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सरकारी जमीन पर दबंगों का अतिक्रमण बना परेशानी का सबब

अतिक्रमण की समस्या को क्या दंड के कठोर प्रावधान के जरिए सुलझाया जा सकता है? शायद दंड को कठोर बना देने भर से इस समस्या का हल निकालना संभव नहीं दिखता। इसलिए जरूरी है कि लोगों में जागरूकता पैदा की जाए और अतिक्रमण करने वालों के प्रति सख्ती की जाए।
Written by: अखिलेश आर्येंदु | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: February 02, 2024 10:41 IST
सरकारी जमीन पर दबंगों का अतिक्रमण बना परेशानी का सबब
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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पिछले वर्ष कई प्रदेशों में अतिक्रमण के मामलों में हजारों लोगों को उनके आसियाने से बेदखल कर दिया गया। उनमें से ज्यादातर सरकारी या अर्धसरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर स्थायी या अस्थायी बसेरा बनाकर रह रहे थे। लखनऊ, हल्द्वानी, मुंबई, दिल्ली सहित देश के अनेक शहरों में अतिक्रमण के खिलाफ राज्य सरकारों ने कार्रवाइयां कीं। देश के हर जिले में अतिक्रमण एक बड़ी समस्या बन चुका है।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में वन विभाग की 32 लाख 77 हजार 591 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। इसी तरह सेना की 9 हजार 375 एकड़ और रेलवे की 2012 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है। दिल्ली के 964 सरकारी पार्कों की करीब 70 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा है। अवैध कब्जे की समस्या कितनी विकट है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि हर दिन सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर भूमाफिया, घुसपैठियों या दबंगों के जरिए अतिक्रमण किए या कराए जाते हैं।

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भूखंडों पर कब्जा या अतिक्रमण महज भारत में रहने वाले नहीं करते, विदेशी घुसपैठिए भी स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से सरकारी या अर्धसरकारी जमीन पर कब्जा करने में सफल होते रहे हैं। भ्रष्टाचार, गांवों से शहरों की तरफ पलायन और लापरवाही इसकी एक बड़ी वजह है। भारत में लाखों लोग झुग्गियों में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर सरकारी जमीन पर कब्जा करके रहने वाले हैं।

इन्हें राशन कार्ड, आधार कार्ड, बिजली-पानी की सुविधा सहित सभी सहूलियतें उपलब्ध कराई जाती हैं। गौरतलब है कि न्यायालयों में ऐसे अवैध कब्जे करने वालों के सैकड़ों मुकदमे चल रहे हैं, जिनका उस जमीन पर न मालिकाना हक है और न उन्हें कानूनन कोई सहूलियत मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि जब इन्हें उस कब्जा की हुई जमीन से बेदखल किया जाता है, तब कोई न कोई पार्टी, दबंग या नेता इनके पक्ष में खड़ा हो जाता है।

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यही लोग उन दबंगों के वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होते हैं, जो इन्हें अवैध कब्जे के लिए सहूलियतें दिलाने में मदद करते हैं। इस वजह से यह समस्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। इसी के चलते सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना पड़ा था कि अवैध कब्जों की वजह से देश के बड़े शहर स्लम यानी झुग्गी-झोपड़ियों में तब्दील हो गए हैं।

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मुंबई, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अनेक हिस्सों में हजारों विदेशी घुसपैठिए सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे हैं। इनकी पहचान कर इन्हें इनके मूल देश में भेजने की समस्या राज्य और केंद्र सरकारों के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है। दरअसल, अतिक्रमण की समस्या के पीछे जनसंख्या विस्फोट एक अहम वजह है, लेकिन इससे बड़ी वजह गांवों से शहरों और कस्बों की ओर बढ़ता पलायन है।

गावों से शहर आने वालों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके बसेरे की होती है। इसका फायदा स्थानीय नेता, तथाकथित समाजसेवी और प्रशासन के भ्रष्ट अधिकारी उठाते हैं। परिवार के रहने की जगह मिलने के बाद राशन कार्ड, आधार कार्ड, बिजली और पानी की सुविधा भी पैसे के जरिए उन्हें मिल जाता है। स्थानीय प्रशासन ऐसे अतिक्रमणों को लापरवाही या दूसरी वजहों से नजरअंदाज कर देते हैं।

प्रशासन की आंख तब खुलती है जब उस सरकारी जमीन पर कोई परियोजना शुरू करनी होती या न्यायालय का सख्त आदेश आता है। अवैध बस्तियां बसाने में उन लोगों का भी हाथ और साथ होता है, जो गरीबों, मजलूमों और मजबूरों को तमाम दुश्वारियों से छुटकारा दिलाने के नाम पर इनका किसी न किसी तरह शोषण करने की फिक्र में रहते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि अनेक समाज विरोधी, देश विरोधी और विकास विरोधी गतिविधियां अवैध बस्तियों में चलती रहती हैं। मगर कभी-कभी तो राज्य सरकारें खुद ऐसी अवैध बस्तियों को हटाने के बजाय उन्हें वैध करना उचित समझती हैं। दिल्ली सरकार द्वारा 2019 के अक्तूबर में करीब अठारह सौ अवैध झुग्गियों को वैध करना और चालीस लाख लोगों को मालिकाना हक देना इसी कवायद का एक हिस्सा था।

भारत में अतिक्रमण की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। ये लोग सरकारी जमीन, किसानों की जमीन, पट्टा पाए मजदूरों और गरीबों की जमीन, रेलवे, वन विभाग, ग्राम समाज, ‘लाल डोरो’ और गोचर जमीनों पर अतिक्रमण या कब्जा कर लेते हैं। इसके अलावा, कस्बों और शहरों में फुटपाथों, पार्कों, खेल के मैदानों, धार्मिक स्थलों और व्यक्तिगत जमीनों पर अतिक्रमण या कब्जा करने की लाखों शिकायतें और मुकदमे न्यायालयों में लंबित हैं।

भारत में अतिक्रमण की समस्या से निपटने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाई गई भारतीय दंड सहिता 1860 की धारा 441 है। इस धारा के मुताबिक अतिक्रमण तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति पर अवैध तरीके से कब्जा करने की कोशिश करता है। ऐसे मामलों में हर्जाना और तीन महीने तक की कैद की सजा का प्रावधान है। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसे मामलों में अलग-अलग धाराओं के तहत दंड के प्रावधान हैं।

सवाल है कि दंड का प्रावधान होते हुए भी लाखों की तादाद में अवैध तरीके से कब्जा करना मामूली बात क्यों हो गई? इसी के साथ सवाल यह भी है कि अवैध कब्जे या अतिक्रमण से निजात पाना, क्या मौजूदा कानून के जरिए मुमकिन है? दरअसल, अतिक्रमण की समस्या दूसरी समस्याओं से एकदम अलग तरह की है। आजादी के बाद से ही लोगों ने लचीले कानूनों का फायदा उठाकर सरकारी और अर्धसरकारी जमीनों पर कब्जा शुरू कर दिया था।

तब राजनेता, प्रशासन और दबंग, तीनों की मिलीभगत से यह अवैध कवायद चलती थी। धीरे-धीरे आम आदमी को भी लगने लगा कि सरकारी या अर्धसरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके आराम से रहा जा सकता है या अपना स्वार्थ साधा जा सकता है। मगर यह समस्या कभी नासूर में बदल जाएगी, किसी ने सोचा भी नहीं था। शहरों में जाम की बढ़ती समस्या के पीछे सड़क की पटरियों पर बढ़ता अतिक्रमण है। इसी तरह शहरों और गांवों में बढ़ते झगड़ों, मुकादमों और हिंसा की वजह अवैध अतिक्रमण बन गया है।

सवाल है कि अतिक्रमण की समस्या को क्या दंड के कठोर प्रावधान के जरिए सुलझाया जा सकता है? शायद दंड को कठोर बना देने भर से इस समस्या का हल निकालना संभव नहीं दिखता। इसलिए जरूरी है कि लोगों में जागरूकता पैदा की जाए और अतिक्रमण करने वालों के प्रति सख्ती की जाए। जब तक समाज में अतिक्रमण के प्रति लोगों में आक्रोश नहीं पैदा होगा तब तक महज प्रशासन की कार्रवाइयों से इसे खत्म करना मुश्किल होगा।

फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि देश की प्रगति की दिशा में सोचने वालों में यह सकारात्मक भाव पैदा होगा कि अतिक्रमण देश के विकास में बहुत बड़ी बाधा है। इसलिए खुद न अतिक्रमण करने की कभी कोशिश करनी चाहिए और न तो अतिक्रमण करने वालों के प्रति सहानुभूति ही दर्शानी चाहिए।

सवाल है कि अतिक्रमण की समस्या को क्या दंड के कठोर प्रावधान के जरिए सुलझाया जा सकता है? शायद दंड को कठोर बना देने भर से इस समस्या का हल निकालना संभव नहीं दिखता। इसलिए जरूरी है कि लोगों में जागरूकता पैदा की जाए और अतिक्रमण करने वालों के प्रति सख्ती की जाए। जब तक समाज में अतिक्रमण के प्रति लोगों में आक्रोश नहीं पैदा होगा तब तक महज प्रशासन की कार्रवाइयों से इसे खत्म
करना मुश्किल होगा।

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