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जीवन शैली: आभासी दुनिया से दूर असली खुशी

हजारों लोगों के संपर्क के बावजूद लोग अपने अकेलेपन और इससे भी आगे तनाव और अवसाद की समस्या तक से घिरते चले जाने की शिकायत करते हैं?
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 14, 2024 14:45 IST
जीवन शैली  आभासी दुनिया से दूर असली खुशी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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इसमें कोई संदेह नहीं कि आज जिस तरह के जीवन का ढांचा बन गया है, उसमें इंटरनेट और स्मार्टफोन जैसे आधुनिक तकनीकी संसाधनों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। सवाल है कि क्या इन तकनीकी संसाधनों पर निर्भरता इस कदर बढ़ा लेनी चाहिए कि जीवन की खुशहाली ही दांव पर लग जाए! सच यह है कि तकनीकी दुनिया में गुम जीवनशैली से जीवन के तत्त्व धीरे-धीरे छिनते चले जाते हैं।

खुशी की खोज

बहुत सारे लोग अपने हाथ में पड़े एक छोटे-से यंत्र यानी स्मार्टफोन को तो अपना मान कर उसे अपना सारा समय दे देते हैं, मगर पास में बैठे अपने परिवार के किसी परेशान सदस्य को औपचारिक आश्वासन देकर अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं। इस तरह की जीवनशैली का शिकार होते हुए क्या इस बात पर गौर नहीं करना चाहिए कि एक दिन का ज्यादातर वक्त स्मार्टफोन या इंटरनेट को देते हुए हमें उससे मिलने वाला सुख या कुल लाभ किस तरह का और कितना होता है?

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सामान्य पढ़ाई-लिखाई और जरूरी कामों के लिए पर्याप्त वक्त नहीं देना इसका एक नुकसान है। इससे शिक्षा और काम की गुणवत्ता पर तो नकारात्मक असर पड़ता ही है, चूंकि दिमाग को स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका कम मिलता है, उससे व्यक्तिगत रचनात्मकता पर भी असर पड़ता है।

भीड़ में अकेले

आखिर क्या वजह है कि इंटरनेट की दुनिया में अत्यधिक व्यस्तता और हजारों लोगों के संपर्क के बावजूद लोग अपने अकेलेपन और इससे भी आगे तनाव और अवसाद की समस्या तक से घिरते चले जाने की शिकायत करते हैं? इंटरनेट के जरिए सोशल मीडिया जैसे मंचों पर व्यक्ति किसी बात में उलझते या किसी से बात करते हुए कितना वक्त गुजार देता है, उससे उसे कोई शिकायत नहीं होती।

मगर घर का कोई सदस्य अगर अपने लिए कुछ वक्त निकालने की बात कर दे या वक्त मांग ले तो लोग उसे अपनी निजता में बाधक मानने लगते हैं। चिड़चिड़ेपन का शिकार होकर अपने आसपास के लोगों से रिश्ते खराब करने लगते हैं।

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सवाल है कि अगर कोई व्यक्ति स्मार्टफोन के स्क्रीन में अपनी आंखें गड़ाए रखता है तो क्या कोई अदृश्य ताकत उसे उससे बांधे रखती है या उसे संचालित करती रहती है? इसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए और इसके कारणों
की खोज की जानी चाहिए।

जीवन प्राथमिक

बेहतर हो कि इंटरनेट की जरूरत को अनिवार्यता तक सीमित रखना चाहिए और अपने जीवनशैली को तकनीक से प्रभावित न होने दिया जाए। उम्मीदें, संवेदना, खुशहाली दरअसल वास्तविक दुनिया में ही संभव हैं। मशीनें हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान भले बना सकती हैं, लेकिन इसके साथ ही यह परिवार में खाई भी पैदा कर सकती हैं। ऐसे में खुशी की वास्तविक दुनिया को अगर अपने पास संभालना है तो तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह करना चाहिए, जिससे जीवन आसान बने तो वह रिश्तों और संवेदनाओं को मजबूत का जरिया भी बने।

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