमतों का लाभ उठा सकेंगे।

उत्पादन, भंडारण और बाजार पहुंच के बीच संबंधों को मजबूत करके, भारत एक अधिक समावेशी और लचीला कृषि पारिस्थितिकी तंत्र बना सकता है, जो सभी किसानों को सशक्त बनाता है, चाहे उनकी भूमि का आकार कुछ भी हो। असली ताकत भंडारण, बाजार पहुंच और किसान सशक्तीकरण पहल के बीच तालमेल बनाने में निहित है। ग्राम-स्तरीय भंडारण इकाइयों का एक नेटवर्क बनाने, सहकारी समितियों और एफपीओ का उपयोग करने और बुनियादी ढांचे के विकास और मोबाइल खरीद इकाइयों के माध्यम से बाजार पहुंच में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित करके, एक अधिक समावेशी और लचीला कृषि पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा सकता है। विकेंद्रीकृत भंडारण नेटवर्क को लागू करने के लिए सावधानीपूर्वक योजना और क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है। रसद, रखरखाव और भ्रष्टाचार जैसे संभावित मुद्दों को पहले से ही संबोधित करने की आवश्यकता है। फिर भी, मजबूत सरकारी प्रतिबद्धता, सामुदायिक भागीदारी और मजबूत निगरानी तंत्र के साथ, इन चुनौतियों पर काबू पाया जा सकता है।

बेहतर भंडारण सुविधाएं फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम कर सकती हैं, जिससे बढ़ती आबादी वाले देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। सीमांत किसानों की बढ़ी हुई आय पूरे ग्रामीण समुदाय का उत्थान कर सकती है, जिससे आजीविका में सुधार और समग्र आर्थिक प्रगति होगी। इसके अलावा, एक विकेंद्रीकृत भंडारण नेटवर्क संकट के समय में ‘बफर स्टाक’ प्रदान कर सकता है, खाद्य कीमतों को स्थिर और मूल्य वृद्धि को रोक सकता है, जो समाज के कमजोर वर्गों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। भारत की अनाज भंडारण योजना देश के कृषि परिदृश्य को बदलने की अपार क्षमता रखती है।

हालांकि यह योजना देश की खाद्य सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक सराहनीय प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इसमें सीमांत किसानों का समावेश सुनिश्चित करने के लिए लक्षित हस्तक्षेप भी होना चाहिए। विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण अपनाकर, सहकारी समितियों और एफपीओ के माध्यम से सामूहिक कार्रवाई का लाभ उठाकर और बाजार पहुंच में सुधार करके, भारत सबसे कमजोर लोगों का उत्थान करते हुए अपने कृषि क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग कर सकता है। तभी हम वास्तव में भारत के लिए अधिक न्यायसंगत और टिकाऊ कृषि भविष्य की परिकल्पना को साकार कर सकते हैं।

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