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'पॉर्न की लत से जूझ रहे बच्चों को दंडित नहीं, शिक्षित करें', मद्रास हाई कोर्ट ने समाज को दिया सुझाव

Madras High Court: वेंकटेश ने एक हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि 10 में से नौ लड़के और 10 में से छह लड़कियां 18 साल की उम्र से पहले किसी न किसी रूप में पॉर्नोग्राफी के संपर्क में आते हैं।
Written by: न्यूज डेस्क
चेन्नई | Updated: January 12, 2024 22:09 IST
 पॉर्न की लत से जूझ रहे बच्चों को दंडित नहीं  शिक्षित करें   मद्रास हाई कोर्ट ने समाज को दिया सुझाव
Madras High Court: मद्रास हाई कोर्ट ने बच्चों में पोर्न की लत को लेकर सख्त टिप्पणी की है। (फाइल फोटो)
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Porn Addiction: पॉर्न की लत से जूझ रहे Gen Z (2000 से 2012 के बीच में पैदा हुए बच्चे) पीढ़ी के बच्चों को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बच्चों को दंडित नहीं करना चाहिए, बल्कि समाज को उन्हें सही से शिक्षित करना चाहिए।

जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने 28 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ अंबत्तूर पुलिस द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को रद्द करते हुए ये टिप्पणियां कीं, जिस पर इंटरनेट से बाल अश्लील वीडियो डाउनलोड करने के लिए POCSO अधिनियम और आईटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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फैसले में जस्टिस वेंकटेश ने बताया कि याचिकाकर्ता ने लत से छुटकारा पाने के लिए परामर्श लेने का वादा किया था।

आदेश में, यह नोट किया गया कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 14(1) के तहत अपराध बनाने के लिए, आरोपी व्यक्ति ने किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल अश्लील उद्देश्यों के लिए करना आवश्यक है।

यह मानते हुए भी कि आरोपी व्यक्ति ने बाल पोर्नोग्राफ़ी वीडियो देखा था, यह सख्ती से यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 14 (1) के दायरे में नहीं आएगा। चूंकि उसने पोर्नोग्राफ़ी के लिए किसी बच्चे या बच्चों का उपयोग नहीं किया है। इसे केवल आरोपी व्यक्ति की ओर से नैतिक पतन के रूप में माना जा सकता है।

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इसके अलावा, यह कहा गया था कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 बी के तहत अपराध का गठन करने के लिए, आरोपी व्यक्ति ने बच्चों को यौन कृत्यों में चित्रित करने वाली सामग्री प्रकाशित, प्रसारित और बनाई होगी।

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आदेश में जोड़ा गया है कि जो सामग्री इस कोर्ट के समक्ष रखी गई है, वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67-बी और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 14 (1) के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ अपराध नहीं बनाती है।

जस्टिस वेंकटेश ने कहा कि आज की पीढ़ी के युग में किशोरों को गैजेट्स से एक नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जो एक बटन के स्पर्श पर बिना किसी सेंसर के उन पर सभी प्रकार की जानकारी पहुंचा देता है।

न्यायाधीश ने कहा कि वयस्क सामग्री है, जो उन बच्चों का भी ध्यान आकर्षित करती है जिनकी मानसिक क्षमता विकास के चरण में है। पहले धूम्रपान, शराब पीने आदि की लत थी और अब अश्लील फोटो/वीडियो देखने की लत बढ़ रही है। यह आसानी से उपलब्ध है… और इसे बार-बार देखने से यह एक आदत बन जाती है और अंत में व्यक्ति को इसकी लत लग जाती है।

पोर्नोग्राफी को लेकर जस्टिस ने एक स्टडी का दिया हवाला

वेंकटेश ने एक हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि 10 में से नौ लड़के और 10 में से छह लड़कियां 18 साल की उम्र से पहले किसी न किसी रूप में पॉर्नोग्राफी के संपर्क में आते हैं और पोर्नोग्राफी देखने से किशोरों पर नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं, जिससे उनके मनोवैज्ञानिक और शारीरिक पक्ष दोनों प्रभावित होते हैं। जस्टिस ने आगे कहा कि शिक्षा स्कूल स्तर से शुरू होनी चाहिए, क्योंकि वयस्क सामग्री का सामग्री का संपर्क उसी स्तर से शुरू होती है।

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