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जम्मू-कश्मीर के बच्चे पढ़ेंगे 'लोकल हीरोज' की संघर्ष गाथाएं, जानें कौन हैं ये स्थानीय नायक

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि महान लोगों के जीवन की कहानियां किताबों में शामिल की जाएंगी।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: संजय दुबे
Updated: December 15, 2023 14:00 IST
जम्मू कश्मीर के बच्चे पढ़ेंगे  लोकल हीरोज  की संघर्ष गाथाएं  जानें कौन हैं ये स्थानीय नायक
जम्मू-कश्मीर के कई वीर नायकों ने विदेशी हमलावरों से मुकाबला किया था। (Express Photo by Shuaib Masoodi)
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अरुण शर्मा

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने मंगलवार को जम्मू विश्वविद्यालय में बोलते हुए कहा, जनरल जोरावर सिंह, ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह और मकबूल शेरवानी जैसे "स्थानीय महान लोगों के जीवन संघर्ष" को जल्द ही राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।

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ये नेता कौन हैं और जम्मू-कश्मीर के इतिहास में उनकी क्या भूमिका रही है?

जनरल जोरावर सिंह (General Zorawar Singh)

डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह की सेना के जनरल रहे जोरावर सिंह को 1830 के दशक में डोगरा साम्राज्य को लद्दाख, बाल्टिस्तान, स्कर्दू और पश्चिमी तिब्बत के कुछ हिस्सों में बढ़ाने में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है। कहलूर रियासत (वर्तमान बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश) के एक राजपूत परिवार में जन्मे जोरावर सिंह का परिवार बाद में जम्मू क्षेत्र में चला गया था। सिंह रियासी में भीमगढ़ किले (Bhimgarh fort in Reasi) के कमांडर के रूप में काम करने लगे।

जोरावर सिंह ने 1835 में चम्बा के शासक से पद्दार क्षेत्र पर विजय प्राप्त की

कहा जाता है कि गुलाब सिंह जोरावर सिंह के सैन्य कौशल से प्रभावित थे। उन्होंने उन्हें जम्मू के उत्तर में स्थित सभी किलों का कमांडिंग ऑफिसर नियुक्त किया। उन्हें किश्तवाड़ का राज्यपाल बनाया गया। इतिहासकारों के अनुसार जोरावर सिंह ने 1835 में चम्बा के शासक से पद्दार क्षेत्र पर विजय प्राप्त की, जो बाद में अपनी नीलम खदानों के लिए प्रसिद्ध हुआ।

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5000 लोगों की सेना के साथ 1836 में लद्दाख में स्थानीय बोटिस को हराया

कहा जाता है कि 5,000 लोगों की सेना के साथ, उन्होंने सुरू नदी के माध्यम से आधुनिक लद्दाख के क्षेत्र में प्रवेश किया और स्थानीय बोटिस को हराया। 1836 में लद्दाख के शासक त्सेपाल नामग्याल (Tsepal Namgyal) ने विद्रोह कर दिया। हालाकि, बताया जाता है कि ज़ोरावर सिंह ने इस विद्रोह को कुचल दिया था।

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यह भी कहा जाता है कि जोरावर सिंह लद्दाख के उत्तर-पश्चिम में बाल्टिस्तान चले गए और 1839-40 की सर्दियों में उन्होंने उस पर आक्रमण किया और अपनी सेना में लद्दाखियों की एक बड़ी टुकड़ी शामिल कर ली। उसने स्कर्दू के बाओतियों (Baotis) पर भी विजय प्राप्त की और फिर वहां सिंधु नदी के तट पर एक किला बनवाया।

लेह से जोरावर सिंह की सेना तिब्बत की ओर बढ़ी। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने गारटोक में तैनात तिब्बती सैनिकों को हरा दिया था, जिससे उनके कमांडर तकलाकोट भाग गए थे। जोरावर सिंह और उनके लोगों ने रास्ते में छोटे-छोटे किले और चौकी बनाकर मानसरोवर और कैलाश पर्वत के बीच अपनी संचार और आपूर्ति लाइन को 450 मील तक बढ़ा दिया था। हालांकि, सर्दियों के दौरान सभी पहाड़ी दर्रों के बंद हो जाने से डोगरा सेना को सारी आपूर्ति बंद हो गई।

इस बीच तिब्बतियों और उनके चीनी सहयोगियों ने फिर से संगठित होकर 12 दिसंबर, 1841 को तो-यो (To-Yo) में डोगरा सेना पर हमला कर दिया। जोरावर सिंह को तिब्बती सेना ने मार डाला।

मकबूल शेरवानी (Maqbool Sherwani)

19 वर्षीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्य शेरवानी ने अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित आदिवासियों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब वे श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। 22 अक्टूबर को, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत से पाकिस्तान समर्थित हमलावर पहले ही बारामूला में प्रवेश कर चुके थे, जो श्रीनगर से 54 किमी दूर था। विलय पत्र के अभाव में भारतीय सेनाएं कश्मीर में सेना भेजने से अभी भी कुछ दिन दूर थीं।

कई लोगों का मानना है कि अगर श्रीनगर हमलावरों के हाथ लग जाता तो पाकिस्तान के साथ 1947 के युद्ध का नतीजा कुछ और होता। हालांकि, कहा जाता है कि शेरवानी ने यह सुनिश्चित किया था कि भारतीय बलों को श्रीनगर पहुंचने और हमलावरों से लड़ने के लिए पर्याप्त समय मिले।

इस घटना की दो अलग-अलग कहानियां हैं। एक का कहना है कि शेरवानी ने हमलावरों से कहा कि वह उन्हें श्रीनगर पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता बताएगा और फिर उन्हें भटका दिया। दूसरे का कहना है कि उसने उन्हें बताया कि भारतीय सेना पहले ही श्रीनगर में उतर चुकी है. अंततः शेरवानी को हमलावरों के आगे झुकना पड़ा। अंततः जब हमलावर श्रीनगर के बाहरी इलाके में पहुंचे, तो उन्हें 7 नवंबर, 1947 को शाल्टेंग (Shalteng) में भारतीय सेना ने रोक लिया और पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। 8 नवंबर, 1947 को भारतीय सेना बारामूला पहुंची और शेरवानी का शव बरामद किया। हर साल, भारतीय सेना अपने इन्फैंट्री दिवस पर उन्हें "कश्मीर के उद्धारकर्ता" के रूप में याद करती है। इसने बारामूला शहर में उनके नाम पर एक स्मारक हॉल का भी निर्माण किया है।

ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह जामवाल (Brigadier Rajinder Singh Jamwal)

जामवाल ने पहले भारत-पाक युद्ध के दौरान कुछ समय के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य बलों के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में कार्य किया। 22 अक्टूबर, 1947 को लगभग 200 लोगों की एक छोटी सी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए, वह कई दिनों तक उरी के पास पाकिस्तान समर्थित हमलावरों की एक बड़ी सेना को आगे बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण थे। कहा जाता है कि अंतिम डोगरा महाराजा, हरि सिंह ने जामवाल को "भारतीय सेना के आने तक आखिरी आदमी और आखिरी गोली तक" राज्य की रक्षा करने का आदेश दिया था।

जामवाल को गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने अपने लोगों को योजनाबद्ध रक्षात्मक रणनीति जारी रखने का आदेश दिया और उन्हें वहीं छोड़ दिया जहां वे थे। उनके लोगों ने अगले दिन तक लड़ाई जारी रखी, लेकिन जल्द ही लगभग सभी मारे गए। हालांकि समूह लगभग चार दिनों तक आदिवासियों का विरोध करने में कामयाब रहा। भारतीय संघ के साथ विलय पत्र पर 26 अक्टूबर को हस्ताक्षर किए गए थे। जामवाल की एक दिन बाद चोटों के कारण मृत्यु हो गई।

30 दिसंबर, 1949 को उन्हें मरणोपरांत दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। वह जवाहरलाल नेहरू सरकार के तहत यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय थे। उनका पालन-पोषण उनके चाचा लेफ्टिनेंट कर्नल गोविंद सिंह ने किया था। जामवाल ने 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स कॉलेज, जो अब जीजीएम साइंस कॉलेज है, से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। जामवाल को "कश्मीर का उद्धारकर्ता (Saviour of Kashmir)" भी कहा जाता है। उनके पैतृक गृहनगर बागूना का नाम बदलकर राजिंदरपुरा कर दिया गया। बागूना में एक पार्क और जम्मू में एक नहर का नाम उनके नाम पर रखा गया है।

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