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जैव-विविधता को संरक्षित करने में वनों की भूमिका अहम, जानें कैसे

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन दशक में विश्वभर में करीब एक अरब एकड़ वन क्षेत्र नष्ट हो गए हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 20, 2024 09:11 IST
जैव विविधता को संरक्षित करने में वनों की भूमिका अहम  जानें कैसे
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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योगेश कुमार गोयल

परिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में मनुष्यों और जीव-जंतुओं के अलावा वृक्षों तथा वनों का भी बेहद महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। दरअसल, वन जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों का प्राकृतिक आवास स्थान होने के साथ-साथ भोजन का माध्यम भी हैं। पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे जरूरी तत्त्व है आक्सीजन, धरती पर वन ही हैं, जो बड़ी मात्रा में वातावरण से कार्बन डाईआक्साइड सोखकर उसे आक्सीजन में बदलते हैं।

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वन वर्षा कराने, तापमान को नियंत्रित रखने, मृदा के कटाव को रोकने तथा जैव-विविधता को संरक्षित करने में सहायक होते हैं और सही मायनों में पृथ्वी पर पाई जाने वाली जैव विविधता वनों के कारण ही है। पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित रखने में वनों की अहम भूमिका होती है। हालांकि दुनिया भर में वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण अब पृथ्वी पर वन और उनमें रहने वाले जीव-जंतुओं के आवास स्थल काफी सिमट गए हैं। हर वर्ष लगने वाली आग के कारण लाखों हेक्टेयर जंगल तथा जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां नष्ट हो जाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन दशक में विश्वभर में करीब एक अरब एकड़ वन क्षेत्र नष्ट हो गए हैं। कुछ दशक पहले तक जहां पृथ्वी का करीब पचास फीसद भू-भाग वनों से आच्छादित था, अब यह महज तीस फीसद रह गया है। अगर इसी रफ्तार से वनों का सफाया होता रहा, तो इसमें और कमी आएगी। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार वनों की संख्या घटते जाने का सीधा असर जैव विविधता पर पड़ेगा।

इससे आने वाले समय में जहां जल चक्र, मृदा संरक्षण और जैव मंडल पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, वहीं जीव-जंतुओं के आवास पर भी संकट आएगा और अनियमित मौसम से भयंकर दुष्प्रभाव सामने आएंगे। जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण ही अब पृथ्वी पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के साथ-साथ प्राकृतिक आपदा की तीव्रता लगातार बढ़ रही है।

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वन पृथ्वी के फेफड़ों की भांति कार्य करते हैं, जो वातावरण से सल्फर डाईआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, अमोनिया, ओजोन आदि प्रदूषक गैसों को अपने अंदर समाहित कर वातावरण में प्राणवायु छोड़ते हैं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर लोगों को वनों के महत्त्व के प्रति जागरूक करने, इनके संरक्षण के लिए समाज का योगदान हासिल करने और वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष ‘अंतरराष्ट्रीय वन दिवस’ या ‘विश्व वानिकी दिवस’ मनाया जाता है।

इसके लिए प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एक विषय-वस्तु निर्धारित की जाती है, जिसे जंगलों पर सहयोगात्मक भागीदारी द्वारा चुना जाता है। इस वर्ष इसकी विषय-वस्तु ‘वन और नवाचार’ निर्धारित की गई है। यह विषय वनों की सुरक्षा, प्रबंधन और पुनर्स्थापित करने में प्रौद्योगिकी और रचनात्मक दृष्टिकोण की महत्त्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता तथा नवाचार द्वारा निभाई जाने वाली महत्त्वपूर्ण भूमिका पर विशेष जोर देता है।

अगर शुरुआत से अभी तक की विषय-वस्तु पर नजर डालें तो 2014 से 2021 के बीच अंतरराष्ट्रीय वन दिवस की विषय-वस्तु क्रमश: ‘हमारे वन, हमारा भविष्य’, ‘वन, जलवायु, परिवर्तन’, ‘वन और जल’, ‘वन और ऊर्जा’, ‘वन और शहर’, ‘वन और शिक्षा’, ‘वन और जैव विविधता’, ‘वन बहाली: पुनर्प्राप्ति और कल्याण का मार्ग’ तथा ‘वन तथा सतत उत्पादन और खपत’ रखी जा चुकी हैं।

भारत में मुख्य रूप से सदाबहार वन, मैंग्रोव वन, शंकुधारी वन, पर्णपाती वन, शीतोष्ण कटिबंधीय वन हैं। सदाबहार वनों को वर्षा वन भी कहा जाता है, जो भारत में पश्चिमी घाट, अंडमान निकोबार द्वीप समूह तथा पूर्वाेत्तर भारत जैसे उच्च वर्षा क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में वृक्ष एक-दूसरे से आपस में मिलकर ऐसी छत-सी बना लेते हैं कि सूर्य का प्रकाश जमीन तक नहीं पहुंच पाता और इसीलिए जमीन पर बड़ी संख्या में पेड़-पौधे उग जाते हैं।

मैंग्रोव वन डेल्टाई इलाकों तथा नदियों के किनारे पर उगते हैं और नदियों द्वारा अपने साथ बहाकर लाई गई मिट्टी के साथ लवणयुक्त तथा शुद्ध जल में आसानी से वृद्धि कर जाते हैं। नुकीली पत्तियों वाले काफी सीधे और लंबे वृक्षों वाले शंकुधारी वन अधिकांश हिमालय पर्वत जैसे कम तापमान वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वृक्षों की शाखाएं नीचे की ओर झुकी होती हैं, इसलिए इनकी टहनियों पर बर्फ नहीं टिक पाती।

पर्णपाती वन मध्यम वर्षा वाले ऐसे इलाकों में पाए जाते हैं, जहां वर्षा कुछ महीनों के लिए ही होती है। मानसून आने पर तेज बारिश और सूर्य का प्रकाश जमीन तक पहुंचने पर इन वनों की वृद्धि तेजी से होती है और मानसून में ही ये घनी वृद्धि करते हैं। गर्मी तथा सर्दी के मौसम में इन वृक्षों की पत्तियां गिर जाती हैं और चैत्र माह में इन पर नई पत्तियां आनी शुरू हो जाती हैं।

खजूर, कैक्टस, नागफनी जैसी वनस्पतियों और छोटी, मोटी और मोमयुक्त पत्तियों वाले कांटेदार वन कम नमी वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जिनकी रेशेयुक्त जड़ें धरती में गहरे समाई होती हैं। इन वनों में कांटेदार वृक्ष काफी दूर-दूर स्थित होते हैं, जो जल संरक्षित करते हैं। उष्णकटिबंधीय वन भूमध्य रेखा के निकट पाए जाते हैं, जबकि शीतोष्ण वन मध्यम ऊंचाई वाले स्थानों और बोरील वन ध्रुवों के निकट मिलते हैं।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय वर्ष 1987 से देश में वनों तथा वृक्षों की स्थिति का जायजा लेने वाली रपट हर दो वर्ष में प्रकाशित करता है। 2019 के बाद 2022 में मंत्रालय द्वारा जारी की गई ‘सत्रहवीं भारत वन स्थिति रपट-2021’ में 2019 से 2021 के बीच दो वर्षों में देशभर में वन तथा वृक्ष आच्छादित भू-भाग का दायरा 2261 वर्ग किलोमीटर बढ़ने की बात कही गई थी।

हालांकि 2017 की तुलना में 2019 में जंगल तथा वृक्षों के आवरण में 5188 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई थी, उस दृष्टि से 2019 से 2021 के बीच हुई वृद्धि काफी कम रही। रपट के मुताबिक देश में अब वन आच्छादित भू-भाग 809537 वर्ग किलोमीटर हो गया है। नई सर्वेक्षण रपट के मुताबिक अब देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 24.62 फीसद भू-भाग पर वनों और वृक्षों का आवरण है, जबकि राष्ट्रीय वन नीति-1988 में देश के कुल 33 फीसद भूभाग को वनाच्छादित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था यानी अब भी हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं।

2021 के ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में सौ से ज्यादा देशों ने वर्ष 2030 तक वनों की कटाई पर पूर्ण पाबंदी लगाने का संकल्प लिया था। वनों की अंधाधुंध कटाई तथा बढ़ते प्रदूषण के कारण ही अब विश्वभर में कई ग्लेशियर लुप्त होने के कगार पर हैं और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का खतरा निरंतर बढ़ रहा है, जिसके कारण पिछले कुछ वर्षों से दुनिया भर में मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यही कारण है कि पूरी दुनिया को एकजुट होकर वनों का विनाश रोकने के लिए सार्थक पहल करने की सख्त जरूरत महसूस की जाने लगी है।

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