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रोजी-रोजगार, बेहतर जीवन की तलाश में हर साल लाखों भारतीय दलालों की मदद से कर रहे हैं विदेश का रुख

एक अध्ययन के अनुसार भारत से हर वर्ष सात लाख से अधिक लोग अवैध रास्तों से अमेरिका पहुंच जाते हैं। कई हजार लोग ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में भी जाने की कोशिश करते हैं।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 14, 2024 10:52 IST
रोजी रोजगार  बेहतर जीवन की तलाश में हर साल लाखों भारतीय दलालों की मदद से कर रहे हैं विदेश का रुख
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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संगीता सहाय

हर वर्ष लाखों भारतीय अमेरिका और अन्य देशों में दलालों की मदद से अवैध रूप से प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग सफल हो जाते हैं, कुछ विफल होकर वापस लौट आते हैं, तो कुछ इस ललक में सदा के लिए दुनिया छोड़ जाते हैं। अमेरिका या किसी अन्य देश में गैरकानूनी रूप से घुसे लाखों में से चंद लोगों को ही सम्मानजनक जीवन मिल पाता है, बाकी ताउम्र आंखों में दौलत और बेहतर जीवन की आस लिए डरते हुए छिपते-छिपाते ही उम्र काट देते हैं। मृगमरीचिका में फंस कर जो सम्मान तथा पहचान वे अपने देश में छोड़कर जाते हैं, उसका पासंग भर भी उन्हें नहीं मिल पाता।

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एक अध्ययन के अनुसार भारत से हर वर्ष सात लाख से अधिक लोग अवैध रास्तों से अमेरिका पहुंच जाते हैं। कई हजार लोग ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में भी जाने की कोशिश करते हैं। ऐसा वे सामान्यतया दलालों के सहयोग से करते हैं, जिसमें उनके लाखों रुपए खर्च होते हैं। इन्हीं रास्तों या तरीकों को ‘डंकी रूट’ कहा जाता है।

गौरतलब है कि यह खेल तो वर्षों से चल रहा है, पर फिल्म ‘डंकी’ ने इस गैरकानूनी कृत्य को चर्चा में ला दिया। ‘डंकी’ मूल रूप से पंजाबी शब्द ‘दूनकी’ से आया है, जिसका अर्थ है रुक-रुक कर एक जगह से दूसरी जगह होते हुए छिपते-छिपाते किसी खास जगह जाने की कोशिश करना। मसलन, अमेरिका जाने वाले कनाडा का वीजा प्राप्त कर या निकारागुआ या इक्वाडोर में ‘वीजा आन अराइवल’ प्राप्त कर पहले मैक्सिको और फिर वहां से अमेरिका में घुसने का प्रयास करते हैं।

अमेरिका में प्रवेश का यह ‘डंकी रूट’ दिल्ली से करीब चौदह हजार किमी दूर लैटिन अमेरिकी देश इक्वाडोर से शुरू होता है। वहां से कोलंबिया, पनामा, कोस्टारिका, निकारागुआ, होंडुरास, ग्वाटेमाला होता हुआ मैक्सिको की सीमा यानी ‘गेटवे आफ अमेरिका’ तक पहुंचता है। इक्वाडोर से मेक्सिको तक ‘वीजा आन अराइवल’ होने के कारण वीजा मिलने में कोई कठिनाई नहीं होती।

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पर असली चुनौती मैक्सिको-अमेरिका की सीमा तक जाने और वहां से अमेरिका में प्रवेश करने की होती है। मैक्सिको और अमेरिका के बीच 3100 किमी लंबी सीमा पर 25 फीट ऊंची दीवार बनी हुई है। इसको पार करके अमेरिका की सीमा में प्रवेश किया जाता है। जो लोग दीवार को पार नहीं कर पाते, वे सीमा के समांतर बहती रियो ग्रांड नदी को पार करने का खतरनाक रास्ता चुनते हैं। इस कठिन रास्ते को पार करते समय कई लोग मारे जाते हैं। चूंकि गैरकानूनी ढंग से किसी देश में प्रवेश करना सीधे रास्तों से संभव ही नहीं है, इसलिए एजंट अत्यंत कम भीड़भाड़ वाले या निर्जन रास्ते तलाशते हैं, जहां कदम-कदम पर जोखिम होता है।

कभी भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। पूरे विश्व में यहां की कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, शासन-व्यवस्था आदि को ससम्मान स्वीकार किया जाता था। इस देश की उन्नत आर्थव्यवस्था और संपन्नता की चर्चा पूरी दुनिया में थी। विश्व के कोने-कोने से व्यापारी यहां आते थे। उसी रत्नगर्भा भूमि पर समय का पहिया ऐसा घूमा है कि अब लाखों भारतीय देश छोड़कर विदेश का रुख कर रहे हैं।

एक आंकड़े के अनुसार नौकरी, रोजी-रोजगार, अकूत पैसा, बेहतर जीवन आदि की लालसा में हर वर्ष लाखों भारतीय देश छोड़कर विदेश का रुख कर रहे हैं। आव्रजन अधिनियम, 1983, भारत के नागरिकों को विदेशों में रोजगार करने का अवसर देता है। इस कानून के तहत अठारह देशों में रोजगार के लिए आव्रजन प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। वर्ष 2022 में अखिल भारतीय स्तर पर कुल 3,73,434 आव्रजन प्रमाणपत्र जारी किए गए थे।

संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के मुताबिक, 2020 तक 1.8 करोड़ भारतीय विदेशों में रह रहे थे। गौरतलब है कि इस वक्त करीब 3.2 करोड़ भारतीय विदेश में रह रहे हैं। यानी भारतीयों की जितनी आबादी विदेशों में रह रही है, उतनी तो कई देशों की जनसंख्या भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय प्रवासन 2020 हाइलाइट्स’ के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), अमेरिका और सऊदी अरब में भारतीय सबसे ज्यादा गए हुए हैं।

इसके अलावा कनाडा, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि में भी भारतीय बसे हुए हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों के देश छोड़ने की मुख्य वजह रोजगार, बेहतर जिंदगी और डालर की भूख है। गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2021 में 1,63,370 भारतीयों ने देश की नागरिकता छोड़ दी। इसमें सर्वाधिक 78,284 लोगों ने अमेरिका की, 23,533 लोगों ने आस्ट्रेलिया की और 21,597 लोगों ने कनाडा की नागरिकता ली। आंकड़ों के अनुसार बीते पांच वर्षों में आठ लाख लोगों ने दूसरे देशों की नागरिकता ले ली।

अपनी आवश्यकतानुसार कानून और नियमों के तहत विदेशों में रहना लोगों की अपनी इच्छा-अनिच्छा हो सकती है। पर, बड़ा प्रश्न गैरकानूनी तरीके से विदेश जाने वाले भारतीयों की बढ़ती संख्या को लेकर है। हाल ही में 2017-19 के दौरान उच्च शिक्षा के लिए कनाडा गए सात सौ भारतीय छात्र (अधिकांश पंजाब के) पकड़े गए और कनाडा सरकार ने उन्हें ‘इमिग्रेशन नोटिस’ थमा दिया।

हालांकि बाद में सरकार के हस्तक्षेप से कुछ छात्रों को राहत मिली, लेकिन पूरे प्रकरण ने अवैध यात्रा के गोरखधंधे का पर्दाफाश कर दिया। इनमें से सभी शिक्षा विभाग और ट्रेवल एजंसी की लापरवाही के चलते धोखाधड़ी के शिकार हुए। भारतीयों के बढ़ते अवैध प्रवासन को देखते हुए सर्बिया ने 1 जनवरी, 2023 से भारतीयों के लिए वीजा मुक्त यात्रा बंद कर दी है। सर्बिया के रास्ते भारतीय यूरोप के देशों में अवैध तरीके से प्रवेश करते थे।

एक आंकड़े के अनुसार विदेश जाने के लिए हर साल 7.25 लाख भारतीय अवैध रास्ता चुनते हैं। अमेरिका के अवैध प्रवासियों में भारतीय तीसरे स्थान पर हैं। ‘यूएस कस्टम ऐंड बार्डर प्रोटेक्शन’ के अनुसार वर्ष 2022 में 63,927 और 2023 में 96,917 अवैध भारतीय प्रवासी पकड़ गए। ऐसा ही अन्य देशों में भी हुआ। पकड़े जाने के बाद सभी कठोर दंड के भागी बनते हैं। पर अवैध प्रवास का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है।

सवाल है कि आखिर क्यों इतनी बड़ी संख्या में भारतीय अपने घर-परिवार, समाज और मातृभूमि से दूर, विदेश जाने को आतुर हैं? बेहतर मौके की तलाश, रोजगार, पैसा, नाम और रसूख की भूख, उच्च तकनीक, बेहतर जीवन की तलाश आदि इसके कई कारण हो सकते हैं। पर इन सबके लिए अवैध रास्ते अख्तियार करना, आपराधिक गतिविधियों का हिस्सा बन कर कठिनतम जीवन चुनना और मौत से मुकाबिल होना कितना उचित है, इस पर भी विचार आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति को इच्छानुसार अपना रास्ता चुनने का अधिकार है, बशर्ते वह रास्ता सीधा और सच्चा हो। अवैध प्रवासन सिर्फ गैरकानूनी काम नहीं, यह उस व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और स्वयं के प्रति द्रोह भी है।

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