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State vs Governor: तमिलनाडु ने एक मंत्री को बहाल करने के लिए क्यों किया सुप्रीम कोर्ट का रुख? जानें पूरा मामला

मद्रास उच्च न्यायालय ने पिछले साल 19 दिसंबर को आय से अधिक संपत्ति के मामले में पोनमुडी और उनकी पत्नी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया था।
Written by: Apurva , अरुण जनार्दनन | Edited By: shruti srivastava
नई दिल्ली | Updated: March 19, 2024 10:33 IST
state vs governor  तमिलनाडु ने एक मंत्री को बहाल करने के लिए क्यों किया सुप्रीम कोर्ट का रुख  जानें पूरा मामला
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि (Source- Express)
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु की उस याचिका पर सुनवाई की जिसमें सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के वरिष्ठ नेता के पोनमुडी को मंत्री पद पर बहाल करने में हस्तक्षेप की मांग की गई थी। दिसंबर 2023 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में मद्रास हाई कोर्ट द्वारा पोनमुडी को दोषी ठहराए जाने के बाद उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

यह मामला राज्य सरकार और तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि के बीच टकराव का कारण बन गया है, जब पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने पोनमुडी की अयोग्यता का आधार हटा दिए जाने के बाद भी पोनमुडी को बहाल करने से इनकार कर दिया था।

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क्या है मामला?

मद्रास उच्च न्यायालय ने पिछले साल 19 दिसंबर को आय से अधिक संपत्ति के मामले में पोनमुडी और उनकी पत्नी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया था। HC ने पूर्व मंत्री और उनकी पत्नी को दोषी ठहराया और उन्हें 50 लाख रुपये के जुर्माने के साथ तीन साल की जेल की सजा सुनाई। 2006-2011 की डीएमके सरकार में खान और खनिज मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान संपत्ति अर्जित करने के लिए दंपति पर मुकदमा चल रहा था।

हाई कोर्ट के इस फैसले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) को लागू किया गया जिसमें कहा गया है, "किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया व्यक्ति और कम से कम दो साल के कारावास की सजा सुनाई जाने पर उसे ऐसे अपराध की तारीख से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।" दोषसिद्धि और उसकी रिहाई के बाद छह साल की अगली अवधि के लिए अयोग्य घोषित किया जाना जारी रहेगा।" पोनमुडी को अयोग्य घोषित कर दिया गया था और वह अब मंत्री नहीं रह सकते थे, उन्होंने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सजा पर लगाई थी रोक

11 मार्च को, जस्टिस अभय ओका और उज्जल भुइयां की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने का अनिवार्य रूप से मतलब यह है कि पोनमुडी की सजा को स्थगित कर दिया गया है या अंतिम निर्णय लंबित होने तक निलंबित कर दिया गया है। चूंकि विधायिका से उनकी अयोग्यता दोषसिद्धि से उत्पन्न हुई थी ऐसे में स्थगन के साथ अयोग्यता के लिए कोई आधार मौजूद नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सजा को निलंबित करना होगा क्योंकि 1951 अधिनियम की धारा 8 (3) के तहत अगर दोषसिद्धि को निलंबित नहीं किया गया तो अपरिवर्तनीय स्थिति बन जाएगी।" सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 13 मार्च को राज्यपाल को पत्र लिखकर 14 मार्च को पोनमुडी को मंत्री पद की शपथ दिलाने और उन्हें उच्च शिक्षा विभाग आवंटित करने के लिए कहा। हालांकि, रवि ने पोनमुडी पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों का हवाला देते हुए उन्हें फिर से नियुक्त करने की सिफारिश को खारिज कर दिया।

गवर्नर का मुख्यमंत्री को पत्र

सीएम को संबोधित एक पत्र में, गवर्नर रवि ने कहा कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पोनमुडी की सजा को निलंबित कर दिया था लेकिन इसने सजा के अस्तित्व को रद्द नहीं किया। रवि ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि को केवल निलंबित किया गया था, रद्द नहीं किया गया।

तमिलनाडु की नवीनतम याचिका विशेष रूप से विधेयकों को मंजूरी देने में राज्यपाल की भूमिका पर चल रहे मामले के हिस्से के रूप में दायर की गई है। नवंबर 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर कार्रवाई नहीं करने के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की थी। इसके बाद राज्यपाल रवि को 10 लंबित विधेयक राज्य सरकार को लौटाने पड़े। जिसके बाद, सरकार ने विधानसभा नियम 26 के तहत विधेयकों को फिर से लेने की प्रक्रिया को दोहराने के लिए एक विशेष विधानसभा सत्र बुलाया।

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