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पिछली बार से कितना अलग है किसानों का आंदोलन, आखिर क्यों और किन मांगों के साथ दिल्ली आ रहे अन्नदाता?

पंजाब हरियाणा के किसान एक बार फिर मोदी सरकार के खिलाफ अपनी मांगों को लेकर दिल्ली कूच कर रहे हैं जो कि सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है।
Written by: राखी जग्गा
नई दिल्ली | Updated: February 12, 2024 23:38 IST
पिछली बार से कितना अलग है किसानों का आंदोलन  आखिर क्यों और किन मांगों के साथ दिल्ली आ रहे अन्नदाता
किसानों से मोदी सरकार के मंत्री बातचीत करके आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। (सोर्स- PTI)
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किसान आंदोलन एक बार फिर शुरु होने वाला है। मोदी सरकार के खिलाफ पंजाब और हरियाणा के किसान अपनी मांगों को मनवाने के लिए 13 फरवरी को दिल्ली चलो अभियान के तहत दिल्ली कूछ करने वाले हैं। ऐसे में प्रशासन दिल्ली से लेकर हरियाणा तक में सतर्क है और उन्हें रोकने के तमाम इंतजाम किए गए हैं। दूसरी ओर किसानों के प्रतिनिधियों यानी किसान नेताओं के साथ मोदी सरकार के मंत्री पीयूष गोयल और उनका प्रतिनिधिमंडल बातचीत भी कर रहा है जिससे मामले को बिगड़ने से पहले ही संभाला जा सके।

मोदी सरकार के मंत्री और किसान नेताओं की बीच जारी बैठक को लेकर सूत्रों का कहना है कि किसानों और सरकार के बीच कई मुद्दों पर सहमति बन गई है। हालांकि एक मुद्दा जो अभी भी अटका पड़ा है, वो एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ा है। इस मुद्दे पर किसानों और सरकार के बीच अभी कोई सहमति नहीं बनी है और न ही कोई बीच का रास्ता निकला है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले किसानों का दिल्ली कूच करना मोदी सरकार के लिए मुश्किलों वाला हो सकता है। इसकी वजह यह है कि किसानों का यह मार्च पिछली बार से काफी अलग है।

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2021 की अपेक्षा किसान अब ज्यादा मजबूती से अपनी मांग लेकर निकले हैं, जिनके पास एक सशक्त नेतृत्व भी है। किसान मजदूर मोर्चे के बैनर के तले करीब 250 किसान संघ हैं जो कि 100 से ज्यादा यूनियनों का समूह है। इसी तरह संयुक्त किसान मोर्चा (गैर राजनीतिक) भी है , जिसे 150 से ज्यादा यूनियनों का समर्थन प्राप्त है। इन दोनों ही संगठनों का मकसद है कि दो साल पहले उनसे पीएम मोदी की सरकार ने जो वादे किए थे, उन्हें अब वे याद दिलाए जाए और पूरा करने की पहल की जाए।

किन किसानों की है इसमें भागीदारी

इस मार्च के संगठनों की बात करें तो संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं की बात करें तो यह पूरी तरह से एक गैर राजनीतिक गुट बताया जा रहा है। इसके समन्वयक भारतीय किसान यूनियन के सिधुपुर फॉर्म के अध्यक्ष जगजीत सिंह दल्लेवाल हैं। यह संगठन नेतृत्व के साथ अपने मनमुटावों के चलते SKM से अलग हो गया था। इसके अलावा दूसरा बड़ा संगठन KMM का है। इसका गठन पंजाब के यूनियन किसान मजदूर संघर्ष समिति के संयोजक सरवन सिंह पंडेर ने किया था। 2021 वाले किसान आंदोलन में यह संगठन शामिल नही हुआ था। इन्होंने दिल्ली बॉर्डर पर अपना एक अलग मंच बनाया था।

जब साल 2021 में किसानों का आंदोलन समाप्त हुआ था, तो उस वक्त से ही KMSC ने अपना विस्तार करना शुरू कर दिया था और जनवरी 2024 के आखिरी में अपने KMM के गठन की घोषणा की थी। इसमें देश की100 से ज्यादा यूनियनें शामिल है। दूसरी ओर SKM ने 16 फरवरी को ग्रामीण भारत बंद का ऐलान कर रखा है।

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आखिर क्या है किसानों की मांग?

  • किसानों की सबसे अहम मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लिए कानून।
  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग।
  • कृषि ऋण माफ करने की मांग।
  • लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को न्याय।
  • भारत को डब्ल्यूटीओ से बाहर निकालना।
  • कृषि वस्तुओं, दूध उत्पादों, फलों, सब्जियों और मांस पर आयात शुल्क कम करने के लिए भत्ता बढ़े।
  • किसानों और 58 साल से अधिक आयु के कृषि मजदूरों के लिए पेंशन योजना (10,000 रुपये प्रतिमाह)।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सुधार के लिए सरकार की ओर से स्वयं बीमा प्रीमियम का भुगतान करना।
  • भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 को उसी तरीके से लागू किया जाए और केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को दिए गए निर्देश रद्द हो।
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