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Explained: असम में रह रहे CAA के सबसे बड़े समर्थक अब भी नहीं है खुश, जानिए क्यों चाहते हैं नियमों में संशोधन

CAA Notification: सीएए का उद्देश्य पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाई अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देना है।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: Mohammad Qasim
नई दिल्ली | Updated: March 20, 2024 13:45 IST
explained  असम में रह रहे caa के सबसे बड़े समर्थक अब भी नहीं है खुश  जानिए क्यों चाहते हैं नियमों में संशोधन
नागरिकता संशोधन अधिनियम कानून (फोटो : पीटीआई)
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नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित होने के बाद देशभर में कई विरोध प्रदर्शन हुए। वहीं असम में बंगाली हिंदुओं का एक धड़ा ऐसा था जो इसके समर्थन में लंबे वक़्त से आंदोलन करता रहा है।

जब कानून बना तो नागरिकता की तलाश में रहे ये लोग खुश हुए लेकिन नियम सामने आने के बाद इनकी उम्मीद अब पूरी होती नज़र नहीं आ रही हैं।

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11 मार्च को 2019 में कानून पारित किए जाने के चार साल अब CAA के रूल्स से जुड़ा नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है और इनका मानना है कि इसके नियमों में समस्या है।

CAA का मकसद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाई अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देना है। इसमें मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया है।

पूरे भारत में हुए विरोध से हटकर असम में सीएए के विरोध की वजह दूसरी है। यहां वजह वह हिन्दू भी हैं जिन्हें लेकर कहा जाता है कि वह बांग्लादेश से यहां आकर बसे हैं। ---बड़े पैमाने पर असम में CAA का विरोध हुआ क्योंकि विरोधियों का मानना था कि नए कानून के जरिए हिंदू 'बांग्लादेशी' भी भारत आ जाएंगे और इससे उनकी संस्कृति और रहन-सहन पर प्रभाव पड़ेगा।--

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अब क्या है समस्या है?

इंडियन एक्सप्रेस ने ऐसे कुछ उदाहरण अपनी एक रिपोर्ट में शामिल किए हैं जिन्हें नागरिकता साबित करने के लिए कड़े संघर्ष से गुज़रना पड़ रहा है और अभी भी उनकी यह समस्या हल होती नज़र नहीं आ रही है।

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असम की बराक घाटी मध्य में सिलचर से लगभग 30 किमी दूर अमराघाट बाज़ार में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले अजित दास की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

इस इलाके में बड़े पैमाने पर बंगाली आबादी रहती है। जब 2019 में पूरे असम में CAA के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध हुआ तब एक यही इलाका था जहां CAA के समर्थन में आवाज उठी थी।

अजित दास के कड़े संघर्ष की कहानी 2014 से शुरू हुई जब उन्हें पहली बार नोटिस मिला कि उनकी नागरिकता जांच के दायरे में है। पिछले 10 सालों में उन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए तीन बार हिरासत से भी गुजरना पड़ा है। आखिर में उन्हें 2021 में फ़ोरेन ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित कर दिया गया।

दास का कहना है कि उनके पिता और दादा 1956 में पूर्वी पाकिस्तान से भागे थे और असम के हैलाकांडी जिले के मोनाचेर्रा (Monacherra) में एक शरणार्थी शिविर में कुछ वक़्त ठहरे थे। यहां उन्हें Refugee Certificate दिया गया था। दास के पास एक मात्र यही डॉक्यूमेंट मौजूद है। लेकिन वह इस महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट के जरिए सिलचर में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 6 को मनाने में सफल नहीं हुए।

अब जब CAA के नियम सामने आ गए हैं और इसका उद्देश्य दास जैसे लोगों को नागरिकता देना है तो उनके लिए इसे राहत माना जा रहा है।

लेकिन अभी भी ऐसा नहीं होता दिख रहा है और वह मानते हैं कि नागरिकता साबित करने के लंबे संघर्ष में जब वह काफी आ गए हैं तो अब फिरसे उन्हें यह प्रोसेस नई तरह शुरू करना होगा और यह इतना भी आसान नज़र नहीं आता है।

CAA के नियमों में संशोधन की बात क्यों?

11 मार्च को केंद्र सरकार ने CAA के नियम जारी कर दिए। यानी अब नागरिकता के लिए नियमों के मुताबिक एप्लिकेशन दायर की जा सकती है।

नियम कहते हैं कि---आवेदक के पास CAA की अनुसूची 1ए के तहत एक ऐसा डॉक्यूमेंट होना जरूरी है जो यह साबित करे कि वह बांग्लादेश, अफगानिस्तान या पाकिस्तान का नागरिक है।

डॉक्यूमेंट यानी-- पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, शिक्षा प्रमाण पत्र, पहचान पत्र , भूमि या किरायेदारी रिकॉर्ड, या उस देश (बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान) की ओर से उन्हें अपना नागरिक बताने के लिए जारी किया गया कोई एक डॉक्यूमेंट हो। या फिर उसके माता-पिता, दादा-दादी या परदादा किसी एक की नागरिकता उस देश से दिखा रहा कोई एक डॉक्यूमेंट उसके पास हो।

अजित दास के पास इनमें से एक भी कागज नहीं है। वह कहते हैं-- “मैं विदेशी नहीं हूं। मैं यहीं पैदा हुआ, यहीं स्कूल गया। हां, मेरे पिता बांग्लादेश से आए थे लेकिन मुझे नहीं पता कि इसका प्रोसेस क्या था। मेरे पास उनसे जुड़ा एकमात्र डॉक्यूमेंट शरणार्थी प्रमाणपत्र है और उसे फ़ोरेन ट्रिब्यूनल पहले ही खारिज कर चुका है। क्या अब इससे मुझे मदद मिलेगी?”---

दास जैसे लोग इस इलाके में बड़ी तादाद में मौजूद हैं। लेकिन CAA के सबसे बड़े समर्थक रहे इन लोगों की उम्मीदें अब कानून पूरी तरह लागू हो जाने के भी पूरी नहीं हुई हैं।

क्यों नाउम्मीद हैं CAA के समर्थक?

ऑल असम बंगाली हिंदू एसोसिएशन के अध्यक्ष बासुदेब शर्मा ने कहा---"हमने अधिनियम (CAA) के समर्थन में आंदोलन, हस्ताक्षर अभियान चलाए, इसके पारित होने का जश्न मनाया और इसके नियमों का लंबा इंतज़ार किया।"

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए बासुदेब शर्मा CAA के नियमों में संशोधन की मांग करते हुए कहते हैं--“एक बार जब हमने नियमों का विश्लेषण किया तो एक बात स्पष्ट हुई कि आवेदकों को पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से होने और भारत में प्रवेश की तारीख बताने के लिए डॉक्यूमेंट पेश करना होगा। ये वो लोग हैं जो बिना किसी तैयारी के भागकर और जैसे-तैसे भारत पहुंच पाए हैं। हमने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भेजा है कि नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए और बिना दस्तावेजों वाले लोगों से स्व-घोषणा पत्र काफी होना चाहिए।"

करीमगंज के एक वकील शिशिर डे (Sishir Dey) ने कहा कि CAA के नियम जिस तरह से लागू किए गए हैं, उससे किसी को भी फायदा नहीं होगा। जो लोग सच में बांग्लादेश से आए हैं और जो लोग इस प्रोसेस को पास नहीं कर पाएंगे उनके पास CAA के नियमों तहत नागरिकता लेने के लिए कोई डॉक्यूमेंट नहीं है।

अजित दास कहते हैं कि वह प्रतीक्षा करेंगे और देखेंगे कि उन्हें क्या विकल्प चुनना है। वह कहते हैं कि अच्छी बात यह है कि इसमें मैं अकेला नहीं हूं, एक ही नाव पर लाखों लोग सवार हैं। मैं कुछ लोगों के सीएए के तहत आवेदन करने का इंतजार करूंगा और देखूंगा कि उनका अनुभव क्या है। मुझे इस प्रक्रिया पर बहुत कम भरोसा बचा है।

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