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इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन: पारदर्शिता पर उठ रहे हैं सवाल

ईवीएम की बैलेट यूनिट पर नीला बटन दबते ही बगल में रखी वीवीपैट मशीन में उम्मीदवार के नाम, क्रम और चुनाव चिह्न वाली एक पर्ची छपती है, सात सेकंड के लिए वह वीवीपैट मशीन में एक छोटे से पारदर्शी हिस्से में नजर आती है और फिर सीलबंद बक्से में गिर जाती है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 09, 2024 14:47 IST
इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन  पारदर्शिता पर उठ रहे हैं सवाल
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) भारत में चुनाव प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण अंग बन गई है। भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में इसकी अहमियत को इस बात से समझा जा सकता है कि करीब दो दशक से हर संसदीय और विधानसभा चुनाव में इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है।
ईवीएम को आशंकाओं, आलोचनाओं और आरोपों का भी सामना करना पड़ा है, लेकिन चुनाव आयोग का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने में ईवीएम बहुत अहम भूमिका निभाती है। हाल में हुए चुनावों के बाद ईवीएम पर कई तरह के सवाल खड़े किए गए हैं। ऐसा तब है जब कई देश भारत द्वारा तैयार किए गए ईवीएम से अपने यहां चुनाव करवा रहे हैं या चुनाव करवाने में दिलचस्पी जाहिर की है।

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विपक्षी दलों ने उठाया सवाल

विपक्षी दलों ने ईवीएम की सत्यता पर प्रश्न उठाया है। कांग्रेस समेत कई दलों का आरोप है कि कई बड़े देशों में ईवीएम पर प्रतिबंध है, क्योंकि इसकी सुरक्षा और सत्यता पर कई देशों ने सवाल उठाया है। यही कारण है कि साल 2006, में ईवीएम का इस्तेमाल करने वाले सबसे पुराने देशों में शामिल नीदरलैंड ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

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वहीं, साल 2009 में जर्मनी की सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम को असंवैधानिक बताते हुए और पारदर्शिता को संवैधानिक अधिकार बताते हुए ईवीएम पर रोक लगा दी। नतीजों को बदले जाने की आशंका को लेकर नीदरलैंड और इटली ने भी ईवीएम पर प्रतिबंध लगा दिया था। वहीं, इंग्लैंड और फ्रांस में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं हुआ है। अमेरिका जैसे देश के कई राज्यों में ईवीएम पर रोक है।

वीवीपैट क्या है?

विपक्षी दल वीवीपैट पर्चियों की 100 फीसद गिनती किए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसके जरिये ये पता चल सकेगा कि मशीन सही है या नहीं। वोटर वेरिफायबल पेपर आडिट ट्रेल (वीवीपैट) कहा जाता है। आम बोलचाल में इसे वीवीपैट भी कहा जाता है। यह ईवीएम से जोड़ी गई एक ऐसी प्रणाली है, जिससे मतदाता यह देख सकते हैं कि उनका वोट सही उम्मीदवार को पड़ा है या नहीं।

ईवीएम की बैलेट यूनिट पर नीला बटन दबते ही बगल में रखी वीवीपैट मशीन में उम्मीदवार के नाम, क्रम और चुनाव चिह्न वाली एक पर्ची छपती है, सात सेकंड के लिए वह वीवीपैट मशीन में एक छोटे से पारदर्शी हिस्से में नजर आती है और फिर सीलबंद बक्से में गिर जाती है।

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मतपत्रों की तुलना में सटीक नतीजे

ईवीएम में गड़बड़ी या इसके जरिये धांधली से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए चुनाव आयोग ने समय-समय पर कई कोशिशे भी की हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, ईवीएम बहुत ही उपयोगी है और यह पेपर बैलट यानी मतपत्रों की तुलना में सटीक भी होती है, क्योंकि इसमें गलत या अस्पष्ट वोट डालने की संभावना खत्म हो जाती है। इससे मतदाताओं को वोट देने में भी आसानी होती है और चुनाव आयोग को गिनने में भी। पहले सही जगह मुहर न लगने के कारण मत खारिज हो जाया करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता।

पहली बार कब हुआ इस्तेमाल

पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल साल 1982 में हुआ था। केरल विधानसभा की पारूर सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान ईवीएम इस्तेमाल की गई, लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल को लेकर कोई कानून न होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उस चुनाव को खारिज कर दिया था। इसके बाद, साल 1989 में संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किया और चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल का प्रावधान किया।

इसके बाद भी इसके इस्तेमाल को लेकर आम सहमति साल 1998 में बनी और मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों में हुए चुनाव में इसका इस्तेमाल हुआ। बाद में साल 1999 में 45 सीटों पर हुए चुनाव में भी ईवीएम इस्तेमाल की गई। फरवरी 2000 में हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान 45 सीटों पर ईवीएम इस्तेमाल की गई। मई 2001 में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुदुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों में सभी सीट पर मतदान के लिए ईवीएम इस्तेमाल हुईं। 2004 के आम चुनावों में सभी 543 संसदीय क्षेत्रों में मतदान के लिए 10 लाख से ज्यादा ईवीएम इस्तेमाल की गई थीं।

ईवीएम ने बदल डाली प्रक्रिया

ईवीएम मशीन के आने से मतदान प्रक्रिया तेज और आसान हो गई। पहले मतपत्रों की गिनती में कई-कई दिन लगा करते थे। इसीलिए चुनाव परिणाम भी देरी से आते थे। अब ईवीएम मशीन के जरिए मतों की गिनती बेहद तेजी से होती है और 5 से 6 घंटे में परिणाम आ जाते हैं।

कहां बनती है मशीन

भारत में ईवीएम मशीन को आकार देने का श्रेय सरकारी कंपनी इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन आफ इंडिया और भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड को जाता है। इन्हीं कंपनियों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को विकसित किया और इसका परीक्षण किया।

40 बार इस देश की संवैधानिक अदालतों ने ईवीएम से जुड़ी चुनौतियों को देखा है। कहा गया था कि ईवीएम में सेंधमारी हो सकती है, चोरी हो जाती है, खराब हो सकती हैं, नतीजे बदल सकते हैं। हर बार संवैधानिक अदालतों ने इसे खारिज कर दिया।
- राजीव कुमार, मुख्य चुनाव आयुक्त

हम ईवीएम का विरोध नहीं करते हैं, बल्कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग में हेरफेर के खिलाफ हैं। मतदान प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए वीवीपैट पर्चियों की 100 फीसद गिनती की जानी चाहिए। तभी नतीजों को लेकर सत्य सामने आएगी।

  • जयराम रमेश, कांग्रेस महासचिव
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